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विदेश मंत्री की दो टूक, 75 साल से हो रहा भारत के साथ अन्याय, अब गलती सुधारे पूरा विश्व

रूस-भारत-चीन त्रिपक्षीय सम्मेलन में विदेश मंत्री ने उठई बात

नई दिल्ली :

भारत-चीन सीमा विवाद के बीच मंगलवार को विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रूस-भारत-चीन त्रिपक्षीय सम्मेलन में बहुपक्षीय व्यवस्था में साझेदारों के वैध हितों को मान्यता देने और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के नियमों का पालन करने की जरूरत पर जोर दिया। चीन के विदेश मंत्री वांग गी की मौजूदगी में जयशंकर का यह बयान भारत और चीन के सौनिकों के बीच पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हिंसा में भारत के 20 सैन्यकर्मियों के शहीद होने के बीच आया है।

विदेश मंत्री ने कहा, ”यह विशेष बैठक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के स्थापित सिद्धांतों पर हमारे विश्वास को दोहराती है। लेकिन वर्तमान में चुनौतियां अवधारणाओं और मानदंडों मात्र की नहीं हैं बल्कि उनके अमल की भी हैं।”

उन्होंने कहा, ” विश्व की प्रमुख आवाजों को हर तरीके से अनुकरणीय होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान ,साझेदारों के वैध हितों को मान्यता देना, बहुपक्षवाद को समर्थन देना और सभी के हितों को बढ़ावा देना ही टिकाऊ विश्व व्यवस्था के निर्माण का एकमात्र तरीका है।” विदेश मंत्री के इस बयान को चीन के लिए अप्रत्यक्ष संदेश के रूप में देखा जा रहा है जो हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी गतिविधियां बढ़ाने के साथ ही भारत के साथ लगती सीमा पर भी मुश्किलें खड़ा कर रहा हैं।

भारत को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के वैश्विक क्रम में वह मान्यता नहीं मिली

जयशंकर ने अपने शुरुआती संबोधन में यह भी कहा कि भारत को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के वैश्विक क्रम में वह मान्यता नहीं मिली, जिसका वह हकदार था और इस ऐतिहासिक अन्याय को पिछले 75 वर्षों में ”सुधारा नहीं” गया है। उन्होंने कहा,”जब विजेता वैश्विक क्रम सुनिश्चित करने के लिए मिले तो उस वक्त की राजनीतिक परिस्थितियों ने भारत को उचित मान्यता नहीं दी और 75 वर्षों से उस ऐतिहासिक अन्याय को दूर नहीं किया गया है।”

उन्होंने कहा कि इसलिए यह जरूरी है कि विश्व भारत के योगदान को मान्यता दे और अतीत में हुई गलती को सुधारे। विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र में सुधार की जरूरत पर भी जोर दिया ताकि यह विश्व की वर्तमान हकीकत को प्रदर्शित कर सके।

भारतीय और चीनी सेनाएं पीछे हटने पर सहमत

बैठक से पूर्व भारत और चीन के शीर्ष सैन्य कमांडरों के बीच हुई बैठक के दौरान दोनों देशों की सेनाएं पूर्वी लद्दाख में टकराव वाले स्थानों से हटने पर सहमत हुई हैं। आधिकारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह बातचीत, ”सौहार्दपूर्ण, सकारात्मक और रचनात्मक माहौल” में हुई और यह निर्णय लिया गया कि दोनों पक्ष पूर्वी लद्दाख में टकराव वाले सभी स्थानों से हटने के तौर तरीकों को अमल में लाएंगे।

भारतीय पक्ष नें 14वीं कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह की अगुवाई में और चीनी पक्ष ने तिब्बत सैन्य जिला कमांडर मेजर जनरल ल्यू लिन की अगुवाई में करीब 11 घंटे तक बातचीत की। भारत और चीनी सेना के बीच 15 जून को गलवान घाटी में हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिकों के शहीद होने के बाद चरम पर पहुंचे तनाव के बीच यह वार्ता हुई। भारत ने इस घटना को चीनी सैनिकों की ”सोची समझी और नियोजित कार्रवाई” करार दिया था।

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सूत्र ने बताया,” टकराव से पीछे हटने पर आपसी सहमति बनी है। पूर्वी लद्दाख में टकराव वाले सभी स्थानों से हटने के तौर तरीकों पर चर्चा की गई और दोनों पक्ष द्वारा इन्हें अमल में लाया जाएगा।” इस घटनाक्रम से जुड़े लोगों ने बताया कि वार्ता में भारतीय पक्ष ने गलवान घाटी में चीनी सैनिकों द्वारा भारतीय सैनिकों पर ”पूर्वनियोजित”हमले का मामला प्रमुखता से उठाया और पूर्वी लद्दाख के सभी इलाकों से तत्काल चीनी सैनिकों को हटाने की मांग की।

उन्होंने कहा कि भारतीय पक्ष ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनों देशों को अपने बेसों में सैनिकों की संख्या घटाने का भी सुझाव दिया। दोनों पक्षों के बीच छह जून को लेफ्टिनेंट जनरल स्तर की पहले दौर की बातचीत हुई थी जिसमें दोनों पक्षों ने गलवान सहित गतिरोध वाले सभी इलाकों से हटने संबंधी एक समझौते को अंतिम रूप दिया था। हालांकि गलवान घाटी में हिंसक झड़पों के बाद वहां स्थिति बिगड़ गई और दोनों पक्षों ने अधिकतर इलाकों में अपनी सैन्य तैनाती को काफी तेज कर दिया।

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