उपेक्षित राज्यों से दक्षिण एशिया के प्रवेश द्वार तक, उत्तर पूर्व के विकास में पीएम मोदी के 7 साल

‘राष्ट्र के उपेक्षित राज्यों’ से ‘लुक एंड एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ तक, पिछले सात साल पूर्वोत्तर भारत के लिए परिवर्तनकारी रहे हैं। दरअसल, पिछले सात साल में पूर्वोत्तर भारत में वो कुछ हुआ, जिसका लंबे समय से इंतजार था। केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनी और उसके बाद ‘सेवन सिस्टर्स’ कहलाने वाले पूर्वोत्तर भारत के इन राज्यों में विकास ने रफ्तार भरी। जी हां, वर्तमान सरकार के सांसदों और नीति निर्माताओं का अब इन राज्यों पर विशेष ध्यान है। गौरतलब हो, जब स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी इस क्षेत्र में एक रात बिताने वाले पहले प्रधानमंत्री बने थे, तो उनका कार्यकाल यहां कई पहलों से युक्त था। इसके पीछे अटल जी का उद्देश्य बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी के माध्यम से उत्तर पूर्वी भारत को जोड़ना था। इसके लिए एक अलग मंत्रालय की अवधारणा से लेकर उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के लिए धन हेतु नॉन-लैप्सेबल पूल, सिक्किम को उत्तर-पूर्वी परिषद के सदस्य के रूप में शामिल करना और पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास के लिए एक समर्पित विभाग की आवश्यकता थी।

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पदभार ग्रहण करने के बाद से, एक बार फिर अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढांचे, रोजगार, उद्योग और संस्कृति सहित विकास के विभिन्न आयामों में पूर्वोत्तर भारत की ओर नीति निर्माताओं का ध्यान गया है। लोकतंत्र में, क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिए, सांसदों के साथ बातचीत अनिवार्य है। वहीं पार्टी ने भी एक प्रतिबद्ध नेतृत्व और कैडरों के जटिल नेटवर्क के साथ, इस क्षेत्र में राजनीतिक सफलता हासिल की और केंद्र के साथ सहयोग करने और क्षेत्र को आगे ले जाने की दिशा में काम करने के लिए बहुत आवश्यक इच्छाशक्ति प्रदान की। बताना चाहेंगे कि इसी परिप्रेक्ष्य में अपने कार्यकाल के दौरान, पीएम मोदी खुद 30 से अधिक बार इस क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं। वहीं पार्टी ने उत्तर-पूर्व में अपनी राजनीतिक उपस्थिति को पहले से अधिक मजबूत किया है। इसमें त्रिपुरा भी शामिल है। आइए अब विस्तार से जानते हैं, 2014 के बाद से उत्तर-पूर्वी भारत के सामाजिक-आर्थिक विकास की तस्वीर को बदलने वाले कुछ अहम कदमों में के बारे में…

कनेक्टिविटी की चुनौती

पूर्वोत्तर भारत के समक्ष कनेक्टिविटी की चुनौती विशेष रूप से बहुत बड़ी है। जबकि लंबे समय से भारत और दुनिया के बीच पूर्व की ओर जुड़ाव का पुल रहा है। सदियों से, इसके प्राकृतिक आकर्षण ने न केवल दक्षिण-पूर्व एशिया में बल्कि कोरिया और जापान तक लोगों, माल, विचारों के आवागमन को आसान बनाया है। ब्रह्मपुत्र, चिंडविन, इरावदी की घाटियां इसका आधार रही हैं। लेकिन उपनिवेशवाद की शुरुआत और राष्ट्र-राज्यों के उद्भव से पूर्वोत्तर भारत से दुनिया के बहुत सहज जुड़ाव बाधित हो गए। यह एशिया के लोगों के लिए कोई सामान्य घटना हो सकती है, लेकिन भारत के लोगों के लिए, यह विघटन भारत के विभाजन से भी बढ़ा था। कनेक्टिविटी के लिए साल 2014 से पहले कुछ खास प्रयास नहीं किए गए, जिससे यह विघटन और बढ़ता गया, लेकिन 2014 के बाद से इसमें काफी बदलाव आया है।

