क्या आप जानते है की मास कितने प्रकार के है

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव:

सौर मास

सूर्य के क्रमशः बारह राशियों में रहने से सौर मास बनते हैं। जब सूर्य मेष में प्रवेश करता है, तो वैशाख सौर मास का आरंभ होता है। इसी तरह क्रमशः वृष में प्रवेश से ज्येष्ठ मास, मीन राशि में चैत्र मास का आरंभ होकर बारह सौर मास बनते हैं।

चंद्र मास

भारतवर्ष में दो प्रकार के चंद्र मासों का प्रचलन है, एक शुक्लादि चंद्र मास जो एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या तक होता है तथा दूसरा चंद्रमास कृष्णादि चंद्र मास जो पूर्णिमा से पूर्णिमा तक होता है। दोनों ही प्रकार के चंद्र मासों का नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को होता है।

जो शुक्लादि वर्ष का अनुसरण करते हैं उनके लिए चैत्र शुक्ल पक्ष के बाद चैत्र कृष्ण पक्ष आता है तथा कृष्णादि चंद्र मास पद्धति में चैत्र शुक्ल पक्ष के बाद वैशाख कृष्ण पक्ष आता है जो अधिकतर उŸारी भारत में प्रयोग होता है। व्रत का आरंभ, श्राद्ध, नवगृह निर्माण एवं गृह प्रवेश आदि अनेक मुहूŸार्ं में चंद्र मास का ही प्रयोग होता है।

सावन मास

एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय का मान लेकर 30 दिनों का एक सावन माह होता है जो आजकल प्रायः लुप्त है।

अधिक मास

जिस सौर मास में 2 अमावस्या होती है अर्थात अमावस्या 2 बार एक ही सूर्य राशि में हो जाती है तब एक मास की अधिकता हो जाती है। इसे अधिक मास कहते हैं। शुभ कृत्यों में यह वर्जित है अर्थात सूर्य संक्रांति-रहित शुक्लादि चंद्रमास अधिक मास कहलाता है।

क्षय मास

जिस सौर मास में अमावस्या होती ही नहीं उसे क्षय मास कहते हैं। दो सूर्य संक्रांतियों वाला शुक्लादि चंद्रमास क्षय मास कहलाता है। शुभ कृत्यों में यह भी वर्जित है। जो कार्य बृहस्पति तथा शुक्र ग्रह के अस्त होने पर नहीं होते वही कार्य क्षय तथा अधिक मास में भी नहीं होते।

क्षय व अधिक मास में तीर्थ स्नान, दान, कथा श्रवण आदि कार्य, प्रायश्चित, यज्ञ आदि किये जाते हैं।

उत्तरायण और दक्षिणायन से अभिप्राय

क्रान्तिवृत्त के प्रथमांश का विभाजन उत्तर व दक्षिण गोल के मध्यवर्ती ध्रुवों के द्वारा माना गया है। यही विभाजन उत्तरायण और दक्षिणायण कहलाता है।

उत्तरायन

उत्तरायन को सौम्यायन भी कहा जाता है। मकर के सायन सूर्य से लेकर मिथुन के सायन सूर्य तक उत्तरायण कहलाता है। साधारणतया लौकिक मतानुसार यह माघ से आषाढ़ पर्यन्त माना जाता है।

सूर्य उŸार की ओर चले तो उŸारायण होता है। सौम्यायन सूर्य की कालावधि को देवताओं का दिन माना गया है एवं इस समय में सूर्य देवताओं का अधिपति होता है। शिशिर, वसन्त और ग्रीष्म ये तीन ऋतुएँ उत्तरायन सूर्य का संगठन करती हैं।

दक्षिणायण

कर्क के सायन सूर्य से धनु राशिस्थ सायन सूर्य तक का मध्यान्तर दक्षिणायण संज्ञक है। दक्षिणायण में वर्षा, शरद और हेमन्त ऋतु त्रय की संगति होती है। यह समय देवताओं की रात्रि माना गया है। सूर्य दक्षिण की ओर गति करे तो दक्षिणायन होता है।

नोट : सायन सूर्य मकर, कुंभ, मीन, मेष, वृष, मिथुन में उŸारायण और शेष राशियों में दक्षिणायन कहलाता है।

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री 8178677715, 9811598848

ज्योतिष आचार्या रेखाकल्पदेव पिछले 15 वर्षों से सटीक ज्योतिषीय फलादेश और घटना काल निर्धारण करने में महारत रखती है। कई प्रसिद्ध वेबसाईटस के लिए रेखा ज्योतिष परामर्श कार्य कर चुकी हैं।

आचार्या रेखा एक बेहतरीन लेखिका भी हैं। इनके लिखे लेख कई बड़ी वेबसाईट, ई पत्रिकाओं और विश्व की सबसे चर्चित ज्योतिषीय पत्रिकाओं में शोधारित लेख एवं भविष्यकथन के कॉलम नियमित रुप से प्रकाशित होते रहते हैं।

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