ज्योतिष

आठवां भाव और अष्टम चंद्र

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव 8178677715, 9811598848

वैदिक ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार अष्टम भाव आयु एवं मृत्यु का भाव हैं। लग्न भाव के पश्चात अष्टम भाव का सबसे अधिक महत्व माना जाता है। एक दीर्घायु व्यक्ति ही जीवन में सुख, घर-परिवार, शिक्षा और सफलता का लाभ उठा सकता है। त्रिक भावों में से एक भाव होने के कारण इसे अशुभ और कष्टकारी भाव भी कहा जाता है।

अष्टम भाव से आयु की अंतिम सीमा, मृत्यु का स्वरूप, मृत्युतुल्य कष्ट, आदि का विचार किया जाता है। इसके अतिरिक्त यह भाव वसीयत से लाभ, पुरातत्व, अपयश, गंभीर व दीर्घकालीन रोग, चिंता, संकट, दुर्गति, अविष्कार, स्त्री का मांगल्य, स्त्री का धन व दहेज़, गुप्त विज्ञान व पारलौकिक ज्ञान, ख़ोज, किसी विषय में अनुसंधान, समुद्री यात्राएं, गूढ़ विज्ञान, तंत्र-मंत्र-ज्योतिष व कुण्डलिनी जागरण आदि विषयों से भी जुड़ा हुआ है।

भावत भावम सिद्धांत के अनुसार किसी भी भाव का स्वामी यदि अपने भाव से अष्टम स्थान में हो या किसी भाव में उस भाव से अष्टम स्थान का स्वामी आकर बैठ जाए अथवा कोई भी भावेश अष्टम स्थान में स्थित हो तो उस भाव के फल का नाश हो जाता है। गंभीर रोगों का विचार करने के लिए अष्टम भाव का विश्लेषण किया जाता है।

आकस्मिक घटनाओं और दुर्घटनाओं के लिए भी अष्टम भाव ही देखा जाता है। अष्टम भाव को बाधक भाव भी कहा जाता है। भाग्य भाव से द्वादश भाव होने के कारण यह भाग्य की हानि का भाव भी है। भाग्य के अभाव में व्यक्ति के धर्म और प्रतिष्ठा का नाश होता है।

अष्टम भाव तथा अष्टमेश की कल्पना ही मनुष्य के मन में अशुभता का भाव उत्पन्न कर देती है। परंतु ऐसी बात नहीं है कि भाव के कुछ विशिष्ट लाभ भी हैं। किसी भी स्त्री की कुंडली में अष्टम भाव का सर्वाधिक महत्व होता है क्योंकि यह भाव उस नारी को विवाहोपरांत प्राप्त होने वाले सुखों का सूचक है।

इस भाव से एक विवाहित स्त्री के मांगल्य (सौभाग्य) अर्थात उसके पति की आयु कितनी होगी तथा वैवाहिक जीवन की अवधि कितनी लंबी होगी, इसका विचार किया जाता है। यही कारण है कि इस भाव को मांगल्य स्थान भी कहा जाता है। इसके अलावा अध्यात्मिक क्षेत्र में सक्रिय व्यक्तियों के लिए भी अष्टम भाव एक वरदान से कम नहीं है क्योंकि यह भाव गूढ़ व परालौकिक विज्ञान, तंत्र-मंत्र-योग आदि विद्याओं से भी संबंधित है इसलिए बलवान अष्टम भाव व अष्टमेश की कृपा बिना कोई भी व्यक्ति इन क्षेत्रों में महारत हासिल नहीं कर सकता।

यही कारण है कि जो लोग सच्चे अर्थों में अध्यात्मिक व संत प्रवृति के हैं उनकी पत्रिका में अष्टम भाव, अष्टमेश तथा शनि काफी बली स्थिति में होते हैं। इस भाव का कारक ग्रह शनि है जो कि वास्तविक रूप में एक सच्चा सन्यासी व तपस्वी ग्रह है।

