शिक्षा के माध्यम से भी जगाई जा सकती है राष्ट्रीयता की भावना

राष्ट्रीयता के महत्व से कोई भी इनकार नहीं कर सकता। दो दिवसीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में विषय विशेषज्ञों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों द्वारा राष्ट्रीयता से संबंधित विभिन्न विषयों पर शोध पत्र प्रस्तुत किये गये।

रायपुर:  हमने जिस भूमि में जन्म लिया है, उस भूमि के प्रति लगाव होना आवश्यक है और यही राष्ट्रीयता है। राष्ट्रीयता हमारी पहचान है। भारत का मुस्लिम भी यदि अरब देश में जाता है तो उसे भारतीय मुस्लिम के रूप में जाना जाता है। नागरिको ंमें राष्ट्रीयता का भाव शिक्षा के माध्यम से जगाया जा सकता है।

यह तमाम बातें पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व अध्ययनशाला एवं सरस्वती शिक्षा संस्थान, छत्तीसगढ़ प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में वर्तमान परिवेश में राष्ट्रीयता: आवश्यकता और चुनौतियाँ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के प्रथम दिवस विद्वानों ने कहीं। 

नौकरी का माध्यम बनती जा रही शिक्षा : 

राष्ट्रीय संगोष्ठी के सह-संयोजक पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय समाजशास्त्र अध्ययनशाला के सहायक प्राध्यापक डॉ. लुकेश्वर सिंह गजपाल ने कहा कि राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि स्कूल शिक्षा मंत्री केदार कश्यप थे। कश्यप ने कहा कि आज शिक्षा मात्र नौकरी प्राप्त करने का माध्यम बनते जा रही है।

अभिभावक भी यही चाहते हैं कि बच्चे पढ़-लिखकर नौकरी प्राप्त करें, अभिभावकों को यह विचार भी करना आवश्यक है कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा और अच्छी नौकरी के साथ-साथ एक अच्छे नागरिक बनें। उनमें राष्ट्रीयता का भाव भी जगे। मुख्य वक्ता विद्या भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. गोविन्द प्रसाद शर्मा ने कहा कि राष्ट्रीयता का भाव है जो बच्चा अपने आस-पास की मिट्टी, पेड़-पौधे और वातावरण से सीखता है। राष्ट्रीयता के समक्ष जो आज सबसे बड़ी चुनौती है, वह है जातिगत अस्मिता, नक्सलवाद। हम जिस भूमि में जन्में हैं, उसके प्रति हमें लगाव होना आवश्यक है, अपनी भूमि के प्रति समर्पण ही राष्ट्रीयता है। 

कड़वी सच्चाई शिक्षा विभाग की : 

प्रथम तकनीकी सत्र में वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार रमेश नैयर ने कहा कि नागरिकों में राष्ट्रीयता का भाव जगाने के लिए शिक्षा सबसे बड़ा माध्यम है। परन्तु हमारे देश में शिक्षा का कुल बजट 40,000 करोड़ है जबकि हमारे देश के राजनेता, उद्योगपति और अधिकारी अपने बच्चों की शिक्षा पर 42000 करोड़ रुपये प्रति वर्ष खर्च करते हैं।

इंग्लैंड 8 प्रतिशत खर्च करता है, भारत वर्तमान में 2.5 प्रतिशत खर्च करने की योजना बना रहा है। हमारे कर्णधारों को इस दिशा में सोचना चाहिए। विवेकानंद विद्यापीठ के सचिव ड़ॉ. ओमप्रकाश वर्मा ने कहा कि स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्रप्रेम व राष्ट्रीयता का सर्वोच्च आदर्श हमारे समक्ष रखा। उन्होंने कहा कि यदि भारत के गरीबों और दीन-दुखियों को देखकर आपकी छाती फटी जा रही है, रात में नींद नहीं आती, तब आप यह मानें आपने देशभक्ति की पहली सीढ़ी चढ़ी है।

दूसरी सीढ़ी है-क्या आपने अपने जीवन का पथ तय कर लिया है कि पर्वतकाय बाधाओं को भी पार कर देश के लिये काम करेंगे, ऐसा आपका संकल्प है। तीसरी सीढ़ी यह है कि क्या राष्ट्र सेवा के लिए आप अपनी स्त्री, पुत्र का भी साथ छोडऩे के लिए तैयार रहते हो। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. संजय कुमार पाटिल ने कहा कि शिक्षा के दो भाग होते हैं, स्कूल शिक्षा और उच्च शिक्षा। नैतिक मूल्यों की शिक्षा देने का कार्य स्कूल शिक्षा पर छोड़ दिया गया है। वर्तमान में दो वर्ष के बच्चों के भी स्कूल खुल गये हैं। 

अभिभावक नैतिक शिक्षा देने का कार्य स्वयं नहीं करना चाहते बल्कि शिक्षकों की समस्या समझते हैं। द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता करते हुए बिलासपुर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गौरीदत्त शर्मा ने कहा कि राष्ट्रीयता हमारी पहचान है, भारत का मुस्लिम यदि अरब देश में भी जाता है। तो उसे भारतीय मुस्लिम के रूप में जाना जाता है। राष्ट्रीयता के महत्व से कोई भी इनकार नहीं कर सकता। दो दिवसीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में विषय विशेषज्ञों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों द्वारा राष्ट्रीयता से संबंधित विभिन्न विषयों पर शोध पत्र प्रस्तुत किये गये।

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