वन अधिकार पट्टा की चाह और अघोषित भू-माफिया की दलाली के चलते क्षेत्र के राजस्व वन का हुआ विनाश

हितेश दीक्षित

छुरा:-संसद ने 18 दिसम्बर, 2006 को सर्वसम्मति से अनुसूचित जाति एवं अन्य पारम्परिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून, 2006 पारित किया था। यह मात्र एक अन्य कानून भर नहीं हैं। इसके पारित होने के समय से तथा बाद के वर्षों में यह कहकर इसकी आलोचना की जाती रही है कि यह वनों के निजीकरण का प्रयास है, इससे बाकी बचे राजस्व व वनों का विनाश हो जाएगा और वोट बैंक बनाने के मकसद वाले राजनीतिज्ञों द्वारा यह कल्याणकारी उपाय किया गया था।

एक लेखक ने तो 1947 से अब तक की अवधि में पारित कानूनों में इसे अति खतरनाक कानून बताया था। 31 दिसम्बर, 2007 को इसे लागू करने की अधिसूचना जारी होने के बाद समाचारपत्रों ने इसे भारत के हाल के इतिहास का एक अति विवादास्पद कानून बताया था जबकि पारित होने के एक साल बाद इसे अधिसूचित किया गया।

परन्तु, वास्तव में यह कानून न तो किसी को भूमि प्रदान करता है और न भूमि का अधिकार। यह वनों का निजीकरण भी नहीं करता है।किंतु बताना लाजमी होगा कि छुरा क्षेत्र में वर्षो से वन अधिकार पट्टा पाने को लेकर लगातार हो रही जंगलों की अवैध कटाई की जा रही है राजस्व विभाग मूक दर्शक बना हुआ है।

जिसको लेकर वन विभाग और राजस्व विभाग के कर्मचारियों व्दारा अवैध कटाई करने वालों के ऊपर लगातार छूट पुट कार्रवाई कर रहे है फिर भी क्षेत्र में बड़े-बड़े पेड़ का कटाई धड़ल्ले हो रहा है । यह पूरा मामला वन परिक्षेत्र व राजस्व क्षेत्र के ग्राम खरखरा,विजयपुर, पंडरीपानी, तिलईदादर,सिवनी,देवरी, झालखमार, का है ।शासन-प्रशासन लगातार ग्रामीणों को वन अधिकार पट्टा देने की बात कह रही है तो वहीं ग्रामीणों द्वारा धड़ल्ले से वनों की अंधाधुंध कटाई हो रहा है।

जबकि छुरा के रसुखदार लोगो से मिलकर अघोषित भूमाफिया विगत कई वर्षों से वन अधिकार पट्टा दिलाने के नाम से छुरा के निवासियों को खरखरा पंचायत अंतर्गत राजस्व के संरक्षित वन पर अधिकार दे दिया है और जिन जिन आदिवासियों ने वर्षो से एक डेढ़ हेक्टेयर भूमि पर कब्जा किया था उनका कब्जा अपनी जाति के लोगो अंदरूनी रूप से लिखा पढ़ी कर दिया गया है,और उन कब्जा धारियों ने अपना कब्जा जमा लिया है जिससे अब वन विनाश की कगार पर है और राजस्व विभाग के कर्मचारियों के भी रिस्तेदार जमीन के मालिक बन बैठे है ।

और उन्होंने भी 8 से 10 एकड़ जमीन पर तार घेरा लगाकर रखा है,अवैध कटाई करने वाले छुरा और गरियाबंद के लोगो को जमीन पर अधिकार दिलाने के नाम पर मोटी रकम भी अघोषित भूमाफिया द्वारा लोगो से ली गई है जो कि दिन भर तहसील कार्यालय छुरा के आसपास ही इस भूमाफिया को दिखा जा सकता है,अवैध कब्जा धारियों द्वारा नए नए तरीकों से पेड़ों का विनाश कर रहे हैं ।

खरखरा पंचायत क्षेत्र के ग्रामो के राजस्व जंगलों में देखने को मिलाता है कि जहां बड़े-बड़े पेड़ों को चारों ओर से काट देते हैं । जिसके बाद धीरे धीरे पेड़ सूखने लग जाता है। फिर उस पेड़ को गिरा देते हैं और पेड़ के बचे हुए ठूंठ को आग लगा देते हैं। ऐसे कई क्षेत्र है जहां शासन प्रशासन के अधिकारी कर्मचारी पहुंचते तो है किंतु नजरो से नजरअंदाज कर देते है जिससे यहाँ का खेल मिलीभगत के आदेशों को जन्म देता है ।

