तनाव के कारण हम मुस्कुराना भूल रहे हैं: ब्रह्माकुमारी रश्मि दीदी

रायपुर: राजयोग शिक्षिका ब्रह्माकुमारी रश्मि दीदी ने कहा कि तनाव के कारण हमारे जीवन से मुस्कुराहट गायब होती जा रही है। राजयोग हमें जीवन जीने की कला सिखलाता है। अब हमें परिस्थितियों और घटनाओं के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखकर चलना होगा। सुखी रहने के लिए हर परिस्थिति में खुश रहना सीखना होगा।

ब्रह्माकुमारी रश्मि दीदी आज प्रजापिता ब्रह्मïाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय द्वारा विश्व शान्ति भवन चौबे कालोनी रायपुर में आयोजित राजयोग अनुभूति शिविर के अन्तर्गत सृष्टि चक्र विषय पर अपने विचार व्यक्त कर रही थीं। उन्होंने कहा कि एक छोटा बच्चा सारे दिन में दो सौ से अधिक बार मुस्कुराता है। क्योंकि वह तनावमुक्त रहता है।

वही बच्चा जब बड़ा होता है तो तनाव में आकर मुस्कुराना भूल जाता है। उन्होंने बतलाया कि वर्तमान समय विश्व इतिहास का अत्यन्त महत्वपूर्ण समय कलियुग और सतयुग के बीच का छोटा सा युग- संगम युग चल रहा है। अब कलियुग समाप्त होकर एक नया और सतोप्रधान युग- सतयुग आने वाला है।

इस संधिकाल अथवा संगम युग में ही परमात्मा आकर ज्ञान-योग के माध्यम से मनुष्य आत्माओं के संस्कार परिवर्तन का कार्य करते हैं। उन्होंने युगों का दर्शन कराते हुए बतलाया कि जैसे दिन और रात्रि का चक्र होता है, ऋतुओं का चक्र होता है। ठीक उसी प्रकार सृष्टि का भी चक्र होता है।

इसको चक्र इसलिए कहा है क्योंकि एक निश्चित समय के अन्तराल के बाद इनकी पुनरावृत्ति होती है। सृष्टि चक्र में चार बराबर-बराबर युग होते हैं। पहले सतयुग आता है, फिर त्रेतायुग, द्वापरयुग और अन्त में कलियुग आता है। कलियुग के अन्त में सृष्टि परिवर्तन के लिए परमात्मा का दिव्य अवतरण भारतभूमि पर होता है।

अभी वही कल्याणकारी पुरूषोत्तम युग चल रहा है। जबकि परमात्मा एक बुढ़े व्यक्ति के शरीर में परकाया प्रवेश करते हैं और राजयोग की शिक्षा देकर हमारे संस्कार परिवर्तन का दिव्य कर्तव्य करते हैं। उन्होंने बतलाया कि सतयुग-त्रेतायुग मेंं राजा और प्रजा सभी सुखी थे। वहाँ एक धर्म, एक राजा और एक भाषा थी।

द्वापर से भिन्न-भिन्न धर्म पैगम्बरों का आगमन हुआ। यहाँ पर धर्मसत्ता और राजसत्ता अलग-अलग हो गए। उन्होंने अपने -अपने धर्मों की स्थापना कर मनुष्यों को सुख-शान्ति का मार्ग प्रशस्त किया।

किन्तु अब तमोप्रधान होने के कारण कलियुग में अनेक धर्म, अनेक भाषा और अनेक मत हो गए। किसी भी धर्म में ताकत नहीं रही। धर्मों की स्थापना मनुष्य मात्र के कल्याण और उन्नति के लिए हुई थी किन्तु आज यही धर्म लड़ाई-झगड़े का कारण बन रहे हैं।

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