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दियागड़ार का टीला कहीं पिण्डारियों का खूनी अड्डा तो नहीं

पिण्डारियों से मुठभेड़ में मिली थी ‘पेण्ड्रा की जमींदारी’, खुदाई में मिलेंगे कई चौंकाने वाले तथ्य

– राजू तिवारी

डियागड़ार  के निर्जन स्थान में भगवान शंकर जी का मन्दिर।
डियागड़ार के निर्जन स्थान
में भगवान शंकर जी का मन्दिर।

बिलासपुर : कटनी रेल मार्ग पर अवस्थित पेण्डरा (पेण्ड्रा) क्या पिण्डारियों का खतरनाक अड्डा था? यह बात प्रत्येक भाषा वैज्ञानिक, पुराविद्, इतिहास लेखक और खोजी पत्रकारिता का प्रिय विषय रह है. मराठा काल के पतन के बाद जब पिण्डारियों के संगठित गिरोह ने देश भर में भयंकर लूटपाट और हत्याओं ऐसा खूनी खेला जिसके कारण अंग्रेज भी एकबारगी थर्रा गए. वृहद प्रमाणिक शब्दकोष का उल्लेख करते हुए विकिलिक्स ने लिखा है कि दक्षिण भारत की एक जनजाति का नाम ‘पिण्डारा’ है जो कर्नाटक और महाराष्ट्र में छितरे, खेतिहार पिछड़े समुदाय से थे. बाद में इनमें से एक बड़े हिस्से ने इस्लाम धर्म अपना लिया. इसके बावजूद हिन्दु पिण्डारियों की पहचान बनी रही. पिण्डारियों में दो तरह के शस्त्रधारी थे. जिसमें एक तलवार रखते थे तो दूसरा भाला (बरछा). ऐसा माना जाता है कि पेण्डरा (पेण्ड्रा) के पास रहने वाले पिण्डारियों का समूह बरछाधारी था. सघन वन कानन ‘पेण्ड्रावन’ में बचखार नामक गांव है. भाषाविद् डॉ. विनय कुमार पाठक के अनुसार ‘बरछे का वार’ का अपभ्रंश ‘बचरखार’ हो सकता है.

इसी तरह ‘बंजारी घाट’ चूंकि पिण्डारी समूह में तमाम जातियों के खूंखार और ताकतवर लोगों का समूह हुआ करता था. संभव है पिण्डारियों के साथ बंजारा जाति के लोग भी रहे हों. १८१७ में ईस्ट इण्डिया कंपनी के गवर्नर वॉरेन हेस्टिंग्स ने हिन्दुस्तान में पदभार ग्रहण किया. उस समय देश में ५०,००० पिण्डारी थे जो देश के भीतर भयंकर उत्पाक मचाया हुआ था. १७ वीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर १८ वीं सदी तक इनका इतना भयंकर आतंक रहा. जिस प्रदेश के राजाओं पर मराठा शासकों की नजर रहती या उस राज्य के खिलाफ युद्ध की हालत बनती उस शत्रु राज्य में पिण्डारियों को खून, खराबा, लूटपाट की खुली छूट होती थी. इसी क्रम में १६ वीं, १७ वीं सदी ईस्वी में छत्तीसगढ़ की राजधानी रतनपुर जैसे ताकतवर राज्य को कमजोर करने के लिए मराठा शासकों ने पिण्डारियों को छूट दे दी गई थी. इस बात की पुष्टि करते हुए पेण्ड्रा गढ़ी के वर्तमान १८ वें युवा शासक, राजा उपेन्द्र बहादुर सिंह ने कहा-हमारे पूर्वज पितृ पुरुष हिन्दु सिंह और छिन्दु सिंह को कलचुरी राजा ने वीरता और ईमानदारी के कारण ही पेण्ड्रा जमींदारी दी थी.

टीले के पास से तिपान नदी जंहा आयुद्ध बनाने की फैक्ट्री बताई जाती है।
टीले के पास से तिपान नदी जंहा आयुद्ध बनाने की फैक्ट्री बताई जाती है।

उपरोक्त दोनों भाई ग्वालियर तोमर राजपूत परिवार से थे और जीविकोपार्जन की तलाश में राजधानी रतनपुर आए थे. अत्यन्त बलिष्ठ करीब सवा छह फीट के तन्दुरुस्त, गौर वर्णीय व्यक्तित्व वाले दोनों घुड़सवार भाई गतंव्य की ओर जा रहे थे कि काली ग्राम वर्तमान नाम कारीआम के जंगल में एक अजीब खतरनाक दृश्य देखा कि-भीषण जंगल के मध्य ४-५ वर्दीधारी सैनिकों पर ८-१० लोगों ने जानलेवा हमला कर दिया है. तलवार और भाले से लड़ रहे ८-१० लोग वर्दीधारी सैनिकों पर भारी पड़ रहे थे. हिन्दु सिंह, छिन्दु सिंह ने देखा कि इन्हें नहीं बचाया तो ये लोग मारे जाएंगे. तब दोनों भाईयों ने उसी क्षण निर्णय लिया और सैनिकों की तरफ से लड़ाई में कूद पड़े और देखते ही देखते हारी हुई बाजी सैनिकों के पाले में हो गई और लूटेरे किसी तरह जान बचाकर भाग खड़े हुए. दूसरी ओर इस भय से कहीं वे लोग वापस न आ जाएं यह सोचकर विचार सैनिक रवाना हो गए. जाने के बाद दोनों भाई बात करते हुए सोच रहे थे तभी उनमें से एक ने देखा कि-गड्ढे में एक बड़ा थैला पड़ा है.

