दो टूक (श्याम वेताल) – मैं तुम्हें बोनस दूंगा, तुम मुझे वोट देना…!

shyam vetal
श्याम वेताल

आजादी की लड़ाई के दौरान सुभाष चंद्र बोस ने भारतवासियों से कहा था कि तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा. यह नारा आज भी सुभाष चंद्र बोस की याद के साथ जुड़ा हुआ है. इसी नारे की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में एक नया नारा गूंजा है- मैं तुम्हें बोनस दूंगा, तुम मुझे वोट देना. यह बोनस किसानों को दिया जा रहा है और बदले में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के लिए वोट मांगा जा रहा है.
पिछले दिनों मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कवर्धा में बोनस तिहार कार्यक्रम के दौरान अपने संबोधन में कहा कि बोनस बटन मैं दबा रहा हूं, वोट बटन आपको दबाना है.
क्या इसे ही अंग्रेजी में ‘गिव एंड टेक पॉलिसी’ कहते हैं? हिंदी में शायद ‘एक हाथ ले तो दूसरे हाथ दे’ कहते होंगे.
इस लेन-देन को क्या नाम दिया जाए- दान, दक्षिणा, प्रलोभन या उत्कोच? नहीं… नहीं. उत्कोच का अर्थ तो रिश्वत होता है. यह उत्कोच नहीं हो सकता. राजनीति में यह चलता है. जनता को कुछ देकर समर्थन मांगना गैरवाजिब नहीं है हां… चुनाव में कुछ देकर वोट मांगना गलत होता है. सिर्फ गलत ही नहीं अपराध भी होता है. चुनाव आयोग इस पर आपत्ति कर सकता है.
लेकिन छत्तीसगढ़ में अभी चुनाव आने में साल भर से अधिक का वक्त है इसलिए चुनाव आयोग भी आपत्ति नहीं कर सकता है.
चलिए… उत्कोच नहीं तो क्या यह दान है? लेकिन सुना है कि दान देने के बाद उसका बखान नहीं किया जाता. शेष पृष्ठ 11 पर…

बखान तो क्या… एक हाथ से दिये गये दान का पता दूसरे हाथ को नहीं होना चाहिए. बहरहाल यह दान भी नहीं है.
दान नहीं है तो क्या यह दक्षिणा है? किंतु दक्षिणा तो श्रद्धा भाव से दी जाती है. उसकी भी घोषणा नहीं होती है.
प्रलोभन…? हां यह हो सकता है लेकिन साल भर पहले इस प्रलोभन को कौन याद रखेगा? यह बात शासन-प्रशासन भी जानता है. इसलिए यह प्रलोभन भी नहीं है.
सबसे बड़ी बात यह है कि इसे कोई नाम क्यों दिया जाय? किसानों को यह जो बोनस मिल रहा है, यह कोई कृपा राशि नहीं है. यह तो किसानों का अधिकार है जो विलंब से मिल रहा है दो साल से विपक्ष एवं किसान बोनस के लिए संघर्ष कर रहे थे. यह तो उन्हें मिलना ही था. देर से दिया जा रहा है, इसका क्षोभ होना चाहिए सरकार को. लेकिन जिस तरह इसे त्यौहार बनाकर दिया जा रहा है, उससे दो बातें स्पष्ट हो रही है. एक तो यह कि सरकार बोनस देते हुए एहसान जताना चाहती है और दूसरे यह कि इस एहसान के बदले में वोट की भी उम्मीद करती है.
ईमानदारी की बात यह है कि बोनस वितरण का काम चुपचाप होना चाहिए था, त्यौहार के रूप में नहीं. इतना ही नहीं, इस बोनस के बदले किसानों से वोट की अपेक्षा इसी वक्त नहीं करनी चाहिए थी. इसे चुनाव प्रचार के समय किया जा सकता था.
इस संदर्भ में एक और प्रश्न मन-मस्तिष्क में आता है. चुनाव आयोग की सारी शक्तियां चुनाव के समय ही क्यों जागृत होती है? किसानों, गरीबों मजदूरों, दलितों, आदिवासियों के अधिकार और लाभ देते समय सरकार वोट की अपेक्षा क्यों करें? अगर करती है तो चुनाव आयोग इसे संज्ञान में क्यों नहीं लेता. पारदर्शी राजनीति के दौर में अधिकार और लाभ लौटाने के पीछे वोटों की मंशा को गैरवाजिब करार देने में चुनाव आयोग पहल क्यों नहीं करता?

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