ऋषियों की तपस्थली से अपने कठिन परिश्रम से गौरांगी चावला को मिली बड़ी सफलता

दादी की पोती हुई टॉपर तो खुशी से छलकी आंखें

ऋषिकेश: ऋषियों की तपस्थली से अपने कठिन परिश्रम और तप के दम पर गौरांगी चावला ने आज अपनी मंजिल की तरफ एक बड़ा कदम बढ़ाया है. गौरंगी के पिता अनिल चावला का अपना हैंडीक्राफ्ट का बिजनेस और उनकी मां एक साधारण ग्रहणी. गौरंगी की बड़ी बहन फिलहाल एम. लिब कर रही है.

सीबीएसई 12वीं की परीक्षा में 99.6 प्रतिशत अंक लाकर पूरे देश में दूसरे स्थान पर आने वाली ऋषिकेश की गौरांगी चावला का सपना सिविल सर्विस है. गौरांगी सिविल सर्विस में जाना चाहती हैं और वो समाज की सेवा करना चाहती हैं. खास तौर से समाज मे जातिप्रथा को लेकर वो काम करना चाहती हैं. गौरांगी अपनी आगे की पढ़ाई दिल्ली यूनिवर्सिटी से करने की इच्छुक हैं. हालांकि फिलहाल वो अभी तय करना बाकी है.

जानिए क्या है गौरांगी की सफलता का राज

उत्तराखंड के एक छोटे से शहर ऋषिकेश की रहने वाली गौरंगी ने आज सीबीएसई 12वीं की परीक्षा में देश में दूसरा स्थान हासिल कर न सिर्फ उत्तराखंड का मान बढ़ाया है बल्कि ऋषियों की तपस्थली ऋषिकेश के नाम के मायने भी साबित किए हैं.

कठिन परिश्रम व तपस्या के दम पर गौरंगी ने यह सफलता अर्जित की है. गौरंगी की स्कूलिंग ऋषिकेश स्थित निर्मल आश्रम पब्लिक स्कूल से हुई. शुरुआत से ही हो पढ़ने में काफी अच्छी रही. गौरांगी ने हयूमैनिटिज़ को चुना और जियोग्राफी उनका पसंदीदा विषय है.

इसके अलावा हिस्ट्री , इंग्लिश , पोलिटिकल साइंस , फिजिकल एजुकेशन उनके सब्जेक्ट हैं. गौरांगी को बुक पढ़ने का शौक है. गौरांगी का कहना है कि पढ़ाई के लिए जरूरी नहीं बुकवार्म बना जाए बल्कि खेल और मनोरंजन भी साथ साथ बेहद जरूरी है.

मेडिकल छोड़ नॉन मेडिकल स्ट्रीम चुनी

गौरांगी ने पहले साइंस स्ट्रीम चुन ली लेकिन महज 4 दिनों में ही गौरांगी का जब साइंस में मन नही लगा तो फिर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए गौरांगी ने अपना मनचाहा स्ट्रीम चुना. वो मानती है कि इस सफलता के बाद उसकी अपने लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में चुनौती और बढ़ गई है लेकिन साथ ही वो इसके लिए भी पूरी तरह से तैयार है.

गौरांगी की दादी अपनी पोती की सफलता पर फूली नहीं समा रही. वो खुद फोन पर अपने रिश्तेदारों को गौरांगी की सफलता की खबर देती नहीं थकती है. बचपन से ही गौरांगी के पिता ने अपनी दोनों बेटियों को उनकी चाहत के मुताबिक पूरी छूट दी. कभी भी अपने बच्चों पर फैसले नहीं थोपे.

उन्हें वो आजादी दी ताकि उनकी बेटियां अपने सपनोंकी उड़ान उड़ सके. मां ने भी बेटियों का पूरा साथ दिया ताकि वो अपना मुकाम अपनी मंजिल हासिल कर सकें. आज दोनों बेटियां अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रही है. माँ-पिता के लिए उनकी दोनों बेटियां बेटों से कम नहीं.

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