केंद्र सरकार की ”एक्ट ईस्ट पॉलिसी” से इसे आसानी से समझा जा सकता है। यह उत्तर-पूर्व से परे, असम तक और असम के अंदर, और फिर पड़ोसी देशों म्यांमार और बांग्लादेश तक कनेक्टिविटी बनाने का दृष्टिकोण है, लेकिन इसे साथ ही साथ सड़क मार्ग, समुद्री मार्ग और वायु मार्ग के द्वारा, वियतनाम से जापान तक पहुंचाने का भी दृष्टिकोण है। ऐसा करने से न केवल आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी, बल्कि जैसा कि दुनिया के अन्य हिस्सों में भी देखा गया है, यह एक संचालक की भूमिका निभाएगा। एक्ट ईस्ट पॉलिसी से असम ज्यादा कनेक्टेड होगा, ज्यादा ऊर्जावान होगा, ज्यादा योगदान कर पाएगा और ज्यादा रोजगार मिलेंगे।

सरकार ने हमेशा पूर्वोत्तर भारत पर विशेष ध्यान दिया है। ऐसा 2021 के बजट में देखा जा सकता है, जिसे आत्मनिर्भर बजट बताया गया है। इस बजट में असम को फोकस में रखते हुए केंद्र सरकार ने राजमार्ग, सड़क निर्माण, रेल नेटवर्क, चाय बागान की महिला श्रमिकों के लिए वित्तीय सुरक्षा में विस्तार किया। वहीं 72 सड़क परियोजनाओं, 13 नई रेलवे लाइनों, मार्ग दोहरीकरण की 6 परियोजनाओं, कृषि-व्यवसाय, शहरी आधारभूत संरचना और गुवाहाटी जलापूर्ति के लिए आवंटन किया गया है।

”परिवहन द्वारा परिवर्तन” नीति

साल 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भारत का सबसे लंबा रेल और सड़क पुल, 4.94 किमी बोगीबील पुल का उद्घाटन किया गया। इस क्षेत्र में रेलवे की पहुंच प्रदान करने के लिए केंद्र में मोदी सरकार की जरूरत थी। सरकार ने सुनिश्चित किया कि इस क्षेत्र में ब्रॉड गेज के 900 किलोमीटर तक ट्रैक बिछाए जाएं। राजधानी एक्सप्रेस, त्रिपुरा सुंदरी एक्सप्रेस के साथ कोहिमा को राष्ट्रीय रेलवे नेटवर्क से जोड़ने वाले 88 किलोमीटर के धनसिरी-कोहिमा रेलवे ट्रैक ने इस क्षेत्र में लंबे समय से प्रतीक्षित रेलवे की पहुंच प्रदान की।

वहीं पीएम मोदी की “परिवहन द्वारा परिवर्तन” नीति में 3,800 किलोमीटर से अधिक राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए परियोजनाएं और धन का निवेश शामिल है। केंद्र सरकार द्वारा विशेष त्वरित सड़क विकास के तहत 60,000 करोड़ रुपए और भारतमाला परियोजना के तहत 30,000 करोड़ रुपए दिए गए हैं। केंद्र सरकार इस बात से भली-भांति परीचित है कि जमीनी परिवहन देश में प्राथमिकता वाला क्षेत्र है। इसी बात को ध्यान में रखते हिए पिछले सात साल में केंद्र सरकार ने सड़क की बात हो या रेल की, कई ऐसी पहलें शुरु की, जिससे पूर्वोत्तर भारत की पहुंच का चौतरफा विस्तार हुआ है। इससे न केवल दक्षिण में समुद्र तक पहुंच मिली बल्कि पूर्व में भी पहुंच का भी विस्तार हुआ, जो हार्ट ऑफ दक्षिण-पूर्वी एशिया तक फैला हुआ है। जी हां, आज भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग का कार्य लगभग पूरा होने वाला है। फिलहाल, भारत अभी केंद्रीय म्यांमार में लुप्त हो चुके सड़क संपर्क को बनाने और तमू-कालवा खंड में पुलों को अपग्रेड करने का प्रयास कर रहे हैं। अध्ययन में इसके लाओस से होते हुए थाई सीमा और फिर मध्य वियतनाम तक विस्तारित करने की व्यवहार्यता का आकलन किया गया है। सिटवे पोर्ट और पैलेटवा अंतर्देशीय जल टर्मिनल सहित कलादान मल्टी-मॉडल परिवहन लिंक हमारी म्यांमार तट तक की पहुंच को बढ़ाएगा।

