डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को मरना पंसद था पर सिद्धांतों से समझौता करना नहीं

- प्रस्तुति एडवोकेट ओजस दास

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक भारतीय शिक्षाविद चिन्तक राजनेता और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे । उन्हें एक प्रखर राष्ट्रवादी के रूप में जाना जाता है । पंडित जवाहर लाल नेहरू मंत्रीमण्डल में उद्योग और आपूर्ति मंत्री रहे पर पंडित नेहरू के साथ मतभेदों के कारण मंत्री मण्डल और कांग्रेस पार्टी से त्याग-पत्र देकर एक नई राजनैतिक पार्टी भारतीय जनसंघ की स्थापना की । केन्द्र सरकार में मंत्री बनने से पहले वे पश्चिम बंगाल सरकार में वित्त मंत्री रह चुके थे । मात्र 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय में कुलपति बनने का रिकार्ड उनके नाम है। वे इस पद पर नियुक्ति पाने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे ।

डॉ० मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के एक अत्यंत प्रतिष्ठित परिवार में हुआ । उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी एक शिक्षाविद के रूप में विख्यात थे । उनकी माता का नाम जोगमाया देवी था । उमा प्रसाद मुखोपाध्याय उनके छोटे भाई थे । उन्होंने सन 1917 में मैट्रिक किया तथा 1921 में बी०ए०की परीक्षा प्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण की । इसके बाद उन्होंने बंगाली विषय में एम.ए. भी प्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण किया और सन 1924 में कानून की भी पढ़ाई पूरी की ।

इस प्रकार उन्होंने अल्पायु में ही विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएॅं अर्जित की और शीघ्र ही उनकी ख्याति एक शिक्षाविद् और लोकप्रिय प्रशासक के रूप में फैल गई । सन 1924 में पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट में वकालत के लिए पंजीकरण कराया । सन 1926 में वो इंग्लंैड चले गए और 1927 में बैरिस्टर बन कर वापस भारत आ गए । सन 1934 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बनने वाले वे सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे । डॉ मुखर्जी इस पद पर सन 1938 तक बने रहे । सन 1937 में उन्होंने गुरू रविंद्रनाथ टैगोर को कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भाषण के लिए आमंत्रित किया । कलकत्ता विश्वविद्यालय के इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी ने दीक्षांत समारोह का भाषण बंग्ला में दिया हो ।

डॉ मुखर्जी के राजनैतिक जीवन की शुरूआत सन 1929 में हुई जब उन्होंने कांग्रेस पार्टी के टिकट पर बंगाल विधान परिषद् में प्रवेश किया परन्तु जब कांग्रेस ने विधान परिषद् के बहिष्कार का निर्णय लिया तब उन्होंने इस्तीफा दे दिया । इसके पश्चात उन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़े और चुने गए । सन 1941-42 में वह बंगाल राज्य के वित्त मंत्री रहे । 1937 से 41 के बीच जब कृषक प्रजा पार्टी और मुस्लिम लीग की साझा सरकार थी तब वो विपक्ष के नेता थे और जब फजलुल हक के नेतृत्व में एक प्रगतिशील सरकार बनी तब उन्होंने वित्त मंत्री के तौर पर कार्य किया पर एक साल बाद ही इस्तीफा दे दिया इसके बाद धीरे धीरे वे हिन्दुओं के हित की बात करने लगे और हिन्दू महासभा में शामिल हो गये । 1944 में वे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भी रहे ।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लम लीग की साम्प्रदायिकयतावादी राजनीति का विरोध किया था उस समय जिन्ना मुसलमानों के लिए बहुत ज्यादा रियायत की मांग रहे थे और पाकिस्तान आंदोलन को भी हवा दे रहे थे । उन्होंने मुस्लिम लीग के साम्प्रदायिकतावादी दुष्प्रचार से हिन्दुओं की रक्षा के लिए कार्य किया और मुस्लम तुष्टिकरण की नीति का विरोध किया ।

डॉ०मुखर्जी धर्म के आधार पर विभाजन के कट्टर विरोधी थे उनके अनुसार विभाजन संबंधी परिस्थिति ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से उत्पन्न हुई थी वे यह भी मानते थे कि सत्य यह है कि हम सब एक है और हममें कोई अंतर नहीं है हम सब एक ही भाषा और संस्कृति के हैं और एक ही हमारी विरासत है । इस मान्यता के साथ आरंभ में उन्होंने देश के विभाजन का विरोध किया था पर 1946-47 के दंगों के बाद उनके इस सोच में परिवर्तन आया । उन्होंने महसूस किया कि मुस्लिम लीग के सरकार में मुस्लिम बाहुल्य राज्य में हिन्दूओं का रह पाना असुरक्षित होगा । इसी कारण 1946 में उन्होंने बंगाल विभाजन का समर्थन किया ।

स्वतंत्रता के बाद जब पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतूत्व में सरकार बनी तब डॉ०श्यामा प्रसाद मुखर्जी गांधी जी और सरदार पटेल के अनुरोध पर भारत के पहले मंत्रीमण्डल में शामिल हुए और उद्योग व आपूर्ति मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली । भारत के संविधान सभा और प्रांतीय संसद के सदस्य एवं केन्दीय मंत्री के तौर पर उन्होंने अपना विशिष्ट स्थान बना लिया परन्तु उनके राष्ट्रवादी सोच के कारण कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ उनका मतभेद बराबर बना रहा । अंतत: 1950 में नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में उन्होंने 6 अपै्रल 1950 को मंत्रीमण्डल से त्याग पत्र दे दिया । इसके बाद उन्होंने नए राजनैतिक दल की स्थापना की जो उस समय सबसे बड़ा विरोधी दल था । इस प्रकार अक्टूबर 1951 भारतीय जनसंघ का उद्भव हुआ । 1952 के चुनाव में भारतीय जन संघ ने कुल तीन सीटें जीती जिसमें एक उनकी खुद की सीट शामिल थी ।

डॉ०मुखर्जी जम्मू कश्मीर का एक अलग दर्जा दिये जाने के घोर विरोधी थे और चाहते थे कि जम्मू कश्मीर को भी भारत के अन्य राज्यों की तरह माना जाये । वे जम्मू कश्मीर के अलग झंडे,अलग निशान और अलग संविधान के पक्ष में कदापि नहीं थे । उनको ये बात भी नागवार लगती थी कि वहां का मुख्यमंत्री वजीरे आजम अर्थात प्रधानमंत्री कहलाए । उन्होंने देश की संसद में धारा 370 को समाप्त करने की जोरदार वकालत की । अगस्त 1952 में उन्होंने बिना परमिट लिए जम्मू कश्मीर में प्रवेश का एलान किया और अपने इस मिशन को पूरा करने के लिये वे 1953 में बिना परमिट के जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े । वहां पहुंचते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी जो राष्ट्रवादी विचारधारा वाले जनमानस के लिए गहरी क्षति साबित हुई ।

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