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अहिंसक रीति से गोरक्षा का प्रयत्न करनेवाले कई कार्यकर्ताओं की हत्याएँ हुईः भागवत

नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने सरकार को आगाह करते हुए कहा है कि आर्थिक सुधार और नीतियां बनाते समय जमीनी हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। भागवत संघ मुख्यालय में विजयादशमी के अवसर पर आयोजित वार्षिक उत्सव के अवसर पर बोल रहे थे। उन्होंने आर्थिक विशेषज्ञों,सलाहकारों और नीति निर्धारकों से अनुरोध करते हुए कहा कि वह अर्थशास्त्र की पुरानी परिपाटियों को पीछे छोड़कर व्यावहारिक सोच अपनाएं और देश की जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए आर्थिक नीतियां तय करें।

विजयदशमी के पर्व पर आरएसएस मुख्यालय में यहां एक घंटे के अपने संबोधन में भागवत ने अवैध शरणार्थियों, गौ रक्षकों, जम्मू कश्मीर की स्थिति और आर्थिक हालात जैसे कई विषयों का जिक्र किया। मोहन भागवत ने कहा कि गौरक्षा से जुड़े हिंसा व अत्याचार के बहुर्चिचत प्रकरणों में जाँच के बाद इन गतिविधियों से गौरक्षक कार्यकर्ताओं का कोई संबंध सामने नहीं आया है। इधर के दिनों में उलटे अहिंसक रीति से गोरक्षा का प्रयत्न करनेवाले कई कार्यकर्ताओं की हत्याएँ हुई हैं।

उसकी न कोई चर्चा है, न कोई कार्रवाई। उन्होंने कहा कि वस्तुस्थिति न जानते हुए अथवा उसकी उपेक्षा करते हुए गौरक्षा व गौरक्षकों को हिंसक घटनाओं के साथ जोड़ना व सांप्रदायिक प्रश्न के नाते गौरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगाना ठीक नहीं है।

उन्होंने कहा‘ आज हमें ऐसी आर्थिक नीति की दरकार है जो सिर्फ बड़े उद्योगपतियों के फायदे की न हों बल्कि जिसमें मझोले और छोटे कारोबारियों तथा किसानों के हितों का भी पूरा ख्याल रखा जाए। ऐसा इसलिए जरूरी है क्योंकि ये छोटे उद्योग ही थे जो वैश्विक मंदी के दौर में भी अपना अस्तित्व बचाए रखने में कामयाब रहे थे। उस खतरनाक दौर में देश की अर्थव्यवस्था को इन्होंने ने ही मजबूत आधार दिया था।

संघ प्रमुख ने कहा कि आर्थिक नीतियां तय करते समय उनमें रोजगार सृजन और उचित पारिश्रमिक को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सरकार को चाहिए कि वह लोगों में उद्यमिता को बढ़ावा दे। इसके लिए उनके कौशल विकास में मदद करे।

संघ प्रमुख का यह बयान ऐसे समय आया है जबकि देश की आर्थिक नीतियों को लेकर पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली के बीच घमासान चल रहा है। सिन्हा ने नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचने का हवाला देते हुए सरकार की आर्थिक नीतियों पर बड़े सवाल खड़े किए हैं।

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