भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ थे दिलीप कुमार के अच्छे संबंध

दिलीप कुमार 2000-2006 तक राज्य सभा के सदस्य भी रहे

मुंबई: भारतीय सिनेमा के दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार ने 98 साल की उम्र में अंतिम सांस ली. दिलीप कुमार का निधन हो गया है. दिलीप कुमार के निधन से बॉलीवुड और देश में शोक की लहर है, कई दिग्गज उन्हें नमन कर रहे हैं.

‘अल्लाह का नूर चेहरे को रोशन रखेगा’

दिलीप कुमार अपनी आत्मकथा ‘दिलीप कुमार- वजूद और परछाई’ में अपने बचपन के दिनों का जिक्र करते हुए कहते हैं कि एक फकीर ने एक बार उनके बारे में घोषणा की थी कि ये कोई आम बालक नहीं है.

वो कहते हैं, ‘फकीर ने मेरी दादी से कहा था कि यह बच्चा बहुत मशहूर होने के लिए और असाधारण ऊंचाइयों पर पहुंचने के लिए बना है. इस लड़के का अच्छी तरह ध्यान रखना, इसे दुनिया की नज़रों से बचाकर रखना, अगर तुमने इसे बुरी नज़रों से बचा लिया तो यह लड़का बुढ़ापे में भी खूबसूरत रहेगा.’

‘अगर इसे बचाना चाहती हो तो इसे काला टीका लगाकर उसका चेहरा बिगाड़कर रखो अगर नहीं रखा तो इसे समय से पहले ही खो दोगी. अल्लाह का नूर इसके चेहरे को हमेशा रोशन रखेगा.’

दिलीप कुमार के चेहरे पर वही खूबसूरती का नूर आज भी झलकता है जो उनके चाहने वालों ने 1950 के दशक में देखा होगा.

भाषा पर पकड़ और पढ़ने का शौक

दिलीप कुमार की फिल्मों या उनके साक्षात्कारों को ध्यान से देखा जाए तो एक बात जो साफ झलकती है वो उनकी भाषा की स्पष्टता है. जब वो बोलते हैं तब हिंदी, उर्दू और अंग्रेज़ी में समान अधिकार रखते हैं.

दिलीप कुमार-वजूद और परछाई के फॉर्वर्ड में उनकी पत्नी और अपने समय की जानी-मानी अदाकारा सायरा बानो कहती हैं, ‘शब्दों और भाषा के ऊपर उनकी ऐसी जबरदस्त पकड़ है चाहे अंग्रेज़ी हो या उर्दू और मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि ऐसा कहने वाली मैं अकेली नहीं हूं.’

बानो कहती हैं, ‘उनके असंख्य चाहने वालों में कुछ ही लोग जानते हैं कि दिलीप कुमार बहुत बड़े पढ़ाकू थे. चाहे वह कोई उपन्यास हो, चाहे नाटक या जीवनी, क्लासिक साहित्य के लिए उनका प्यार सबसे बढ़कर था.’

ये जानना दिलचस्प है कि फ्योदोर दास्तोव्यस्की, टेनिसन विलियम्स और जोसेफ कोनराड उनके प्रिय लेखकों में से थे. दिलीप साहब को कला, शास्त्रीय संगीत और नृत्य का भी काफी शौक है. इसकी झलक उनकी कई फिल्मों में भी दिखती है.

एक्टिंग के स्टाइल को बदल दिया

1950 के दशक में भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े अभिनेताओं में राज कपूर, देवानंद और दिलीप कुमार थे. तीनों ही अपने समय के बेहतरीन अभिनेता थे. लेकिन एक्टिंग (अदाकारी) के स्टाइल के जिस रूप को दिलीप साहब ने पर्दे पर उतारा उसने भारतीय सिनेमा में एक बड़ा बदलाव ला दिया. इसे तकनीकी तौर पर मेथड एक्टिंग कहा जाता है.

मेथड एक्टिंग के भारत या विदेश में प्रचलन में आने से बहुत पहले दिलीप कुमार ने भावपूर्ण अभिनय का अपना ही सलीका ईजाद किया.

बानो बताती हैं कि दिलीप साहब एक बार में एक फिल्म में ही काम करते थे और यह उनके संपूर्ण समर्पण और उनकी एकाग्रता के कारण था.

