लोक कला व संस्कृति है बसी रग-रग में, सुकून मिलता है मन को

अंकित मिंज

बिलासपुर।

हिलेन्द्र ठाकुर, लोक कलाकार इस क्षेत्र में शुरुआत कैसे की? मेरे पिता तबला वादन करते हैं और घर पर उन्हें तबला बजाते देखता था तब से ही मुझे भी संगीत से लगाव हो गया।

चार साल की उम्र से ही गाना गाने लगा। इसे धीरे.धीरे आगे बढ़ाने का प्रयास मैं करता रहा। लोक कला व लोक संगीत से जुड़कर अपनी प्रतिभा को प्रदर्शित करना शुरू किया। होली से हरेली तक के गीतों को सभी करते है पसंद।

छत्तीसगढ़ी लोक कला ही क्यों?

मुझे अपनी माटी व अपनी संस्कृति से खास लगाव बचपन से ही रहा है। अपनी माटी अपनी जन्म भूमि की संस्कृति को लोगों तक पहुंचाने की चाह है। इसी वजह से मैंने लोक कला व संस्कृति से जुड़कर गीत संगीत अपनी आवाज के माध्यम से प्रदर्शित करता हूं। मुझे इस कार्य को करना अच्छा लगता है इसलिए संगीत के क्षेत्र में मैं हमेशा जुड़ा रहूंगा।

युवाओं को कैसे जोड़ रहे इस क्षेत्र से?

हर किसी को अपनी संस्कृति व सभ्यता से जुडऩा चाहिए। अपने श्रोताओं के प्रोत्साहन से मैंने छत्तीसगढ़ी लोक कला मंच जय जोहार की स्थापना 1993 में की।

फिर शुरू हुआ कभी न रुकने वाला सफर और अब इसके माध्यम से मैं अपनी कला की प्रस्तुति करता हूं। मल्हार महोत्सव, मदकूदीप महोत्सव, भिलाई स्टील प्लांट, जांजगीर, रतनपुर मेला सहित अलग-अलग जगह अपनी टीम के माध्यम से प्रस्तुति दी है आगे भी यह सफर जारी रहेगा।

अब तक का सफर कैसा रहा?

मुझे आत्म संतुष्टि मिलती है अपने इस काम से। इसलिए इस क्षेत्र से जुड़कर लोक कला के रंग बिखेर रहा हूं। मेरी कला को लोगों ने प्रोत्साहित किया है। छत्तीसगढ़ रत्न अवार्ड, क्षत्रिय कुल गौरव अवार्ड, कला गौरव अवार्ड, डॉ.खूब चंद बघेल, बिलासा कला अवार्ड, भुंइया अवार्ड भिलाई, छत्तीसगढिय़ा अवार्ड से सम्मानित किया गया है।

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