जलमार्ग में ब्रह्मपुत्र नदी को माल और लोगों के आवागमन का प्राथमिक चैनल बनाना केंद्र की योजना है। इस दिशा में सरकार लगातार काम कर रही है। यहां तक को पर्यटन को लुभाने के लिए भी सरकार ने ब्रह्मपुत्र नदी में फेरी सेवा शुरू की है। बता दें, असम हिमालय को अंतर्देशीय जल संपर्क के माध्यम से, मुख्य रूप से चटगांव और मोंगला में बंगाल की खाड़ी के साथ जोड़ेगा। सरकार फिलहाल पूर्वी जलमार्ग परिवहन कनेक्टिविटी ग्रिड विकसित करने का काम कर रही है, जिसमें विश्व बैंक भी सहयोग कर रहा है। भूटान और बांग्लादेश से क्रमशः माल लाने और ले जाने हेतु धुबरी और करीमगंज जैसे नदी बंदरगाहों का उपयोग करने का काम शुरू हो चुका है। दक्षिणी असम में बाहरी कनेक्टिविटी के लिए बांग्लादेश के आशूगंज में बंदरगाह सुविधाएं भी विकसित की जा रही हैं। वहीं ब्रह्मपुत्र और कुशियारा नदियों की स्थल-सीमा को बढ़ाया जा रहा है ताकि नौ-परिवहन को बढ़ावा दिया जा सके और व्यापार में तेजी लाई जा सके।

वहीं बीते सात वर्षों में इलाके को हवाई मार्ग से जोड़ने के लिए ठोस प्रयास किए गए हैं। एक विमानन जनशक्ति प्रशिक्षण संस्थान, रूपसी हवाई अड्डे का विकास, दीमापुर में हवाई सुविधा का विस्तार इत्यादि केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई कुछ अहम परियोजनाएं हैं। इनकी मदद से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि इस क्षेत्र को शेष भारत के लिए पर्याप्त प्रवेश द्वार मिले।

”एक्ट ईस्ट पॉलिसी”

एक्ट ईस्ट पॉलिसी की शुरुआत करीब 1991 में हुई थी। उस समय देश भुगतान संतुलन के संकट से जुझ रहा था और हमारे विकास मॉडल में बदलाव हो रहा था। दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ, पूर्वी एशिया तथा ओशिनिया के साथ विभिन्न आयामों में सहयोग का विस्तार करके, पीएम मोदी इस पहल को बहुत उच्च स्तर पर ले आए। आज, इनमें कई कनेक्टिविटी परियोजनाएं और गतिविधियां, साथ ही आर्थिक प्रवाह तथा रणनीतिक सहयोग शामिल हैं। इस पॉलिसी को सफल बनाने में भौतिक एवं सांस्कृतिक कनेक्टिविटी काफी महत्वपूर्ण है।

नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी

असम लंबे समय से भारत के उत्तर-पूर्व क्षेत्र का आधार रहा है, क्योंकि हमारे बीच का सहयोग और कनेक्टिविटी देश की सीमाओं से परे है, यह वास्तव में एक ऐसा केंद्र बन सकता है जहां से म्यांमार, बांग्लादेश और भूटान जैसे पड़ोसियों को कवर किया जा सके। इसकी वजह उन देशों के साथ हमारे संबंधों में आया बदलाव है जो 2014 में मोदी सरकार ने नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी की शुरुआत से हुआ है। जिसकी वजह से, परियोजनाओं और पहलों में तेजी आई है, जिनमें से कुछ जमीनी स्तर पर प्रभाव भी डाल रही हैं। हाल के दिनों में, इन देशों में जापान की अपनी खुद की परियोजनाओं के साथ समन्वय करने की भी कोशिश की है। म्यांमार, बांग्लादेश और भूटान के साथ हमारे संबंध भी अहम और महत्वपूर्ण हैं। लेकिन गुवाहाटी के संदर्भ में, यह आकलन करना जरूरी है कि इनका असम के लाभ में क्या योगदान हो सकता है।

