ईष्ट देव चले न जाएं कहीं इसलिए जंजीर से जकड़ कर रखते हैं आदिवासी

नईम खान

बिलासपुर।

इसे आदिवासी समाज की आस्था कहें या इष्ट देव के प्रति अगाध श्रद्धा। उनके पालनहार उनको छोड़कर कहीं और न चले न जाएं इसलिए उन्हें जंजीर से जकड़कर रखते हैं। पुरखों की यह परंपरा अब भी चली जा रही है। आदिवासियों के बीच यह मान्यता है कि उनके पालनहार उनके पास ही हैं।

बिलासपुर जिले के ग्राम गोढ़ा, दमदम, धनसलिहा, खम्हरिया, कनचोट्टी व केसला ये ऐसे गांव हैं जहां आदिवासियों की बहुलता है। इनके इष्ट देव जिसे ये लोग पाठ बाबा के नाम से पुकारते हैं। गोढ़ा की दुर्गम पहाड़ियों के बीच पाठ बाबा का मंदिर है। जहां बाबा सालों से जंजीर से जकड़े हुए हैं।

जंजीरों में जकड़े होने के बाद भी उनसे नाराज नहीं होते बल्कि उनकी रक्षा करते हैं। आदिवासियों के बीच अपने इष्ट देव पाठ बाबा के प्रति आस्था ऐसी कि पांच किलोमीटर पैदल चलकर दुर्गम पहाड़ियों को पार करते हैं।

बाबा के लिए एक चबूतरा बनाया गया है। चबूतरे पर बाबा घोड़े पर बैठे नजर आते हैं। बदलाव सिर्फ इतना होता है कि खुले में बाबा के रहने के कारण जंजीर पांच से सात वर्ष में खराब हो जाती है। लिहाजा आदिवासी समाज जंजीरों को हर पांच साल में बदल देते हैं।

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