रहस्य, सन्यास, त्याग, तपस्या, धैर्य, योग-ध्यान व मानव सेवा आदि विषय बिना शनिदेव की कृपा के मनुष्य को प्राप्त हो ही नहीं सकते। इसके अतिरिक्त जो लोग ख़ोज व अनुसंधान के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं उनके लिए भी अष्टम भाव एक निधि (ख़ज़ाने) से कम नहीं है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि ज्योतिष में कोई भी भाव व ग्रह बुरा नही होता बल्कि प्रत्येक भाव व ग्रह की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं। कोई भी भाव व ग्रह मनुष्य के पूर्व कर्मों के अनुसार ही उसे अच्छा या बुरा फल देने के लिए बाध्य होता है।

अष्टम भाव एक नाश स्थान है इसलिए इसे निधन भाव भी कहते हैं। जिस भाव का स्वामी इस भाव में आ जाता है, उस भाव संबंधित विषयों को हानि पहुँचती है। जैसे – पंचम भाव का स्वामी यदि अष्टम भाव में आ जाए तो व्यक्ति को संतान संबंधित कष्ट होता है। इसी प्रकार यदि एकादशेश अष्टम भाव में बैठ जाए तो बड़े भाई-बहन की मृत्यु होती है।

अष्टम भाव का मनुष्य की आयु से घनिष्ठ संबंध है। आयु का निर्णय प्रधान रूप से अष्टम भाव व अष्टमेश से किया जाता है। इसके अतिरिक्त लग्न, लग्नेश, तृतीय भाव, तृतीयेश, चन्द्र व शनि जैसे ग्रह आदि भी आयुनिर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। किसी भी व्यक्ति की आयु उसके पूर्व व इस जन्म के कर्मों से प्रभावित होती है अर्थात मनुष्य जैसा कर्म करके आता है और इस जन्म में जैसा कर्म कर रहा होता है उसका प्रभाव मनुष्य की आयु पर निश्चित रूप से पड़ता है। इसलिए आयु का निर्णय करना एक जटिल विषय है।

फिर भी मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि यदि किसी भी पत्रिका में लग्न, लग्नेश, तृतीय भाव, तृतीयेश, अष्टम भाव, अष्टमेश तथा चन्द्र व शनि ग्रह बली अवस्था में हो तो व्यक्ति को दीर्घायु प्राप्त होती है। इसके विपरीत इन घटकों के कमजोर अवस्था में होने से व्यक्ति अल्पायु होता है।

व्यक्ति की मृत्यु किस प्रकार और कहाँ होगी इसका विचार भी अष्टम भाव से किया जाता है। यदि लग्नेश, तृतीयेश, एकादशेश तथा सूर्य आदि निजत्व के प्रतीक ग्रहों का प्रभाव अष्टम भाव तथा अष्टमेश पर पड़ता हो तो मनुष्य आत्मघात कर लेता है।

यदि षष्ठेश, एकादशेश तथा मंगल का प्रभाव अष्टम भाव व उसके अधिपति पर हो तो चोट अथवा दुर्घटना आदि के द्वारा व्यक्ति की मृत्यु होती है। अष्टम भाव व अष्टमेश पर पाप व क्रूर ग्रहों का प्रभाव किसी दुर्घटना, चोट, व आकस्मिक कष्ट के कारण मृत्यु को बताता है जबकि इन घटकों पर शुभ ग्रहों के प्रभाव से मनुष्य की मृत्यु शांतिपूर्ण ढंग से होती है।

अष्टम भाव एक सर्वाधिक अशुभ भाव है। इसके साथ साथ छठा, बारहवां भाव भी अशुभ माने गए हैं। यदि अष्टम भाव का स्वामी छठे अथवा बाहरवें भाव में बैठा हो और केवल पाप ग्रहों से प्रभावित हो तो विपरीत राजयोग का निर्माण करता है। जिसके फलस्वरूप मनुष्य को अत्यंत धन-संपति की प्राप्ति होती है। इसके पीछे गणित का यह तर्क है कि जब दो नकारात्मक चीजें मिलती हैं तो वह शुभ फलदायी हो जाती हैं।

अष्टम भाव सप्तम स्थान से द्वितीय है अर्थात यह जीवनसाथी की वाणी तथा उसके बोलने के व्यवहार को दर्शाता है। यदि अष्टम भाव का स्वामी पाप ग्रह होकर अन्य पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तो मनुष्य का जीवनसाथी कर्कश (कठोर व कड़वी) वाणी बोलने वाला होता है। इसके विपरीत यदि इन घटकों पर शुभ ग्रह का प्रभाव हो तो जीवनसाथी शिष्ट तथा मधुर वचन बोलने वाला होता है।