उग्रवाद की समस्या से राहत

लंबे समय तक ”उग्रवाद” की ज्वाला में जले पूर्वोत्तर भारत को अब जाकर कुछ राहत मिल पाई है। दरअसल, इस दिशा में केंद्र सरकार ने काफी काम किया है। जी हां, क्षेत्र में शांति के लिए केंद्र और असम सरकार ने बोडो संगठनों-एनडीएफबी और आल बोडो स्टूडेंट यूनियन के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) के तीन गुटों के 1,615 सदस्यों ने एक साथ आत्म समर्पण किया। इसके बाद उग्रवादियों के आत्मसमर्पण का सिलसिला लगातार चला। उल्फा (आई), एनडीएफबी, आरएनएलएफ, केएलओ, भाकपा (माओवादी), एनएसएलए, एडीएफ और एनएलएफबी के सदस्यों ने भी हिंसा की लड़ाई छोड़कर आत्मसमर्पण कर दिया।

शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार

आजादी के बाद से 7 दशकों में, यानी 2016 तक असम में केवल 6 मेडिकल कॉलेज होते थे, लेकिन इन 7 साल में अकेले असम में 6 और मेडिकल कॉलेज बनाने का काम शुरू किया जा चुका है। बिस्वनाथ और चरईदेव में दो और मेडिकल कॉलेजों का शिलान्यास हो गया है। ये मेडिकल कॉलेज अपने आप में आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के केंद्र तो बनेंगे ही, साथ ही अगले कुछ सालों में यहां से ही हजारों नौजवान डॉक्टर बनकर निकलेंगे। वहीं गुवाहाटी में एम्स का काम भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। एम्स के वर्तमान कैम्पस में इसी अकैडमिक सत्र से MBBS का पहला बैच शुरू भी हो गया है। जैसे ही अगले कुछ सालों में इसका नया कैम्पस तैयार होगा तो गुवाहाटी आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं के केंद्र के तौर पर उभरकर के सामने आएगा। एम्स गुवाहाटी केवल असम ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर के जीवन में एक बड़ा परिवर्तन करने वाला है। देश की पिछली सरकारें ये नहीं समझ पाईं कि गुवाहाटी में ही एम्स होगा तो लोगों को कितना लाभ होगा। वो लोग पूर्वोत्तर से इतना दूर थे कि उनकी तकलीफें कभी समझ ही नहीं पाए।

बिजली और ऊर्जा के क्षेत्र में सुधार

बिजली और ऊर्जा के विषय पर, केंद्र सरकार का विजन असम को पड़ोस और आस-पास के भारत के हिस्सों के लिए ऊर्जा के प्रसारण का केंद्र बनाना है। फिलहाल बांग्लादेश से होते हुए असम को बिहार से जोड़ने वाली नई ट्रांसमिशन लाइनों को विकसित करने का काम जारी है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक उत्तर पूर्वी ग्रिड का उपयोग करके बिजली निर्यात करने हेतु म्यांमार से भी बातचीत की जा रही है। यदि इस दिशा में कोई बीच का रास्ता निकल पाता है तो यह पूरे पूर्वोत्तर का नया भाग्य लिखने में बड़ा कारगर कदम साबित होगा।

असम परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद

असम परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पादों के उत्पादन में प्रमुख भागीदार रहा है, इसलिए इन उत्पादों की बड़े क्षेत्र में बिक्री को सुविधाजनक बनाने का भी काम जारी है। बांग्लादेश हाई स्पीड डीजल की आपूर्ति करने के लिए पाइपलाइन का निर्माण भी एक महत्वपूर्ण शुरुआत है। भविष्य में, म्यांमार के करीबी सीमावर्ती क्षेत्रों में तेल तथा गैस के नए स्रोत भी विकसित किए जाएंगे, जिससे असम में परिष्कृत उत्पादों का उत्पादन बढ़ेगा।

केंद्र की विभिन्न योजनाएं पहुंचा रही लाभ

आयुष्मान भारत योजना, जनऔषधि केंद्र, प्रधानमंत्री नेशनल डायलिसिस प्रोग्राम या हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स, लोगों के जीवन में काफी बदलाव लेकर आए हैं। खासतौर से पूर्वोत्तर भारत के लोगों के लिए ये सरकारी योजनाएं वरदान साबित हो रही हैं। गरीबों के सैकड़ों करोड़ रुपए इलाज पर खर्च होने से बच रहे हैं। आयुष्मान भारत योजना के साथ ही लोगों को ‘अटल अमृत अभियान’ से भी फायदा हो रहा है। इस योजना में गरीबों के साथ ही सामान्य वर्ग के नागरिकों को भी बेहद कम किस्त पर स्वास्थ्य बीमा का लाभ दिया जा रहा है। वहीं पूर्वोत्तर भारत में अब हैल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स भी खोले जा रहे हैं, जो गांव गरीब के प्राथमिक स्वास्थ्य की चिंता कर रहे हैं।