दिलीप कुमार खुद अपनी आत्मकथा में कहते हैं, ‘इसमें बेहद खतरा रहता है कि आप एक फिल्म में ही काम करें जबकि दूसरे एक्टर एक समय में दो या तीन फिल्में कर रहे होते थे. मैंने यह तय किया कि मैं एक समय में एक ही फिल्म करूंगा. यह सिर्फ अपने चुने हुए विषय के प्रति मेरा विश्वास होता था और वह मेहनत जो मैं उस भूमिका के लिए करता था.’

यही कारण है कि अपने पांच दशक से भी ज्यादा के फिल्मी सफर में उन्होंने 60 के करीब ही फिल्में कीं.

उदयतारा नायर जो कि दिलीप कुमार और सायरा बानो की काफी करीबीं हैं, उन्होंने ही उनके जीवन को पन्नों पर उतारा है. उनका कहना है कि दिलीप साहब पर जो किताबें लिखी गईं उनमें काफी भ्रामक सूचनाएं हैं और वो खुद भी इस बात को स्वीकारते हैं.

आज़ादी की लड़ाई में हुई गिरफ्तारी

पेशावर (अब पाकिस्तान) के किस्सा ख्वानी बाज़ार में 1922 में यूसुफ खान (जो आगे चलकर दिलीप कुमार बने) का जन्म हुआ. दिलचस्प बात ये है कि इसी सप्ताह खैबर पख्तूनख्वा के पुरातत्व और संग्रहालय निदेशालय ने दिलीप कुमार और राज कपूर के पुश्तैनी मकानों का अधिग्रहण किया है और इसे जल्द ही संग्रहालय में तब्दील किया जाएगा.

दिलीप कुमार के पिता मुंबई में फलों के बड़े कारोबारी थे और शुरुआती दिनों में वो भी अपने पारिवारिक काम में लगे हुए थे. लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने ब्रिटिश आर्मी क्लब पूना में काम करना शुरू किया. वहां उन्होंने फलों और सैंडविच का एक स्टाल लगाने की अनुमति ली. जिससे उनके ब्रिटिश अफसरों के साथ रिश्ते अच्छे बने बल्कि इसके चलते क्लब में और भी लोग आने लगे.

इसी बीच उन्होंने एक दिन भारत की आज़ादी की लड़ाई का समर्थन किया और उसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद वे फिर से अपने पिता के कारोबार में लग गए.

देविका रानी से मुलाकात और पहचान में तब्दीली

एक दिन उनकी मुलाकात बॉम्बे टाकीज़ फिल्म प्रोडक्शन हाउस की मालकिन देविका रानी से हुई जो उस समय तक मशहूर अदाकारा बन चुकी थीं. देविका रानी ने उन्हें फिल्मों में काम करने का ऑफर दिया जिसे दिलीप कुमार ने स्वीकार लिया.

इसी बीच देविका रानी ने यूसुफ खान से उनका नाम बदलने का प्रस्ताव रखा जिसे सुनते ही वो हैरान रह गए. अपनी आत्मकथा में दिलीप कुमार ने इसका विस्तार से जिक्र किया है.

देविका रानी ने उन्हें दिलीप कुमार नाम सुझाया जिसे उन्होंने कुछ देर सोचने के बाद स्वीकार लिया और तब से लेकर आज तक हर कोई उन्हें दिलीप कुमार के नाम से जानता है.

दिलचस्प बात ये है कि भारतीय सिनेमा जगत में यूसुफ खान अकेले नहीं हैं जिन्होंने अपनी पहचान बदली बल्कि ऐसा करने वालों में बड़-बड़े कलाकार शामिल हैं.

ऐसा करने वालों में राज कपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर, अशोक कुमार, देवानंद, गुरू दत्त, धर्मेंद्र, जॉनी वाकर, रजनीकांत, राजेश खन्ना, सुनील दत्त, अक्षय कुमार जैसे नाम शामिल हैं. दर्शकों के बीच एक सहज और सरल छवि पेश करने के लिए ही ऐसा किया जाता रहा है.

फिल्मी सफर की शुरुआत

1944 में दिलीप कुमार की पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा ‘ आई, जो ज्यादा कमाल नहीं दिखा सकी. उस वक्त वो केवल 22 साल के ही थे. देविका रानी ने उनकी काबिलियत भांप ली थी और उन्होंने दिलीप कुमार को फिर मौका दिया.