पुराने बरगद के नीचे खुले आसमान में मिट्टी के दिये और मिट्टी के बढ़े बडे चिलम  आदि मिलते है।आश्चर्य की बात ही कि यंहा किसी भक भगवान का विग्रह नही है।
पुराने बरगद के नीचे खुले आसमान में मिट्टी के दिये और मिट्टी के बड़े – बड़े चिलम आदि मिलते है।आश्चर्य की बात ही कि यंहा
किसी भगवान का विग्रह नही है।

फटे हुए हिस्से से कुछ सोने, चांदी की मोहरें जमीन में गिरे हुए हैं. वे लोग समझ गए कि सैनिकों को लूटने की नियत से लूटेरों ने हमला किया था. स्फूर्ति के साथ उन्होंने थैले में मोहरों को समेटा और सैनिकों को वापस देने के लिए जिस दिशा में सैनिक गए थे उसी दिशा में घोड़ों को ऐड़ लगा दी. धूल उड़ाते दोनों भाईयों के प्रशिक्षित घोड़े हवा से बातें करने लगे. जब घुड़सवार सैनिकों ने धूल भरी आंधी की तरह आते देखा तो उन्होंने सोचा कि संगठित लूटेरे उन्हें मारने फिर से आ रहे हैं. इन लोगों ने भी भय के कारण घोड़ों की रफ्तार बढ़ा दी और थोड़ी ही देर बाद सैनिक रतनपुर राजमहल के सामने पहुंच गए. तब तक दोनों भाई पास आ गए. दोनों को देखकर सैनिक खुश हो गए. वे लोग कुछ बोलते दोनों भाईयों ने सोने-चांदी के मोहरों से भरा वह थैला सैनिकों के सरदार के हाथों में सौंप दी. जब दोनों भाई जाने लगे तब सरदार ने उन्हें रोका और तत्कालीन कलचुरी राजा से दोनों भाईयों की भेंट कराई और दोनों की दिलेरी, वीरता और ईमानदारी की बात बताते हुए कहा कि राज्य की कर वसूली करके आते समय पिण्डारियों से किस तरह घिर गए थे.

डियागड़ार का टीला जिसके नीचे पिंडारियों के इतिहास दबे होने की संभावना बताई जा रही है।
डियागड़ार का टीला जिसके
नीचे पिंडारियों के इतिहास
दबे होने की संभावना बताई जा रही है।

यदि ये दोनों नहीं आते, हमें नहीं बचाते तो हमारी जान चली जाती और वसूली के रुपए भी. दोनों भाईयों से प्रभावित होकर कलचुरी राजा ने पेण्ड्रा जमींदारी की बागडोर हिन्दु सिंह, छिन्दु सिंह को सौंप दी. ७७४ वर्गमील में फैली जमींदारी में ४५ ग्राम और ८ नदियों के साथ सबसे बड़ा तोहफा ‘तीर्थराज अमरकण्टक’ था. जहां से देश की पवित्र नदी नर्मदा उद्गमित है. पुराने समय में पेण्ड्रा से अनेक स्थानों के लिए आवाजाही का व्यवसायिक मार्ग हुआ करता था. अमरकण्टक के अलावे कोरिया, सरगुजा, शहडोल, सोहागपुर, धनपुर, चैतुरगढ़, जगन्नाथपुरी आदि. चूंकि पिण्डारियों का निश्चित स्वभाव सिर्फ राहजनी करना और लूटपाट के बाद शिकार को मौत की नींद सुलाना ही उनका लक्ष्य हुआ करता था. इसलिए भी पेण्डरा उनका स्थायी खुफिया अड्डा होने की प्रबल संभावना है. पेण्ड्रा गढ़ी के वर्तमान १८ वें शासक राजा उपेन्द्र बहादुर सिंह जो अपने पूर्वजों के इतिहास सहित पुरानी राजकीय व्यवस्था के प्रति अत्यन्त सजग व उत्सुक है. उन्होंने इस बारे में मुझे जो जानकारी दी है वह पिण्डारियों के संबंध में प्रमाणिकता के अत्यन्त निकट है.

