मित्रता दिवस विशेष

- मनीष शर्मा (बिलासपुर, मुंगेली)

विश्वभर में कई अन्य देशों ने मित्रता दिवस मनाए जाने का यह सुंदर विचार आनंदपूर्वक स्वीकार किया था और आज, भारत सहित कई देश, अगस्त के पहले रविवार को मित्रता दिवस के रूप में मनाते हैं।

एक पारंपरिक तरीके से मित्रता दिवस मनाते हुए, लोग अपने दोस्तों से मिलते हैं और अपने दोस्तों का सम्मान करने के लिए कार्ड और फूलों का आदान-प्रदान करते हैं। बहुत से सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन भी इस अवसर का जश्न मनाते हैं और कार्यक्रमों की मेजबानी करके एक साथ मिलकर मित्रता दिवस को मनाते हैं।

दोस्ती के बारे में कुछ बुरा कहना मुश्किल है लेकिन यह सच है कि किसी लापरवाह व्यक्ति को दोस्ती में धोखा दिया जाता है। आजकल, बुरे और अच्छे लोगों की भीड़ में सच्चे दोस्त मिलना बहुत मुश्किल है, लेकिन अगर किसी के पास सच्चे दोस्त हैं, तो उसके अलावा दुनिया कोई भी भाग्यशाली और प्रतिभाशाली नहीं है। सच्ची दोस्ती  मानव और जानवरों के बीच भी हो सकती है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि सबसे अच्छे दोस्त हमारी कठिनाइयों और जीवन के बुरे समय में मदद करते हैं। मित्र हमेशा हमें अपने खतरों से बचाने की कोशिश करते हैं और समय-समय पर सलाह देते हैं सच्चे दोस्त हमारी ज़िंदगी की सबसे अच्छी संपत्ति हैं जैसे कि वे हमारे साथ दुःख  साझा करते हैं, हमारे दर्द को बांटते हैं और हमें खुश रखने की कोशिश करते हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य की प्राचीन मितान, मितानिन परंपरा

मितान बदने या गियां-गांठी की परम्परा पूरे छत्तीसगढ़ में है। पुरुष आपस में मितान होते हैं तो महिलाएं मितानिन। मितान बदना यानि मिताई या मित्रता में बद्ध होना, बंधना। इसी प्रकार गियां-गांठी का तात्पर्य गियां, गुइयां या गोई (और गो या सिर्फ ग, सामान्यतः पुरुषों में प्रयुक्त) और गांठी अर्थात दो व्यक्तियों के बीच अटूट संबंधों की गांठ। इस तरह छत्तीसगढ़ी में बदना, वस्तुतः बंधना या गांठ बांध लेना है जिसमें शपथ, सौगंध और संकल्प आशय भी निहित है। मित्र बनाने की इस परम्परा में जाति, धर्म जैसी कोई असमानता बाधक नहीं होती, बल्कि कई बार तो इसी भेद-भाव में सांमजस्य के लिए मितानी होती है।

गांव में अल्पसंख्यक समुदाय या जाति का व्यक्ति, गांव के अन्य लोगों से मितान बद कर भाईचारा बना लेता है। ऐसा नहीं कि मितानी एक-दूसरे के मन मिलने पर ही होती है, कई बार कद-काठी, चेहरा-मोहरा, चाल-ढाल में समानता देख कर या एक ही नाम वाले सहिनांव-हमनाम के लिए लोग सुझाते हैं कि ‘गियां बने फभिही‘ और मितानी बद ली जाती है। इससे एक कदम आगे, दो व्यक्तियों के बीच लगातार किन्तु अकारण मनमुटाव होता रहे तो इसके निवारण के लिए उनकी मितानी करा दी जाती है और इसके बाद उनके संबंध बहुधा मधुर मैत्रीपूर्ण बन जाते हैं।

मितानी परम्परा में महापरसाद (महाप्रसाद) का सर्वाधिक महत्व है, यह मित्रता में सबसे बड़ा रिश्ता माना जाता है। महापरसाद अर्थात् जगन्नाथपुरी का सूखा चांवल, भगवान जगन्नाथ जी पर चढ़ाया गया भोग, जिसे विधि-विधानपूर्वक दो वयस्क व्यक्ति आपस में एक-दूसरे को खिलाकर मितान बदते हैं। इस अवसर पर एक-दूसरे को नारियल, सुपारी, धोती-साड़ी भेंट कर, सीताराम महापरसाद बोलकर मैत्री संबंध स्थापित किया जाता है। इसी प्रकार की मितानी गजामूंग भी है। आषाढ़ मास की द्वितीया, अर्थात रथयात्रा-गोंचा पर्व का प्रसाद, गजामूंग यानि बड़ा मूंग (मोठ), चना दाल और गुड़, एक-दूसरे को खिलाकर आजीवन मैत्री संबंध निर्वाह के लिए संकल्प लिया जाता है।