ग्रामीणों से पूछताछ करने पर बताया कि गांव के ही कुछ लोग ईंट भट्टा में आग जलाने व वन अधिकार पट्टा पाने को लेकर पेड़ों की कटाई कर रहे हैं ।

वनाधिकार पट्टा मिला नही और काटे जा रहे पेड़

छुरा क्षेत्र के ग्राम खरखरा,सिवनी,देवरी,विजयपुर,,पंडरीपानी,में खेतों के के अंदर मुनारा भी तोड़ दिया गया है तो कुछ के घेरे के अंदर मुनारा भी है और अब समतलीकरण, भूमि सुधार के नाम पर सैकड़ों पेडो को
बिना अनुमति के पेड़ काटे जा रहे है जिस पर राजस्व विभाग की मोन् स्वकृति मिली हुई है कुछ किसानों द्वारा जे सी बी मशीन से पेड़ उखाड़कर आग के हवाले किए जा रहे है तो कुछ ईंट भठ्ठो की बलि चढ़ रहे है इस ओर ना तो वन विभाग कार्रवाई कर रहा है न ही राजस्व विभाग जिसके चलते क्षेत्र में धड़ल्ले से पेड़ों की कटाई हो रही है।

किसान वनवासी वन भू अधिकार पट्टा के लिए अवैध रूप से जंगल की कटाई तो कर रहे है दूसरी ओर आम किसान भी अपने जमीन में लगे पेडो को पोकलैंड आदि से उखाड़ रहे हैं।

इसके लिए किसी प्रकार की अनुमति भी नहीं ली जाती है। पेड़ की ठूंठ भी नहीं बचा रहे हैं। ऐसे नजारे छुरा अंचल में हर तरफ देखने को मिल रहे हैं। इस पर रोक लगाने ना तो वन विभाग कार्रवाई कर रहा है और ना ही राजस्व विभाग जिससे लोगों के हौसले बुलंद हैं। नियमों को ताक में रखकर अवैध रूप से कटाई कर रहे है। इससे लोग जंगलों की अंधाधुंध कटाई की जा रही है। इसकी बारीकी से जांचकर पट्टा जारी करना चाहिए।

इन्हें है अधिकार:

वनाधिकार कानून दो किस्म के लोगों को वन में रहने का अधिकार देता है। पहले वे जो आदिवासी हैं और जंगल में रहते हैं। दूसरे वे जो परंपरागत रूप से वनवासी हैं तथा जंगल के उत्पादों पर पिछले 75 सालों से निर्भर हैं। कानून की धारा 6 में इन दावों को परखने की प्रक्रिया है। एक बाद दावा सही पाए जाने पर उन्हें वन भूमि, उसके प्रयोग और संरक्षण व सुरक्षा का अधिकार मिल जाता है।

जबकि संसद में पारित आधे-अधूरे वन अधिकार कानून से यह समस्या हल नहीं हुई है। जैसे मनरेगा से रोजगार की समस्या हल नहीं हो सकती, सूचना के अधिकार से प्रशासनिक सुधार का काम पूरा नहीं हो जाता, प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून से देश में भूख एवं कुपोषण खत्म नहीं होने वाला हैं, उसी तरह वन-अधिकार कानून भी ज्यादातर एक दिखावा ही साबित हुआ है।

जो वन विनाश का कारण बनते जा रहा है जबकि भारत के जंगलों पर पहला अधिकार वहां रहने वाले लोगों का है, उनकी बुनियादी जरुरतें सुनिश्चित होनी चाहिए, तथा अंग्रेजों द्वारा कायम वन विभाग की नौकरशाही को तुरंत भंग करके स्थानीय भागीदारी से वनों की देखरेख का एक वैकल्पिक तंत्र बनाना चाहिए। भारत के जंगल क्षेत्रों में खदबदा रहे असंतोष का दूसरा कोई इलाज नहीं हैं। और यही जंगलों एवं वन्य प्राणियों के भी हित में हो सकता है।