कथा किवदन्तियों, भौगोलिक विशेषताओं के कारण भी स्थानों के नाम पड़ते हैं. वैसे पेण्ड्रा से मात्र ५ कि.मी. की दूरी पर एक चम्बल में जिस तरह डाकुओं के छिपने के लिए बीहड़ है ठीक उसी तरह इस स्थान पर भी है. यह स्थान ‘दियागड़ार’ के नाम से जाना जाता है. वहां एक छोटा सा भगवान शंकर का पुराना मंदिर है. इसके अलावे बरगद के पुराने वृक्ष के नीचे किसी भी भगवान, देवी, देवताओं का विग्रह नहीं है. किन्तु वहां मिट्टी के दिए, मिट्टी के बर्तन और एक विशिष्ट बनावट वाले बड़े-बड़े मिट्टी के चिलम बिखरे पड़े है. कभी-कभार भूले भटके लोग पूजा-अर्चना करते हैं. इसके अलावे विशेष ध्यान देने वाली बात-एक टीलानुमा थोड़ी बड़ी पहाड़ी है. पहाड़ी के नीचे बगल से तिपान नदी बहती है.

इस बारे में उपेन्द्र बहादुर के अनुसार यह पहाड़ी सहित पूरा इलाका रहस्यमय है. उन्होंने कहा-यदि इस स्थान की खुदाई की गई तो कहीं पिण्डारियों का ‘खुफिया अड्डा’ दुनिया के सामने प्रकट हो जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं. उन्होंने पेण्ड्रा बुजुर्गों से भी चर्चा की तो बुजुर्गों ने बताया कि दियागड़ार के पास तिपान नदी से किनारे ही आयुध बनाने का कारखाना हुआ करता था. बुजुर्गों के अनुसार यह जानकारी उनके पूर्वज बुजुर्गों से प्राप्त हुई थी. इतिहास कई बार किवदंतियों और परिस्थितिजनक साक्ष्य को लेकर भी चलता है. जाहिर है कि अवैध आयुध कारखाना उन दिनों चलाने की जरुरत आदि होती तो बहुत बड़े संगठित अपराधिक गिरोह को निश्चित होगी ही और उस काल में देश के भीतर ५० हजार ठग पिण्डारियों का गिरोह था जो किसी भी छोटे-मोटे राज्य के सैनिकों से निपटने में सक्षम भी था.

किसी राज्य की तरह एक अवैध और समानान्तर शासन पिण्डारियों का चलता था. इसलिए उन्हें तलवार-भाले आदि अस्त्र-शस्त्रों की जरुरत थी और ऐसे स्थान उनके के लिए सुरक्षित भी थे. दियागड़ार के बारे में अनेक साहित्यकार भाषा विदों से मेरी चर्चा हुई. चूंकि पिण्डारियों के इर्द-गिर्द जितनी भी चीजें मिलेंगी या नामों का उल्लेख भी होगा तो स्थान आदि के नाम भी हिंसात्मक होंगे. ‘दियागड़ार’ को यदि उस रुप में लेते हैं तो लगता है पिण्डारी शिकारी को मारकर गड़ा देते होंगे. पिण्डारियों द्वारा सहज ढंग से इस स्थान का नाम ‘दियागड़ार’ रख दिया गया होगा परंतु इसकी पुष्टि तभी होगी जब पुरातत्व विभाग की खुदाई के दौरान नरकंकाल मिलें.

पिण्डारियों के रहने का एक और विशेष कारण यह भी है कि १८१२ से लेकर १८१६ तक पिण्डारियों ने पांच वर्षों के भीतर समूचे देश में बुंदेलखण्ड, निजाम राज्य हैदराबाद, उत्तर प्रदेश और सीपी एण्ड बरार अर्थात अविभाजित मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में भयंकर लूटपाट और हत्याओं का थर्रा देने वाला नरसंहार किया जिसके कारण अंग्रेजों की हुकुमत हील गई. ईस्ट इंडिया के तत्कालीन गवर्नर वॉरेन हेस्टिंग्स ने पिण्डारियों के उन्मूलन अभियान की बागडोर अंग्रेज अफसर विलियम स्लीमैन के हाथों में सौंप दी.

उसने अपना हेडक्वार्टर कटनी बनाया. लगता है अंग्रेजों को इस बात की सूचना रही हो कि यह गिरोह मैकल पर्वत श्रेणी या नर्मदांचल में रहकर देश के विभिन्न स्थानों में अंजाम देकर वापस बीहड़ में छिप जाते हैं. यहीं से स्लीमैन ने भी पिण्डारियों का पूरे देश से सफाया किया. १८ वीं सदी के अंत १९ वीं सदी के प्रारंभ तक मराठा शासक का इन्हें संरक्षण प्राप्त था. इसलिए शिन्दे ने नर्मदा घाटी में मालवा क्षेत्र की जमीन पिण्डारियों को दे दी थी और वहां से भी दूर-दूर राज्यों में पिण्डारी धावा बोलते थे.

फिलहाल भौगोलिक परिस्थितियां पेण्ड्रा जमींदारी का इतिहास, समीपवर्ती बचरखार, बंजारी घाट जैसे नामों के अलावे दियागड़ार की रहस्यमय पहाड़ी, बीहड़ और दिया, चिलम वाली जगह परिस्थितिजन्य साक्ष्य है. राज्य सरकार टीले की खुदाई करेगी तो इतिहास का अनदेखा रक्तरंजित अतीत उभर कर सामने आ सकता है. आशा है कि छत्तीसगढ़ शासन गंभीरता को समझते हुए ठोस कदम उठाएंगी.

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