गठबंधन के बावजूद कर्नाटक में भाजपा के हौसले बुलंद

नई दिल्ली : कर्नाटक में पिछले साल विधानसभा चुनाव में भले ही भाजपा स्पष्ट बहुमत पाने से चूक गई हो, लेकिन लोकसभा में उसके हौसले बुलंद हैं। जेडीएस और कांग्रेस के जिस गठबंधन ने भाजपा को सरकार को बनाने से रोक दिया था, वहीं गठबंधन अब लोकसभा में फायदेमंद साबित होता दिख रहा है।

जेडीएस और कांग्रेस के जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच खाई नहीं पटने के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का लाभ भी भाजपा को मिलता दिख रहा है। दरअसल कर्नाटक जेडीएस, कांग्रेस और भाजपा के बीच त्रिकोणीय मुकाबले के लिए जाना जाता है।

जेडीएस और कांग्रेस के बीच गठबंधन के बाद मुकाबला भाजपा के साथ आमने-सामने का हो गया है। माना जा रहा था कि गठबंधन के बाद सामाजिक समीकरण में भाजपा कमजोर हो जाएगी। लेकिन, हकीकत में इसके उल्टा हो गया है। 18 और 23 अप्रैल को दो चरणों में होने जा रहे चुनाव के लिए कांग्रेस और जेडीएस के शीर्ष नेतृत्व ने गठबंधन के साथ सीटों का बंटवारा भी कर लिया।

कुल 28 में से आठ सीटों पर जेडीएस और 20 सीटों पर कांग्रेस चुनाव लड़ रही है। लेकिन लंबे समय से एक-दूसरे खिलाफ लड़ते आए जेडीएस और कांग्रेस से स्थानीय नेताओं और समर्थकों के बीच दूरियां पटने के बजाय बढ़ गई हैं।

हालत यह है कि नाराज कांग्रेस और जेडीएस के नेता पाला बदलकर भाजपा का दामन थाम रहे हैं और उनमें से कुछ भाजपा के टिकट पर चुनावी मैदान में भी हैं। इस लड़ाई का नतीजा यह है कि खुद जेडीएस प्रमुख एचडी देवेगौड़ा और उनके दोनों पोतों की सीट फंस गई है।

जाहिर है इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलने की उम्मीद है। लेकिन इसके साथ ही भाजपा को कर्नाटक में मोदी की लोकप्रियता का लाभ मिल सकता है। बताया जाता है कि पिछले दिनों कार्यकर्ताओं के साथ बैठक के दौरान कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने प्रधानमंत्री के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग कर दिया।

इस पर कांग्रेसी कार्यकर्ता ही नाराज हो गए। यह कर्नाटक में मोदी की लोकप्रियता के साथ उनके प्रति सम्मान को भी दिखाता है। जाहिर है 2014 में 28 में से 17 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार 22 सीटों पर जीत का दावा करने लगी है।

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