अष्टम भाव गूढ़ रहस्य, ख़ोज व अनुसंधान से संबंधित भाव है। तृतीय भाव अष्टम भाव से अष्टम है अतः यह भी गूढ़ ख़ोज तथा अनुसंधान से जुड़ा भाव है। पंचम भाव व्यक्ति की बुद्धि को दर्शाता है। इसलिए जब भी तृतीयेश तथा अष्टमेश का पंचम भाव तथा पंचमेश से संबंध बनता है तो व्यक्ति महान अविष्कारक, गूढ़ ख़ोज करने वाला, उच्च कोटि का अनुसंधानकर्ता होता है। यह अनुसंधान ग्रहों की प्रकृति के अनुरूप भौतिक या अध्यात्मिक जगत के किसी भी क्षेत्र से जुड़ा हो सकता है।

अष्टम भाव का गंभीर व असाध्य रोगों से भी संबंध है। जो रोग असाध्य तथा दीर्घकालीन होते हैं उनका विचार अष्टम भाव से ही किया जाता है। यदि अष्टम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति को नेत्र, हृदय तथा हड्डियों से संबंधित रोग होता है। यदि चन्द्र अष्टम भाव में हो तो मनुष्य को रक्त विकार, टी बी, मनोरोग आदि होता है।

मंगल अष्टम भाव में हो तो बवासीर, गुप्त रोग, गुप्त अंगों की शल्य चिकित्सा आदि होती है। यदि बुध अष्टम भाव में हो दमा, श्वास,वाणी, त्वचा, मस्तिष्क संबंधी विकार होते हैं। गुरु यदि अष्टम भाव में हो तो जिगर, तिल्ली आदि से संबंधित रोग होते हैं। यदि शुक्र अष्टम भाव में हो तो मनुष्य को वीर्य व काम शक्ति संबंधित रोग होते हैं। शनि अष्टम भाव में हो तो मनुष्य को दीर्घायु प्रदान करता है, परंतु उसे स्नायु तथा वायु संबंधित रोग होते हैं। यदि राहु-केतु अष्टम भाव में हो तो व्यक्ति को गुप्त रोग, गुप्त अंगों की शल्य चिकित्सा, मुख के रोग तथा कैंसर आदि असाध्य रोग होते हैं।

अष्टम स्थान सप्तम स्थान से द्वितीय है। अतः इसका संबंध विवाहोपरांत मिलने वाले सुखों से भी है। स्त्री के लिए यह उसके पति की आयु तथा उसके कुटुंब से प्राप्त होने वाले सुखों को दर्शाता है। अतः यदि अष्टम भाव तथा अष्टमेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो स्त्री का पति दीर्घायु होता है तथा ससुराल पक्ष से भी उस स्त्री को पूर्ण सुख मिलता है।

वसीयत या पैत्रिक संपति का विचार भी अष्टम भाव से किया जाता है। एकादश भाव लाभ का सूचक होता है जबकि द्वितीय तथा चतुर्थ भाव पैत्रिक धन-संपति तथा जायदाद के सूचक होते हैं। जब भी एकादशेश, द्वितीयेश तथा चतुर्थेश का संबंध अष्टम भाव व अष्टमेश से बनता है तब मनुष्य को अपने पूर्वजों की विरासत, पैत्रिक धन संपति व जायदाद प्राप्त होती है। सप्तम भाव से द्वितीय स्थान होने के कारण अष्टम भाव स्त्री के धन तथा ससुराल पक्ष से मिलने वाले धन का प्रतीक भी है क्योंकि आखिरकार दहेज़ अनार्जित धन का ही तो रूप है।

अष्टम भाव तथा अष्टमेश की कल्पना ही मनुष्य के मन में अशुभता का भाव उत्पन्न कर देती है। परंतु ऐसी बात नहीं है अष्टम भाव के कुछ विशिष्ट लाभ भी हैं। किसी भी स्त्री की कुंडली में अष्टम भाव का सर्वाधिक महत्व होता है। क्योंकि यह भाव उस नारी को विवाहोपरांत प्राप्त होने वाले सुखों का सूचक है।

