ज्योतिष

आठवां भाव और शनि

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री “श्री मां चिंतपूर्णी ज्योतिष संस्थान 5, महारानी बाग, नई दिल्ली -110014 8178677715

जन्मकुंडली में फलादेश करते हुए कुंडली का आठंवा भाव और शनि दोनों ही बड़े महत्वपूर्ण माने जाते हैं। कुंडली में अष्टम भाव को आयु का स्थान माना जाता है। आठवें भाव जैसा प्रभाव शनि ग्रह का भी है, इसी लिए शनि को इस स्थान का कारक कहा गया है। आठवां स्थान और शनि दोनों ही अचानक आने वाली मुसीबत, प्राकृतिक आपदा, अग्नि, जल, वायु या किसी भी प्रकार की आकस्मिक दुर्घटना, कारागार, यानी जेल, बड़े संकट, शरीर कष्ट की सूचना देते हैं। आठवें स्थान को दुःख भाव या पाप भाव के रूप में देखा जाता है

शनि ग्रह जहां – कर्म, आजीविका, जनता, सेवक, नौकरी, अनुशाशन, दूरदृष्टि, प्राचीन वस्तु, लोहा, स्टील, कोयला, पेट्रोल, पेट्रोलियम प्रोडक्ट, मशीन, औजार, तपस्या और अध्यात्म का कारक माना गया है। वहीं यह ग्रह हमारे पाचन–तंत्र, शिरा नाड़ी, हड्डियों के जोड़, बाल, नाखून,और दांतों को भी नियंत्रित करता है। और वातरोग, शरीर कष्ट, दु:ख का भी कारक है। जन्मकुंडली का अष्टम भाव पाप या दुःख का भाव होने से अष्टम भाव में किसी भी शुभ ग्रह का होना अच्छा नहीं माना गया है। कुंडली में कोई भी ग्रह अष्टम भाव में होने से वह ग्रह पीड़ित और कमजोर स्थिति में आ जाता है, साथ ही स्वास्थ की दृष्टि से भी बहुत सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं, अब विशेष रूप से शनि की बात करें तो, शनि का कुंडली के अष्टम भाव में होना निश्चित रूप से अच्छा नहीं है, इससे जीवन में बहुत सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं, शनि के अष्टम भाव में होने को लेकर एक सकारात्मक बात यह है की कुंडली में अष्टम का शनि व्यक्ति को दीर्घायु देता है, यदि कुंडली में बहुत नकारात्मक योग न बने हुए हों तो, अष्टम भाव में स्थित शनि व्यक्ति की आयु को दीर्घ कर देता है, पर इसके अलावा शनि अष्टम में होने से बहुत सी समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं।

अष्टम भाव का गंभीर व असाध्य रोगों से भी संबंध है। जो रोग असाध्य तथा दीर्घकालीन होते हैं उनका विचार अष्टम भाव से ही किया जाता है। यदि अष्टम भाव में सूर्य हो तो व्यक्ति को नेत्र, हृदय तथा हड्डियों से संबंधित रोग होता है। यदि चन्द्र अष्टम भाव में हो तो मनुष्य को रक्त विकार, टी। बी।, मनोरोग आदि होता है। मंगल अष्टम भाव में हो तो बवासीर, पट्ठे का रोग, गुप्त रोग, गुप्त अंगों की शल्य चिकित्सा आदि होती है। यदि बुध अष्टम भाव में हो दमा, श्वास,वाणी, त्वचा, मस्तिष्क संबंधी विकार होते हैं। गुरु यदि अष्टम भाव में हो तो जिगर, तिल्ली आदि से संबंधित रोग होते हैं। यदि शुक्र अष्टम भाव में हो तो मनुष्य को वीर्य व काम शक्ति संबंधित रोग होते हैं। शनि अष्टम भाव में हो तो मनुष्य को दीर्घायु प्रदान करता है, परंतु

उसे स्नायु तथा वायु संबंधित रोग होते हैं। यदि राहु-केतु अष्टम भाव में हो तो व्यक्ति को गुप्त रोग, गुप्त अंगों की शल्य चिकित्सा, मुख के रोग तथा कैंसर आदि असाध्य रोग होते हैं। अष्टम भाव एक नाश स्थान है इसलिए इसे निधन भाव भी कहते हैं। जिस भाव का स्वामी इस भाव में आ जाता है, उस भाव संबंधित विषयों को हानि पहुँचती है। जैसे पंचम भाव(संतान) का स्वामी यदि अष्टम भाव में आ जाए तो व्यक्ति को संतान संबंधित कष्ट होता है। इसी प्रकार यदि एकादशेश(ज्येष्ठ भ्राता व भगिनी) अष्टम भाव में बैठ जाए तो बड़े भाई-बहन की मृत्यु होती है।

