वन विभाग चार सालों में पहाड़ी मैना संवर्धन के नाम पर 24 लाख खर्च कर चुका

छत्तीसगढ़ का राजकीय पक्षी कहलाने वाली पहाड़ी मैना के सवंर्धन के लिए वन विभाग अब तक चार सालों में 24 लाख रुपए खर्च कर चुका है, लेकिन जिस मकसद को लेकर यह रकम खर्च की गई है, उसमें विभाग को आज तक कोई सफलता नहीं मिली है

वन विभाग चार सालों में पहाड़ी मैना संवर्धन के नाम पर 24 लाख खर्च कर चुका

छत्तीसगढ़ का राजकीय पक्षी कहलाने वाली पहाड़ी मैना के सवंर्धन के लिए वन विभाग अब तक चार सालों में 24 लाख रुपए खर्च कर चुका है, लेकिन जिस मकसद को लेकर यह रकम खर्च की गई है, उसमें विभाग को आज तक कोई सफलता नहीं मिली है.

जगदलपुर में वन विद्यालय में पहाड़ी मैना की संख्या बढ़ाने के लिहाज से एक रेस्‍क्‍यू सेंटर बनाया गया है. इस सेंटर को बनाने में करीब 18 से 20 लाख रुपए खर्च हुए थे. पहाड़ी मैना के संवर्धन के लिए वन विभाग ने अलग से एक प्रोजेक्ट वर्षों से तैयार करके रखा है और उसी पर काम हो रहा है.

वर्ष 2002 में पहाड़ी मैना को राजकीय पक्षी का दर्जा मिलने के बाद इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया गया. उस दौरान जंगल से करीब पांच पहाड़ी मैना को लाकर यहां पर रखा गया.

पहाड़ी मैना के रहवास को ठीक वैसा बनाने की वन विभाग ने कोशिश की, जिस वातावरण में वह रहती हैं. इसके पीछे मकसदये था कि पहाड़ी मैना को एक जगह पर रखकर उसका प्रजनन कराया जाए, जिससे लुप्त होती पहाड़ी मैना की संख्या में वद्धि हो सके, लेकिन अफसोसजनक पहलू ये है कि आज तक पहाड़ी मैना में नर और मादा की पहचान नहीं की जा सकी है.

ऐसे में वन विद्यालय में पांच पहाड़ी मैना को प्रजनन के लिहाज से रखा तो गया, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. माना जा रहा है कि जो पांच पहाड़ी मैना रखी गई थीं, वे सब मादा थीं. अंधेरे में तीर चलाने वाली कहावत पर वन विभाग अपने प्रोजेक्ट पर कार्य करता रहा. एक समय ऐसा भी आया जब पहाड़ी मैना के प्रजनन के लिए थाईलैंड से कुछ विेशेषज्ञों के दल को बुलाया गया. इस पर भी लाखों रुपए खर्च किए गए, लेकिन परिणाम सिफर ही रहे.

कुछ साल पहले स्वाइन फ्लू के चलते चार पहाड़ी मैना की मौत हो गई. उसके बाद बची एक पहाड़ी मैना ही उस विशालकाय पिंजरे में अब तक रखी गई है. कुछ दिनों पहले जंगल में आंधी-तूफान के चलते घायल हुए पहाड़ी मैना के दो बच्चे वन कर्मचारियों को मिले थे. उन बच्चों को भी वर्तमान में लाकर रेस्क्यू सेंटर में रखा गया है.

उम्‍मीद की जा रही है कि आने वाले समय में इनसे प्रजनन की संभावना हो सके. हालांकि किसी को ये नहीं मालूम है कि दोनों बच्चों में से नर कौन है और मादा कौन. बावजूद इसके काम जारी है. पहाड़ी मैना की देखरेख करने वाली रीता भी मानती हैं कि नर-मादा का पता आज तक नहीं चला है. ऐसे में ये प्रोजेक्ट बेकार ही है. वर्तमान में केवल ये पहाड़ी मैना वन विद्यालय की शोभा बढ़ाने का काम ही कर रही हैं.

उधर कांगेर घाटी राष्‍ट्रीय उद्यान की एसडीओ दिव्या गौतम पुराने प्रोजेक्ट का हवाला देते हुए अब एक नए प्रोजेक्ट पर काम किए जाने की बात कह रही हैं, जिसमें रायपुर के एक दल को जंगल में पहाड़ी मैना की संख्या पता लगाने के लिए लगाया गया है.

अगर रिपोर्ट में ये बात सामने आती है कि पहाड़ी मैना की संख्या बढ़ रही है तो फिर पहाड़ी मैना के संवर्धन के प्रोजेक्ट को कैंसल करते हुए उन्हें प्राकृतिक वातावरण में ही रखने की कवायद होगी. साफ है कि इतने सालों तक वन विभाग हवा में तीर चलाकर लाखों रुपए की बर्बादी ही करता रहा.

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