कुछ शुरुआती असफलताओं के बाद 1947 में आई फिल्म जुगनू सफल रही जिसमें दिलीप कुमार के साथ नूरजहां थीं. इसके बाद 1948 में शहीद और मेला भी उनकी सफल फिल्में रहीं. इसके बाद 1949 में आई महबूब खान की फिल्म अंदाज काफी सफल रही जिसमें राज कपूर और नरगिस भी थे.

1950 के बाद दिलीप कुमार ने एक से बढ़कर एक फिल्में की. जिनमें तराना, संगदिल, अमर, इंसानियत, नया दौर, यहूदी, मधुमति, पैगाम, आन (पहली टेक्नीकलर फिल्म), मुगल-ए-आज़म, कोहिनूर, आज़ाद, लीडर, दाग , गोपी, राम और श्याम शामिल हैं. इन फिल्मों ने उन्हें ट्रैजेडी किंग के तौर पर भारतीय सिनेमा में स्थापित कर दिया.

अदाकारी और संगीत

अपने समय की मशहूर अभिनेत्री मधुबाला और वैजयंती माला के साथ दिलीप कुमार ने कई फिल्में की.

मधुबाला के साथ दिलीप साहब तराना, अमर, मुगल-ए-आज़म में नज़र आए वहीं वैजयंती माला के साथ उन्होंने सबसे ज्यादा फिल्में की. इसमें नया दौर, मधुमति, गंगा जमुना, संघर्ष, पैगाम, लीडर, देवदास जैसे बेहतरीन फिल्में शामिल हैं.

1940 के उत्तरार्द्ध में सिनेमा के केंद्र में संगीत की भूमिका बढ़ने लगी. दिलीप साहब की फिल्मों में भी संगीत कमाल का होता था. एक्टिंग में बदलाव और संगीत को तवज्जो ने सिनेमा को तो बदला ही बल्कि दर्शकों का एक बड़ा वर्ग तैयार हुआ जिसने इस तब्दीली को सराहा.

दिलीप साहब की अदाकारी तो शानदार होती ही थी लेकिन उन फिल्मों का संगीत भी गजब होता था. 1952 में आई फिल्म आन को ही लिया जाए तो इसमें दिलीप कुमार के साथ निम्मी और नादिरा काम कर रही थीं. इस फिल्म का संगीत नौशाद साहब ने दिया था. इस फिल्म का एक गीत- ‘दिल में छुपाकर प्यार का तूफान ले चले ‘ आज भी लोगों की पसंद है.

इसी तरह 1957 में आई फिल्म नया दौर उस समय की बड़ी हिट थी. इस फिल्म के गानों को याद करें तो मांग के साथ तुम्हारा, मैंने मांग लिया संसार और उड़े जब जब जुल्फें तेरी में दिलीप कुमार के किरदार में एक अलग रुहानगी नज़र आती है. मुगल-ए-आज़म फिल्म के रोमांटिक सीन्स में भी दिलीप साहब ने कमाल की अदाकारी की है.

इसमें दोराय नहीं है कि दिलीप साहब एक बड़े फलक के कलाकार हैं जिन्होंने न केवल सिनेमा के रंग-ढंग को बदला बल्कि उसे संजीदगी से पर्दे पर उतारने के लिए खुद बड़ी मेहनत की. अपनी आत्मकथा में वो इस बात को खुद स्वीकारते भी हैं.

राजनीति

दिलीप कुमार ने अपने लंबे सफर में कुछ क्षण राजनीति को भी दिया. भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ उनके अच्छे संबंध थे और नेहरू उन्हें काफी पसंद करते थे.

महाराष्ट्र में बाल ठाकरे और शरद पवार उनके अच्छे दोस्तों में से रहे हैं. दिलीप कुमार के बीमार होने की खबर सुनते ही 6 जून को शरद पवार उनसे अस्पताल में मिलने पहुंचे.

दिलीप कुमार 2000-2006 तक राज्य सभा के सदस्य भी रहे. 1994 में उन्हें दादा साहेब फाल्के सम्मान, 1991 में पद्म भूषण, 2015 में पद्म विभूषण से नवाजा गया. 1998 में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान निशान-ए-इम्तियाज़ से सम्मानित किया.

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