इसके बाद यह खून के रिश्ते की तरह पीढ़ी दर पीढ़ी निभाया जाता है, मितान बिरादर-हंड़िहरा जैसा हो जाता है, एक दूसरे के घर की गमी में सिर मुड़ाना, सूतक का पालन करने लगता है। विवाह के अवसर पर परिवार की तरह ही पंचहड़ (पांच बर्तन) दिये जाने की रस्म भी मितान पूरी करता है। मितान के बाद एक-दूसरे के सभी रिश्ते आपस में उसी सम्मान के साथ निभाए जाते हैं, किन्तु रोटी-बेटी की मर्यादा का निर्वाह किया जाता है साथ ही इसका नाजुक पक्ष है कि पुरुष मितानों की पत्नियां अपने पति के मितान को कुंअरा ससुर (जेठ)जैसा मानकर उससे परदा करती है।

मीत-मितानी का संबंध सिर्फ तीज-त्यौहार और खाने-पीने का नहीं, बल्कि दार्शनिक भाव के साथ आध्यात्मिक उंचाइयों तक पहुंच जाता है, जहां मित्रता के बंधन को तीर्थ का दरजा दिया गया है। ‘मितान-मितानीन दया-मया मा बंधाय, तीज तिहार मा जेवन बर जोरा अमराय।‘ ‘दस इन्दरी के महल जर जावै, मितानी झन झूटै, दिन दूभर हो जावै।‘ ‘मीत बंधन ले जनम भर के पिरीत, घर-दुवार बन जाथे दूनो के तिरीथ।‘ एक सरगुजिहा गीत में महापरसाद रिश्ते की महत्ता गाई जाती है कि कठिन समय के लिए, विपत्ति के दिनों का सामना करने के लिए महापरसाद बद लो। लड़कियां फूल बदती हैं, जो उनके विवाह के बाद निभ पाना संभव नहीं होता, लेकिन पुरुषों में बदा महापरसाद जीवन भर का साथ है-

ओह रे, बद ले महापरसाद, बड़े कठिना में बद ले।
कोन तो बदे फूल फुलवारी, कोन तो बदे महापरसाद।
लड़की मन तो बदें फूल फुलवारी, लइका बदे महापरसाद।
कै दिन रहय तोर फूल फुलवारी, कै दिन रहय महापरसाद।
दुइ दिन रहय तोर फूल फुलवारी, जियत भर रहय महापरसाद।
बड़े कठिना में…

इसी प्रकार मितानी के नाजुक रिश्तों का मजबूत और अटूट बंधन है- तुलसीदल, गंगाबारू, गंगाजल। इनमें मितानी का माध्यम क्रमशः तुलसी का पत्ता, गंगा की रेत और गंगाजल होता है, जिसे एक-दूसरे को ग्रहण करने को दिया जाता है। यह ध्यान देने वाली बात है कि महापरसाद की तरह तुलसीदल, गंगाजल और गंगाबारू ऐसी पवित्र वस्तुएं हैं, जो भागवत की वेदी और मृत्यु के समय प्रयुक्त होती हैं। इन माध्यमों से मितानी में भावना होती है कि यह पवित्र रिश्ता जीवन-मरण का है। हर संकट और दुख की घड़ी में साथ निभाने वाला है।

यह बस्तर अंचल के मरई-बदने की परम्परा में अधिक उजागर है, जो श्मशान घाट में तय हुआ मित्रता का रिश्ता है। कहा जाता है- ‘तुलसीदल, महापरसाद, जगन्नाथ के आसिस, सुरुज-आगी के साखी मा जियव लाख बरीस। यानि ऐसे संबंधों में भगवान जगन्नाथ का आशीष है, सूर्य, अग्नि और ध्रुव तारा इसके साक्षी है। और इसका निर्वाह विशेष पर्व-त्यौहारों दीवाली, दशहरा और राखी पर अवश्य निभाया जाता है। ‘मीत बदै सुरुज, आगी, धुरुतारा के साखी मा, जेमन मितानी निभावै देवारी, दसराहा, राखी मा।

सरगुजा अंचल में मितानी के लिए अधिक प्रचलित शब्द हैं- सखी जोराना या फूल जोराना। जोराना, यानि जुड़ना या जोड़ना। वैसे सखी जोराने या बदने का चलन पूरे छत्तीसगढ़ में है। यह मुख्यतः दो विवाहित, बाल-बच्चेदार महिलाओं के बीच होता है। रोचक यह है कि इस मित्रता का आधार संतति और उनका जन्म-क्रम होता है।

यानि किसी महिला की पहली लड़की और उाके बाद दो पुत्र हैं तो वह वैसी ही महिला से सखी संबंध बनाएगी, जिसके लड़की, लड़का का जन्मक्रम और संख्या वैसी ही हो। इस तरह सखी बन गई महिलाओं में से किसी की संतान की मृत्यु होने पर या अन्य संतान हो जाने पर संख्या घट-बढ़ होने पर नई मितानी का रास्ता बन जाता है। कई बार मन मिल जाने पर जन्मक्रम के बजाय मात्र संतानों, पुत्र-पुत्री की कुल संख्या को आधार मानकर भी सखी जोराते हैं।

