छत्तीसगढ़

फसलों के अवशेषों को न जलाने कृषकों को समझाईश

मनीष शर्मा

मुंगेली।

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केन्द्र, मुंगेली द्वारा फसलों के अवशेष जैसे- धान का पैरा आदि खेतो में जलाने के संबंध में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण छत्तीसगढ़ शासन के आदेशानुसार प्रतिबंधित किया गया है। फसलों के अवशेषों को एकत्रित कर कार्बनिक खाद के रूप में मृदा उर्वरता के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।

फसल अवशेषों से निर्मित कार्बनिक खादों के उपयोग से मृदा में सूक्ष्म जीवों की सक्रियता में वृध्दि होती है, जिससे मृदा स्वास्थ्य में सुधार होता है। मृदा उर्वरता स्तर में सुधार होने के कारण रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता में कमी आती है, जिसमें आर्थिक बचत होती है।

मृदा में सूक्ष्म जीवों की सक्रियता से अप्राप्य पोषक तत्वों की प्राप्यता में वृध्दि हो जाती है और मृदा के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में सुधार होता है। जिससे फसल अवशेषों को कार्बनिक पदार्थ के रूप में मृदा में मिलाने से मृदा कार्बनिक कार्बन की मात्रा में वृध्दि होती है, जिससे मृदा उर्वरता के साथ-साथ मृदा स्वास्थ्य में भी वृध्दि होती है।

फसलों के अवशेषों अर्थात् कार्बनिक पदार्थों को जलाने से मृदा कार्बनिक कार्बन भी जल जाता है। जिससे मृदा के अंदर लाभदायक सूक्ष्म जीव भी नष्ट हो जाते है। मृदा में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है अर्थात मृदा उर्वरता एवं स्वास्थ्य दोनो प्रभावित होते है। फसल अवशेषों के जलाने से खेत की मिट्टी कड़ी हो जाती है, जिससे मृदा के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

फसल के अवशेषों में आग लगाने से मीथेन, कार्बन मोनो ऑक्साइड आदि जैसी ग्रीन हाउस गैसे उत्सर्जित होती है, जिससे पर्यावरण प्रदूषण होता है और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या उत्पन्न हो रही है।

Tags
Back to top button
%d bloggers like this: