क्रोध पर पाएं नियंत्रण,नहीं तो बन सकती है रिश्तों के लिए विनाशकारी

वह हिंसा, शारीरिक चोट और मौत का कारण बन सकता है

क्रोध निस्संदेह एक आत्म-पराजित और आत्म विनाशकारी भावना है। यह भावना नींद में परेशानी, थकान, उच्च रक्तचाप, हृदय की समस्याएं, अल्सर, जोड़ों में जकड़न और अन्य शारीरिक समस्याएं पैदा कर सकती है।

शत्रुतापूर्ण क्रोध की अभिव्यक्ति भी रिश्तों के लिए विनाशकारी है। क्रोध जब नियंत्रण से बाहर हो जाता है तो वह हिंसा, शारीरिक चोट और मौत का कारण बन सकता है।

यह सवाल अक्सर पूछा जाता है कि क्या क्रोध अन्य लोगों के अनचाही और अवांछित कार्यों की केवल एक प्रतिक्रिया है? जवाब है नहीं।

केवल निराशा ही क्रोध को जन्म नहीं देती बल्कि आप उसे जिस दृष्टि से देखते हैं वह भी क्रोध का कारण बनती है। अत्यधित क्रोध तब पैदा होता है जब चीजें वैसी नहीं होती जैसा कि आप चाहते हैं और मानते हैं कि उन्हें वैसा होना ‘चाहिए’।

इसका अर्थ है, बहस विषय पर केंद्रित होनी चाहिए और उसे एक ऐसे झगड़े में नहीं बदलना चाहिए जिसमें इतिहास की बातों व अन्य मामलों को उठाया जाए और व्यक्तिगत हमले किए जाएं।

असली मुद्दे की पहचान करें –

अकसर कुछ गहरे अंतर्निहित मुद्दे विशेष लक्षणों का रूप ले लेते हैं। क्रोध केवल अंतर्निहित चोट, डर, निराशा दर्द या स्वाभिमान की कमी का एक लक्षण है। इसलिए असली मुद्दे की पहचान और स्वीक्रति के बिना बहस करना मूर्खतापूर्ण है।

मुझे ऐसा महसूस होता है’ स्वरूप का प्रयोग करें –

आप हमेशा’, ‘आप कभी नहीं’, ‘आप हो’ स्वरूप की जगह। आपको अपने अंदर चल रही बातों के बारे में बात करनी होगी और अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का साहस दिखाना होगा।

कब रुकना है ये जानें –

कभी कभी तब भी क्रोध आ सकता है जबकि आप जानते हों कि आप जो चाहते थे वह उस व्यक्ति ने आपको दे दिया है,

अर्थात समस्या के लिए उसका योगदान, आपकी भावनाओं की स्वीकृति या माफी आपको प्राप्त हो चुकी है लेकिन फिर भी, आप समझ नहीं पाते कि जो आपको चाहिए था वो आपको पहले ही मिल चुका है।

अपने विचार को सरलता से रखें –

हर मुद्दे या असहमति में क्रोध व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। यदि आप सही भी हैं, तो कभी कभी अपने विचार या भावनाओं को उत्सुकता से प्रतिक्रिया का इंतज़ार किए बिना सरलता और आत्मविश्वास से उत्सुकता रखना ही सही होता है।

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