चाय वर्कर्स की प्रगति

यूं तो पूर्वोत्तर भारत के अलग-अलग राज्यों में चाय के बागान हैं लेकिन इनमें सबसे खास कोई है तो वो है असम के चाय बागान। असम के चाय बागान जितने ज्यादा खास, उतनी ही दयनीय स्थिति यहां लंबे वक्त तक चाय वर्कर्स की रही। इसे समझते हुए केंद्र सरकार ने टी वर्कर्स के लिए अहम फैसले लिए। बजट 2021-22 में जहां असम और बंगाल के चाय मजदूरों के लिए 1,000 करोड़ रुपए का ऐलान किया गया। बजट के दौरान वित्‍त मंत्री ने कहा था कि इसके लिए एक विशेष योजना तैयार की जाएगी। चाय के बागानों में चाय की पत्तियां तोड़ने का कार्य ज्यादातर महिलाएं करती हैं। इसलिए केंद्र सरकार ने महिला श्रमिकों को केंद्र में रखकर इस राहत पैकेज का ऐलान किया था।

पूर्वोत्तर भारत के विकास में केंद्र सरकार के अन्य अहम कदम

• बांस को ‘पेड़’ से ‘घास’ में फिर से वर्गीकृत किया गया। बता दें, बांस उत्तर पूर्व की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और यह नीति क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करती है क्योंकि पेड़ों के कटाव और परिवहन में कुछ प्रतिबंध हैं। पूर्वोत्तर भारत के निवासी बांस से वस्तुएं बनाकर बेचते हैं जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में खास मांग है।

• रीमा दास की फिल्म ”विलेज रॉकस्टार” को सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस तरह की मान्यताएं और पुरस्कार इस क्षेत्र में नवोदित प्रतिभाओं को प्रेरणा प्रदान करते हैं और पारंपरिक ज्ञान को तोड़ते हैं जो यह बताता है कि दूरी के अत्याचार के कारण उत्तर पूर्व का भविष्य सीमित है।

• पूर्वोत्तर क्षेत्र में वस्त्र संवर्धन योजना के तहत अरुणाचल प्रदेश में बड़े पैमाने पर एकीकृत ”एरी” खेती शुरू की गई थी। बता दें, एरी रेशम किसानों और बुनकरों को कौशल प्रशिक्षण के साथ-साथ एनईआरटीपीएस के तहत 4,000 लाभार्थियों को वित्तीय सहायता की घोषणा की जा चुकी है।

• केंद्र सरकार के नेतृत्व में, राष्ट्रीय स्तर पर क्षेत्रीय नीतियों को और सुदृढ़ किया गया है। इसने इस क्षेत्र को राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में दृश्यता और मान्यता प्रदान की, जिसने अंततः इस क्षेत्र को और अधिक सुरक्षित बना दिया, साथ ही इसे शेष राष्ट्र के करीब ला खड़ा किया। फूड पार्क, कपड़ा उद्योग और सूचना प्रौद्योगिकी की बढ़ती संख्या के साथ, उत्तर पूर्व में भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच व्यापार लिंक बनने और आने वाले वर्षों में एक नए रूप में उभरने की क्षमता है। दक्षिण एशियाई उप-क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग (एसएएसईसी) सड़क संपर्क कार्यक्रम के साथ क्षेत्र का महत्व बढ़ाया गया है, जिसमें चीन की महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) पहल की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

• साल 2016 में भारत के बेहतरीन खिलाड़ियों में से एक मैरी कॉम राज्यसभा की सदस्य बनीं। यह न केवल मणिपुर के लिए बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए भी गर्व की बात थी। खेल प्रतिभाओं को पोषित करने के लिए केंद्रीय नेतृत्व की प्रतिबद्धता मणिपुर में पहले राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय में परिलक्षित होती है।

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