अष्टम स्थान सप्तम स्थान(विवाह) से द्वितीय(घर तथा कुटुंब सुख) है। अतः इसका संबंध विवाहोपरांत मिलने वाले सुखों से भी है। स्त्री के लिए यह उसके पति की आयु तथा उसके कुटुंब(ससुराल) से प्राप्त होने वाले सुखों को दर्शाता है। अतः यदि अष्टम भाव तथा अष्टमेश पर शुभ ग्रहों का प्रभाव हो तो स्त्री का पति दीर्घायु होता है तथा ससुराल पक्ष से भी उस स्त्री को पूर्ण सुख मिलता है।

दुर्घटना तथा आकस्मिक आघात- अष्टम भाव दुर्घटनाओं के अलावा आकस्मिक आघात का भी है। व्यक्ति के साथ होने वाली गंभीर दुर्घटना अथवा आकस्मिक शारीरिक आघात इसी भाव से देखे जाते हैं।

वसीयत या पैत्रिक संपति का विचार भी अष्टम भाव से किया जाता है। एकादश भाव लाभ का सूचक होता है जबकि द्वितीय तथा चतुर्थ भाव पैत्रिक धन-संपति तथा जायदाद के सूचक होते हैं। जब भी एकादशेश, द्वितीयेश तथा चतुर्थेश का संबंध अष्टम भाव व अष्टमेश से बनता है तब मनुष्य को अपने पूर्वजों की विरासत, पैत्रिक धन संपति व जायदाद प्राप्त होती है। सप्तम भाव(पत्नी) से द्वितीय स्थान(धन) होने के कारण अष्टम भाव स्त्री के धन तथा ससुराल पक्ष से मिलने वाले धन(दहेज़) का प्रतीक भी है क्योंकि आखिरकार दहेज़ अनार्जित धन का ही तो रूप है।

अष्टम भाव एक छुपा हुआ भाव है अर्थात इसका संबंध रहस्यों से है। इसलिए कोई भी ऐसा कार्य अथवा संबंध जो असामाजिक हो इसी भाव से देखा जाता है। यदि अष्टम भाव तथा अष्टमेश पर पाप व क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो तो व्यक्ति आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त रहने, तस्करी या चोरी करने अथवा असामाजिक तत्वों के साथ लिप्त रहने जैसा कार्य कर सकता है। दशम भाव(कर्म) के स्वामी का अष्टम भाव(असामाजिक कार्य या संबंध) से संबंधित होकर पाप प्रभाव द्वारा पीड़ित होना व्यक्ति को चोर, डाकू, लुटेरा यहाँ तक कि हत्यारा तक बना सकता है।

यदि शनि कुंडली के आठवे भाव में स्थित हो तो ऐसे में व्यक्ति को पाचन तन्त्र और पेट से जुडी समस्याएं लगी ही रहती हैं, इसके अतिरिक्त जोड़ो का दर्द, दाँतों तथा नाखूनों से जुडी समस्याएं भी अक्सर परेशान करती हैं, शनि का कुंडली के अष्टम भाव में होना व्यक्ति की आजीविका या करियर को भी अक्सर बाधित करता है, करियर को लेकर कभी-कभी संघर्ष की स्थिति बनी रहती है