इस भाव से एक विवाहित स्त्री के मांगल्य अर्थात उसके पति की आयु कितनी होगी तथा वैवाहिक जीवन की अवधि कितनी लंबी होगी, इसका विचार किया जाता है। यही कारण है कि इस भाव को मांगल्य स्थान भी कहा जाता है। इसके अलावा अध्यात्मिक क्षेत्र में सक्रिय व्यक्तियों के लिए भी अष्टम भाव एक वरदान से कम नहीं है। क्योंकि यह भाव गूढ़ व परालौकिक विज्ञान, तंत्र-मंत्र-योग आदि विद्याओं से भी संबंधित है इसलिए बलवान अष्टम भाव व अष्टमेश की कृपा बिना कोई भी व्यक्ति इन क्षेत्रों में महारत हासिल नहीं कर सकता।

यही कारण है कि जो लोग सच्चे अर्थों में अध्यात्मिक व संत प्रवृति के हैं उनकी पत्रिका में अष्टम भाव, अष्टमेश तथा शनि काफी बली स्थिति में होते हैं। इस भाव का कारक ग्रह शनि है जो कि वास्तविक रूप में एक सच्चा सन्यासी व तपस्वी ग्रह है।

रहस्य, सन्यास, त्याग, तपस्या, धैर्य, योग-ध्यान व मानव सेवा आदि विषय बिना शनिदेव की कृपा के मनुष्य को प्राप्त हो ही नहीं सकते। इसके अतिरिक्त जो लोग ख़ोज व अनुसंधान के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं उनके लिए भी अष्टम भाव एक निधि से कम नहीं है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि ज्योतिष में कोई भी भाव व ग्रह बुरा नही होता बल्कि हरेक भाव व ग्रह की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं। कोई भी भाव व ग्रह मनुष्य के पूर्व कर्मों के अनुसार ही उसे अच्छा या बुरा फल देने के लिए बाध्य होता है।

अष्टम भाव का मनुष्य की आयु से घनिष्ठ संबंध है। आयु का निर्णय प्रधान रूप से अष्टम भाव व अष्टमेश से किया जाता है। इसके अतिरिक्त लग्न, लग्नेश, तृतीय भाव, तृतीयेश, चन्द्र व शनि जैसे ग्रह आदि भी आयुनिर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

किसी भी व्यक्ति की आयु उसके पूर्व व इस जन्म के कर्मों से प्रभावित होती है अर्थात मनुष्य जैसा कर्म करके आता है और इस जन्म में जैसा कर्म कर रहा होता है उसका प्रभाव मनुष्य की आयु पर निश्चित रूप से पड़ता है।

इसलिए आयु का निर्णय करना एक जटिल विषय है। फिर भी मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि यदि किसी भी पत्रिका में लग्न, लग्नेश, तृतीय भाव, तृतीयेश, अष्टम भाव, अष्टमेश तथा चन्द्र व शनि ग्रह बली अवस्था में हो तो व्यक्ति को दीर्घायु प्राप्त होती है। इसके विपरीत इन घटकों के कमजोर अवस्था में होने से व्यक्ति अल्पायु होता है।

व्यक्ति की मृत्यु किस प्रकार और कहाँ होगी इसका विचार भी अष्टम भाव से किया जाता है। यदि लग्नेश, तृतीयेश, एकादशेश तथा सूर्य आदि निजत्व के प्रतीक ग्रहों का प्रभाव अष्टम भाव तथा अष्टमेश पर पड़ता हो तो मनुष्य आत्मघात कर लेता है।

यदि षष्ठेश, एकादशेश तथा मंगल का प्रभाव अष्टम भाव व उसके अधिपति पर हो तो चोट अथवा दुर्घटना आदि के द्वारा व्यक्ति की मृत्यु होती है। अष्टम भाव व अष्टमेश पर पाप व क्रूर ग्रहों का प्रभाव किसी दुर्घटना, चोट, व आकस्मिक कष्ट के कारण मृत्यु को बताता है जबकि इन घटकों पर शुभ ग्रहों के प्रभाव से मनुष्य की मृत्यु शांतिपूर्ण ढंग से होती है।

