दो टूक (श्याम वेताल) : राजस्थान सरकार का कमाल, ले आई काला कानून

shyam vetal
श्याम वेताल
बिहार में एक वक्त था जब थाने में किसी यादव के खिलाफ कोई शिकायत पहुंचती थी तो तुरंत एफ.आई.आर. दर्ज नहीं की जाती थी. जुर्म चाहे कितना भी बड़ा हो, शिकायतकर्ता को निराश होना पड़ता था क्योंकि जब तक ‘ऊपर’ से एफ.आई.आर. दर्ज करने की हरी झंडी नहीं मिलती, थानेदार रिपोर्ट दर्ज नहीं करता था. जी हां, यह लालू-राबड़ी शासनकाल की बात है लेकिन रिपोर्ट लिखने से मना करने का कोई लिखित आदेश नहीं था, यह मौखिक ही था.
लालू-राबड़ी शासन को आज हम भले बुरा-भला कहें लेकिन राजस्थान की वसुंधरा सरकार ने तो कमाल ही कर दिया. नेताओं और अफसरों को बचाने के लिए कानून ही बना दिया. इतना ही नहीं, पत्रकारों एवं सोशल मीडिया के भी हाथ बांध दिये. राजस्थान के इस नए कानून के अनुसार किसी भी नेता या सरकारी अफसर के खिलाफ थाने में एफ.आई.आर. तब तक दर्ज नहीं होगी जब तक सरकार की मंजूरी न मिल जाय. 180 दिन यानी 6 महीने तक अनुमति नहीं मिली तो एफ.आई.आर.अपने आप दर्ज हो जाएगी. उधर, मीडिया ने अगर उस शिकायत की खबर बनाई और सरकारी अफसर या नेता के नाम का खुलासा किया तो रिपोर्ट लिखने वाले पत्रकार को 2 साल की जेल हो सकती है.
हालांकि भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाले इस कानून का जबरदस्त विरोध होना शुरू हो गया है. कांग्रेस ने तो इसे काले कानून की संज्ञा दी है. कांग्रेस का कहना है कि नरेंद्र मोदी तो कहते हैं कि न खाऊंगा न खाने दूंगा लेकिन उनकी एक मुख्यमंत्री ने यह कानून लाकर यह कहने की कोशिश की है कि खुद भी खाऊंगी, तुमको भी खाने दूंगी.
इस कानून का विरोध करने में न केवल कांग्रेस और मीडिया आगे हैं बल्कि राजस्थान भाजपा के एक वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवारी ने भी झंडा उठा दिया है. उन्होंने स्पष्ट कहा कि मुख्यमंत्री इस कानून के जरिए ईमानदार अफसरों एवं नेताओं का संरक्षण नहीं कर रही है बल्कि बेईमानों को बचा रही है. इस कानून को लाकर उन्होंने प्रेस की स्वतंत्रता का भी गला घोंटा है.
ऐसा लगता है कि राजस्थान सरकार मदान्ध हो गई है और ऐसा कानून लाकर उसने अपने पराभव का रास्ता खोल दिया है. मीडिया के हाथ बांधने का दुष्परिणाम इंदिरा गांधी ने भी भोगा था. 26 जून 1975 को आपात स्थिति लागू करने के साथ प्रेस की स्वतंत्रता भी उन्होंने छीन ली थी. नतीजा यह हुआ कि जनता ने उन्हें सत्ता से हटा दिया और उन्हें जेल भी जाना पड़ा. अब 2017 में वसुंधरा जी ने प्रेस की स्वतंत्रता के साथ छेड़छाड़ की है. निश्चित रुप से उन्हें इसके परिणाम भुगतने पड़ेंगे.
हालांकि, छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों में ऐसे किसी बिल की जरुरत ही नहीं है, बिहार की तरह अघोषित कानून इन राज्यों में पहले से ही लागू है जहां बिना बिल लाए ही नेता पूर्ण सुरक्षित और अफसर अति सुरक्षित हैं. जो अफसर रात में सत्ता केंद्र की ओर मुंह करके नहीं सोता उसके घर पर छापे पड़ जाते हैं कुछ की नौकरी भी चली जाती है.
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