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स्वच्छ घाटों के बाद वाराणसी में गंगा भी होगी प्रदूषण मुक्‍त

वाराणसी में स्‍वच्‍छ घाटों का आनंद उठा रहे सभी लोग जल्दी ही इस आध्यात्मिक नगरी में गंगा के प्रदूषण मुक्त स्‍वच्‍छ जल का भी आनंद उठाएंगे। नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत गंगा नदी में बहने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए और घाटों को साफ सुथरा करने के लिए एक व्‍यापक दृष्टिकोण के साथ कार्य किया जा रहा है। सीवेज उपचार संयंत्रों से घाटों की स्थिति सुधारने और गंगा नदी के सतह की सफाई करने के लिए वाराणसी में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन द्वारा समयबद्ध तरीके से अनेक कदम उठाए जा रहे हैं ताकि इस नदी को प्रदूषण से मुक्‍त बनाया जा सके।

वाराणसी शहर में वर्तमान में अनुमानित 300 एमएलडी सीवेज उत्पन्न होता है, जिसके वर्ष 2030 तक बढ़कर 390 एमएलडी हो जाने का अनुमान है। तीन मौजूदा सीवेज उपचार संयंत्रों – दीनापुर, भगवानपुर और डीएलडब्ल्यू की वर्तमान क्षमता केवल 102 एमएलडी सीवेज की है जबकि बकाया सीवेज वरुणा और अस्सी नदियों के माध्यम से सीधे गंगा नदी में प्रवाहित हो जाता है। इस अंतर को पूरा करने के लिए जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जेआईसीए) की मदद वाली परियोजना और जेएनएनयूआरएम योजना के तहत क्रमशः 140 एमएलडी एसटीपी का संयंत्र दीनापुर में और 20 एमएलडी एसटीपी संयंत्र का गोइठा में निर्माण किया जा रहा है। ये परियोजनाएं निर्माण के अंतिम चरण में हैं और मार्च 2018 से पहले काम करना शुरू कर देंगी। इसके अलावा हाइब्रिड वार्षिकता आधारित पीपीपी मॉडल के तहत 50 एमएलडी एसटीपी का रमना में निर्माण किया जा रहा है जो अस्सी बीएचयू क्षेत्र की सीवेज शोधन उपचार आवश्यकताओं को पूरा करेगा। इस परियोजना के लिए अनुबंध पर पहले ही हस्ताक्षर किए जा चुके हैं। इस प्रकार कुल 412 एमएलडी की सीवेज उपचार क्षमता का सृजन होगा जो 2035 तक शहर की सीवेज प्रबंधन की मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त है।

इसके अलावा वरूणा और अस्सी नदियों के लिए इंटरसेप्टर सीवर के कार्य, चौका घाट, फुलवारिया और सराया में तीन पम्पिंग स्टेशनों का विकास, पुराने ट्रंक सीवरों का पुनर्वास तथा घाट पम्पिंग स्टेशनों का पुनर्वास और मौजूदा एसटीपी के कार्य चल रहे हैं जिनसे वाराणसी में पूरे सीवेज बुनियादी ढांचे में सुधार आएगा। निसंदेह कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है।

गंगा नदी में तैरते हुए कचरे की समस्‍या को दूर करने के लिए अप्रैल 2017 से वाराणसी में ट्रेश स्‍कीमर कार्य कर रहा है।

गंगा के आसपास के क्षेत्र को समान रूप से साफ किए बिना स्‍वच्‍छ गंगा का काम अधूरा रहेगा। इसे स्वीकार करते हुए भारत सरकार ने पिछले साल नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत वाराणसी के 84 प्रतिष्ठित और विरासत घाटों की साफ-सफाई का काम शुरू किया, जिसके सकारात्मक परिणाम दिखाए दे रहे हैं।

इसके अलावा 20.07 करोड़ रूपए की अनुमानित लागत से 153 सामुदायिक शौचालयों के निर्माण के लिए काम सौंपा गया है जिसमें से 109 शौचालयों का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है और 15,000 से 20,000 लोगों द्वारा इनका रोजाना इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके अलावा 26 स्थानों पर घाट सुधार कार्य किया जा रहा है और इतने ही घाटो पर मरम्मत कार्य किये जा रहे हैं। घाटों पर कपड़ों की धुलाई से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए चार घाटों पांडेपुर, नदेसर, भवानी पोखरन और कोनिया की मरम्‍मत की गई है, जबकि तीन अन्‍य घाटों बजरदीहा, मचोदरी स्लॉटर हाउस और भवानिया पोखरी (विस्तार) का निर्माण कार्य चल रहा है। धोबी समुदाय के बहुत से लोग नए घाटों में चले गए हैं। अन्य धोबियों को भी ऐसा करने के लिए कहा जा रहा हैं।

संक्षेप में वाराणसी में गंगा को निर्मल बनाने के लिए केंद्रित प्रयासो के अच्‍छे परिणाम सामने आये है। इन प्रयासो से निर्मल गंगा अब वाराणसी शहर के लिए केवल एक सपना नहीं रहेगी।

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