सखी जोराने में दोनों परिवार के प्रमुख की उपस्थिति होती है। दोनों पक्ष के लोग आंगन में इकट्ठे होते हैं। दोना में चावल, फूल ले कर बैठते हैं, गौरी-गणेश की पूजा होती है और एक दूसरे के कंधे पर साड़ी रखकर, कान में फूल खोंस देते हैं और एक दूसरे का पैर छू कर अभिवादन करते हैं। इसके बाद पूरे परिवार के लोग जोहार भेंट होते हैं, एक दूसरे परिवार को भोज, उपहार-भेंट दिया जाता है।

सखी का रिश्ता जुड़ जाने के बाद दोनों पक्ष एक-दूसरे के प्रति आत्मीय और सम्मानसूचक शब्दों का प्रयोग करते हैं- जैसे सखी दाई, सखी दाउ, सखी भाई या सखी बहिनी। सरगुजा अंचल में गेंदा या अन्य फूलों के माध्यम से और कई बार गौरा पत्ता (चमकदार कागज-सनफना) को भी माध्यम बनाकर मितानी बना ली जाती है। एक अन्य मितानी जलीय वनस्पति गेल्हा है। सरगुजा के एक अधरतिया किसुन खेल करमा गीत में गेल्हा की बात, आभूषणों का विवरण देते हुए, पूरे लालित्य के साथ संग-सहेली न हो पाने की व्यथा बन कर उभरती है-

ओह रे ए रे
काकर जग मैं बदों गेल्हा, संग सहली होइ गे डोल्हा।
उंगरी के चुटकी उंगरी ला विराजे, पांव के पैरी हर होय गे डोल्हा।
जाग के जंगहिया हर जाग ला विराजे, कनिहा के करघनिया हर होय गे डोल्हा।
छाती के हंसली हर छाती ला विराजे, मांग के मघोटी हर होय गे डोल्हा।
हाथ के चुरी हर हाथ ला विराजे, बांह कर बाजू हर होय गे डोल्हा।
कान के तरकी हर कान ला विराजे। नाक के नथिया होय गे डोल्हा।
काकर जग मैं बदों गेल्हा।

बस्तर अंचल में भी दशहरा के अवसर पर सोनपत्ती के माध्यम से मितानी बदी जाती है। महिलाएं, कुड़ई फूल और संगात बदती हैं। लड़कियां एक दूसरे के बालों-जूड़े में हजारी फूल खोंसकर, बाली फूल रिश्ता बनाती हैं। इसी प्रकार देवता और बड़े-बुजुर्गों के समक्ष चम्पाफूल बदा जाता है। दोने में चावल की अदला-बदली कर पुरुष या महिला दोनिया सखी बन जाते हैं।

केंवरा, बदना अविवाहित युवकों और युवतियों में होता है। एक अन्य मितानी, सामान्यतः दो परिवार के वरिष्ठ सदस्यों के बीच होता है, त्रिनाथ मेला बंधन है। यह किसी धार्मिक स्थल या पीपल-बरगद के पास बड़े आयोजन के साथ सम्पन्न होता है। माटी हांडी की मितानी यादव समाज में अधिक प्रचलित है।

छत्तीसगढ़ की इस विशिष्ट और समृद्ध परम्परा लोक-जीवन में कितनी और किस तरह से घुली-मिली है, यह प्रचलित कथनों में परिलक्षित होता है। लोकप्रिय कहावत है- ‘मितानी बदै जान के, पानी पीयव छान के।‘ लेकिन मित्रता करते हुए पात्र चयन में सावधानी रखना आवश्यक होता है, इसके लिए नसीहत दी जाती है- ‘भले मनसे ले मीत बदै जिंगनी हा सधे, खिटखिटहा ल मीत बनाय बोझा मा लदे।

‘ लेकिन मितानी में जात-पांत का भेद नहीं होता, यह देख कर पड़ोसी को भी ईर्ष्या हो सकती है और मित्र की बातें मीठी लगती हैं, जबकि पड़ोसी की सीठी, कुछ यों- ‘मितान के मितानी देख परोसी ल होवै ईरखा, जात-पांत भुला जावै, गांड़ा सईस दिरखा।‘ और- ‘मितानी के गोठ मीठ-मीठ, परोसी के सीठ-सीठ।‘ संक्षेप में कहें तो छत्तीसगढ़ में मीत-मिठास का यह लोक-संस्कार, सोलह संस्कारों जैसा ही मान्य और प्रतिष्ठित है। छत्तीसगढ़, सांस्कृतिक समृद्धि का ऐसा सागर है, जिसमें हर डुबकी के साथ हाथ आई सीप हमेशा आबदार मोती वाली ही निकलती है। ऐसा ही एक मोती ‘मितान-मितानिन’ की मिताई है।

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