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बर्थडे विशेष: इस ‘सवाल’ ने कलाम को बना दिया था ‘मिसाइल मैन’

खास होकर, आम जिंदगी बिताने वाले देश के 11वें राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम पूरे देश के लिए एक आदर्श उदाहरण हैं. उनकी कामयाबी के किस्से तो सारी दुनिया में मशहूर हैं.

लेकिन इस कामयाबी के पीछे क्या संघर्ष था, ये शायद कम ही लोग जानते हैं. आज उनके जन्मदिन पर जानिए कलाम साहब की जिंदगी से जुड़े प्रेरणादायक किस्से…

कलाम का जन्म (रामेश्वरम) तमिलनाडु के छोटे से गांव धनुषकोडी में एक मध्यमवर्ग मुस्लिम परिवार में हुआ. पर कौन जानता था गरीब परिवार में जन्मा एक लड़का विज्ञान की दुनिया में छा जायेगा.

उनका कहना था कि ‘तुम जैसे सपने देखोगे वैसे ही बन जाओगे’ कलाम को चीजों की जानने और जिज्ञासा में काफी रुचि थी.

अक्सर उन्हें उड़ती हुई चिड़ियां काफी आकर्षित करती थी. 5वीं कक्षा में पढ़ने वाले कलाम ने एक दिन टीचर से पूछ ही लिया ‘आखिर ये चिड़िया उड़ती कैसे है?

कलाम ‘एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी’ में आने के पीछे अपनी पांचवी क्लास के टीचर सुब्रह्मण्यम अय्यर को बताते हैं. वो कहते हैं, ‘वो हमारे अच्छे टीचर्स में से थे.

एक बार उन्होंने क्लास में पूछा कि चिड़िया कैसे उड़ती है? क्लास के किसी छात्र ने इसका उत्तर नहीं दिया तो अगले दिन वो सभी बच्चों को समुद्र के किनारे ले गए.

वहां कई पक्षी उड़ रहे थे. कुछ समुद्र किनारे उतर रहे थे तो कुछ बैठे थे. वहां उन्होंने हमें पक्षी के उड़ने के पीछे के कारण को समझाया साथ ही पक्षियों के शरीर की बनावट को भी विस्तार पूर्वक बताया जो उड़ने में सहायक होता है.

उन्होंने बताया कि अय्यर द्वारा समझाई गई ये बातें मेरे अंदर इस कदर समा गई कि मुझे हमेशा महसूस होने लगा कि मैं रामेश्वरम के समुद्र तट पर हूं और उस दिन की घटना ने मुझे जिंदगी का लक्ष्य निर्धारित करने की प्रेरणा दी.

बाद में मैंने तय किया कि उड़ान की दिशा में ही अपना करियर बनाउं. मैंने बाद में फिजिक्स की पढ़ाई की और मद्रास इंजीनियरिंग कॉलेज से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में पढ़ाई की.

अखबार बेचते थे:कलाम साहब के पिता जैनुलाब्दीन न तो ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, ना ही पैसे वाले थे. अपने पिता की मदद के लिए स्कूल जाने से पहले वे अखबार बेचा करते थे. शाम को स्कूल से लौटते वक्त कलाम अखबार के पैसों की वसूली के लिए जाते थे.

खंभे के नीचे बैठकर पढ़ते थे: उस दौरान बिजली नहीं होती थी इसलिए वह बिजली के खंभों के नीचे बैठकर पढ़ते थे. मद्रास इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में स्कॉलरशिप पाने के लिए उन्होंने तीन रात तक जगकर अपनी थीसिस पूरी की थी.

दो सूटकेस में हुए राष्ट्रपति भवन से विदा: 1962 में वे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में आए, जहां उन्होंने सफलतापूर्वक कई उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में अपनी भूमिका निभाई.

कलाम इतने साधारण स्वभाव के थे कि जब वह देश के राष्ट्रपति बनकर राष्ट्रपति भवन गए तो उनके हाथ में दो सूटकेस थे. जब राष्ट्रपति भवन छोड़ा तब वह वही दो सूटकेस के साथ विदा हुए.

40 यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्ट्रेट की मानद उपाधि दी है. उन्हें पद्मभूषण, पद्म विभूषण और भारत रत्न से भी नवाजा जा चुका है.

एक बार कुछ नौजवानों ने डॉ कलाम से मिलने की इच्छा जताई. इसके लिए उन्होंने उनके ऑफिस में एक पत्र लिखा. कलाम ने राष्ट्रपति भवन के पर्सनल चैंबर में उन युवाओं से न सिर्फ मुलाकात की बल्कि काफी समय उनके साथ गुजार कर उनके आइडियाज भी सुनें.

आपको बता दें कि डॉ कलाम ने पूरे भारत में घूमकर करीब 1 करोड़ 70 लाख युवाओं से मुलाकात की थी.

कलाम ने अपने जीवन के आखिरी शब्दों से जाते-जाते एक आदर्श नागरिक के लिए सवाल छोड़ दिया. सवाल ये कि, इस दुनिया को इस धरती को कैसे जीने लायक बनाया जाए?

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राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम
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