करियर में स्थिरता नहीं आ पाती और मेहनत करने पर भी व्यक्ति को अपनी प्रोफेशनल लाइफ में इच्छित परिणाम नहीं मिलते, जो लोग राजनैतिक क्षेत्र में आगे जान चाहते हैं, उनके लिए भी अष्टम भाव का शनि संघर्ष की स्थिति उत्पन्न करता है, वैसे तो राजनीति और सत्ता का सीधा कारक सूर्य को माना गया है, परंतु शनि जनता और जनसमर्थन का कारक होता है, इस लिए राजनैतिक सफलता में शनि की महत्वपूर्ण भूमिका है, कुंडली में शनि अष्टम भाव में होने से व्यक्ति को जनता का अच्छा सहयोग और जनसमर्थन नहीं मिल पाता जिससे व्यक्ति सीधे चुनावी राजनीती में सफल नहीं हो पाता, अथवा बहुत संघर्ष का सामना करना पड़ता है, शनि अष्टम में होने से व्यक्ति को अपने कार्यों के लिए अच्छे कर्मचारी या सर्वेंट नहीं मिल पाते, यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में बिजनेस या व्यापार में सफलता के अच्छे योग तो हैं, पर शनि कुंडली के अष्टम भाव में हो तो, ऐसे में लोहा, स्टील, काँच, पुर्जे, पेंट्स, केमिकल प्रोडक्ट्स, पेट्रोल आदि का कार्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि ये सभी वस्तुएं शनि के ही अंतर्गत आती हैं, और अष्टम में शनि होने पर इन कार्यक्षेत्रों में किया गया इन्वेस्टमेंट लाभदायक नहीं होता, हानि की अधिक संभावनाएं रहती हैं, यदि शनि कुंडली के अष्टम भाव में हो तो, ऐसे में शनि दशा स्वास्थ कष्ट और संघर्ष उत्पन्न करने वाली होती है। अष्टम में शनि होना किसी भी स्थिति में शुभ तो नहीं है, पर यदि यहाँ स्व उच्च राशि में शनि हो, या बृहस्पति से दृष्ट शनि हो तो, समस्याएं बड़ा रूप नहीं लेती, और उनका समाधान होता रहता है। किसी भी जातक की कुंडली का आठवां भाव उसकी आयु का प्रतिनिधित्व करता है, इसके अलावा आठवें भाव का अष्टम होने से तीसरा भाव भी आयु को ही दर्शाता है, आयु निर्धारण के लिए लग्नेश का महत्व बहुत अधिक होता है। यदि किसी जातक का लग्नेश कुंडली के छठे, आठवें या बारहवें भाव में विराजमान है तो, यह स्वास्थ्य की दृष्टि से नकारात्मक प्रभाव डालता है। यदि कुंडली के आठवें भाव का स्वामी छठे या बारहवें स्थान पर बैठ जाए तो आयु खंड को कमजोर करता है। लग्न भाव में लग्नेश के साथ अगर सूर्य भी बैठा हो और साथ ही उस पर किसी पापी ग्रह की दृष्टि पड़े तो भी व्यक्ति की आयु कम हो जाती है।

पापी ग्रह, यानि राहु, केतु, शनि और मंगल कुंडली के तीसरे, छठे और बारहवें भाव में हो तो यह यह व्यक्ति को अल्पायु बना देते हैं। जिस व्यक्ति का लग्नेश निर्बल या बहुत कमजोर होता है, और उस पर सभी पापी ग्रह अपनी दृष्टि डाल रहे हों, और केन्द्र में सभी पापी ग्रह बैठे हों, इसके अलावा किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि उन पर ना पड़ रही हो तो, ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से अल्पायु होता है। यदि धन और व्यय भाव जो कि कुंडली का दूसरा और बारहवां भाव होता है, में पाप ग्रह और लग्नेश कमजोर अवस्था में बैठे हों तो, व्यक्ति की आयु कम रह जाती है। यदि किसी जातक का लग्नेश चंद्रमा है और वो या तो अस्त हो या फिर उस पर ग्रहण लगा हो तो ऐसा व्यक्ति बहुत ही कम आयु का होता है। जिस व्यक्ति की कुंडली में लग्नेश सहित सभी ग्रह बलवान अवस्था में होते हैं, वह व्यक्ति दीर्घायु होता है। जिस व्यक्ति की कुंडली के दसवें भाव में मंगल ग्रह, नौवें भाव में बृहस्पति, और पांचवें भाव में चंद्रमा बैठा हो तो, वह बहुत लंबे समय तक इस धरती पर रहता है। जातक का लग्नेश, दशमेश या आठवें भाव का स्वामी शनि के साथ केन्द्र में बैठा हो तो, वह दीर्घायु होता है। कुंडली में राहु तीसरे, छठे या ग्यारहवें भाव में बैठा हो तो, वह व्यक्ति को दीर्घायु बनाता है। सभी ग्रह अपने-अपने भावों में या फिर अपनी मित्र राशि में हों, और लग्न पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो, यह जातक को दीर्घायु बनाता है। अष्टम भाव में बृहस्पति के अलावा यदि कोई अन्य शुभ ग्रह बैठा हो, या उसमें स्वगृही शनि ही हो तो, व्यक्ति को लंबी आयु प्राप्त होती है। यदि चंद्रमा अपने ही भाव में विराजमान हो तो, भी व्यक्ति को दीर्घायु प्राप्त होती है।

यदि शनि कुंडली के अष्टम भाव में होने से ये समस्याएं उत्पन्न हो रही हों तो यह उपाय करना लाभदायक होगा :-
1। शनिवार से आरंभ करके “ॐ शं शनैश्चराय नमः।” जप किया करें।
2। शनिवार साबुत उड़द का दान किया करें।
3। शनिवार को सांय पीपल के नीचे तिल के तेल का दिया जलायें।
4। श्री हनुमान चालीसा का पाठ करें।

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