अष्टम भाव एक सर्वाधिक अशुभ भाव है। इसके साथ साथ छठा, बारहवां भाव भी अशुभ माने गए हैं। यदि अष्टम भाव का स्वामी छठे अथवा बाहरवें भाव में बैठा हो और केवल पाप ग्रहों से प्रभावित हो तो विपरीत राजयोग का निर्माण करता है। जिसके फलस्वरूप मनुष्य को अत्यंत धन-संपति की प्राप्ति होती है। इसके पीछे गणित का यह तर्क है कि जब दो नकारात्मक चीजें मिलती हैं तो वह शुभ फलदायी हो जाती हैं।

अष्टम भाव सप्तम स्थान से द्वितीय है अर्थात यह जीवनसाथी की वाणी तथा उसके बोलने के व्यवहार को दर्शाता है। यदि अष्टम भाव का स्वामी पाप ग्रह होकर अन्य पाप ग्रहों के प्रभाव में हो तो मनुष्य का जीवनसाथी कर्कश वाणी बोलने वाला होता है। इसके विपरीत यदि इन घटकों पर शुभ ग्रह का प्रभाव हो तो जीवनसाथी शिष्ट तथा मधुर वचन बोलने वाला होता है।

अष्टम भाव गूढ़ रहस्य, ख़ोज व अनुसंधान से संबंधित भाव है। तृतीय भाव अष्टम भाव से अष्टम है अतः यह भी गूढ़ ख़ोज तथा अनुसंधान से जुड़ा भाव है। पंचम भाव व्यक्ति की बुद्धि को दर्शाता है। इसलिए जब भी तृतीयेश तथा अष्टमेश का पंचम भाव तथा पंचमेश से संबंध बनता है तो व्यक्ति महान अविष्कारक, गूढ़ ख़ोज करने वाला, उच्च कोटि का अनुसंधानकर्ता होता है। यह अनुसंधान ग्रहों की प्रकृति के अनुरूप भौतिक या अध्यात्मिक जगत के किसी भी क्षेत्र से जुड़ा हो सकता है।

गुलजारी लाल नंदा जी की कुंडली में चंद्र अष्टम भाव में स्थित हैं। इस कुंडली की विशेषता है कि तीनों त्रिक भावेश एक साथ अष्टम भाव में स्थित हैं। एच डी देवगौड़ा जी की कुंडली में भी चंद्र अष्टम भाव में स्थित हैं। उमा भारती जी की कुंडली में भी चंद्र अष्टम भावस्थ है। दिलीप कुमार जी की कुंडली में चंद्र अष्टम भाव में हैं।

फलदीपिका में लिखा है कि अष्टम भाव में चंद्र हो तो बालक अल्पायु व रोगी होता है। एक अन्य ग्रंथ बृहदजातक में भी वर्णित है कि चंद्र छठा या आठवां हो व पापग्रह उसे देखें तो शीघ्र मृत्यु होगी। आठवें चंद्र को मृत्यु से जोड़ा गया है। यदि चंद्र अष्टम भाव में पाप ग्रह के साथ हो तो शीघ्र मरण कारक है।

अष्टम चंद्र को भय का प्रयाय व साक्षात मृत्यु का देवता मानते हैं. केवल मृत्यु या भयानकता ही अष्टम चंद्र का प्रतीक नहीं है वरन् आशा व जीवन का प्रतीक भी अष्टम चंद्र ही है। अतः अष्टम चंद्र का केवल नकारात्मक पक्ष ही नहीं, बल्कि इसके सकारात्मक पक्ष पर भी गहन विचार करने के बाद ही ज्योतिषी को अपना निर्णय सुनाना चाहिए।

• जातक परिजात में लिखा है कि जिस जातक का कृष्ण पक्ष में दिन का जन्म हो या शुक्ल पक्ष में रात्रि का जन्म हो और उसकी जन्म कुंडली में छठा या आठवां चंद्र हो, शुभ व पाप दोनों प्रकार के ग्रहों से दृष्ट हो तो भी मरण नहीं होता। ऐसा चंद्र बालक की पिता की तरह रक्षा करता है।

• मानसागरी में कहा गया है कि लग्न से अष्टम भावगत चंद्र यदि गुरु, बुध या शुक्र के द्रेष्काण में हे तो वही चंद्र मृत्यु पाते हुए की भी निष्कपट रक्षा करता है।

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