पात्रता

इस कानून के तहत पात्रता के दो चरण हैं। प्रथमतः किसी भी दावेदार को यह साबित करना है कि वह मुख्यतः वनों के वाशिन्दा है और जीविकोपार्जन के लिए वनों तथा वन-भूमि पर निर्भर है (अपने वास्तविक जीविकोपार्जन के लिए)। द्वितीयतः दावेदारों को यह साबित भी करना है कि उपर्युक्त स्थिति पिछले 75 साल से बनी हुई है और इस मामले में वे अन्य पारम्परिक वनवासी हैं – धारा 2(ओ), अथवा वे अनुसूचित जाति के हैं और उस इलाके में रह रहे हैं जहाँ वे अनुसूचित – धारा 2(सी) और 4(1) हैं और वे वनवासी अनुसूचित जनजाति के हैं।

अधिकार

तीन बुनियादी अधिकारों को मान्यता दी गई है :
1. विभिन्न प्रकार की जमीन, जिसकी निर्धारण की आधार तिथि 13 दिसम्बर, 2005 है (अर्थात उस तिथि से पूर्व से उस पर उसका कब्जा है और वह उसे जोत रहा है) और यदि कोई दूसरा दस्तावेज उपलब्ध न हो तो प्रति परिवार 4 हेक्टेयर की भू-हदबन्दी लागू होगी।
2. पारम्परिक रूप से लघु वनोत्पाद, जल निकायों, चरागाहों आदि का उपयोग कर रहा हो।
3. वनों एवं वन्य-जीवों की रक्षा एवं संरक्षण। यह वह अन्तिम अधिकार है जो इस कानून का अति क्रान्तिकारी पक्ष है। यह उन हजारों ग्रामीण समुदायों के लिए महत्त्वपूर्ण है जो वन माफियाओं, उद्योगों तथा जमीन पर कब्जा करने वालों के खतरों से अपने वनों तथा वन्य जीवों की रक्षा में लगे हुए हैं। इनमें से अधिकतर वन विभाग की साँठगाँठ से इस काम को अंजाम देते हैं। पहली बार यह वास्तविक रूप से भावी जनतान्त्रिक वन प्रबन्धन का द्वार खोलता है और इसकी सम्भावना पैदा करता है।

प्रक्रिया

कानून की धारा 6 में तीन चरण वाली इस प्रक्रिया की व्यवस्था है जिसके अनुसार, यह तय किया जाएगा कि किसे अधिकार मिले। प्रथम ग्राम सभा (पूरी ग्राम सभा, ग्राम पंचायत नहीं) सिफारिश करेगी कि कितने अरसे से कौन उस जमीन को जोत रहा है, किस तरह का वनोउत्पाद वह लेता रहा है, आदि। यह जाँच ग्राम सभा की वनाधिकार समिति करेगी, जिसके निष्कर्ष को ग्राम सभा पूरी तरह स्वीकार करेगी। ग्राम सभा की सिफारिश भी छानबीन के दो चरणों से गुजरेगी- ताल्लुका और जिला स्तरों पर। जिला स्तरीय समिति का फैसला अन्तिम होगा (धारा 6) (6) ।

इन समितियों में छह सदस्य होंगे − तीन सरकारी अधिकारी और तीन निर्वाचित सदस्य। दोनों − ताल्लुका और जिला स्तरों पर कोई भी व्यक्ति, जो यह समझता है कि दावा गलत है, इन समितियों के सामने अपील दायर कर सकता है और यदि उसका दावा साबित हो जाता है तो दूसरों को अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा (धारा 6 (2) और 6 (4) । इस कानून के तहत स्वीकृत जमीन न बेची जा सकेगी और न उसका अधिकार दूसरे को हस्तान्तरित किया जा सकेगा।लेकिन छुरा क्षेत्र में अधिकारियों का अपना खुद का विधान चलता है जिसके चलते अब वन विनाश की कगार पर खड़ा है।

क्या कहते है जिला कलेक्टर:
इस संबंध में जिला कलेक्टर श्याम धावड़े से चर्चा करने पर उन्होंने कहा कि पेड़ों की अवैध कटाई नियम विरुद्ध किसी भी कार्य को बर्दाश्त नही किया जायेगा मैं अभी एसडीएम को निर्देशित कर जाँच करवाता हूँ।

Back to top button