छत्तीसगढ़

शासकीय सेवा ने बदली पहाड़ी कोरवा दम्पत्ति का जीवन

<p>कोरबा : सदियों से चली आ रही परम्परा ने हमें आगे बढ़ने ही नहीं दिया। जंगलों में रहकर जीवन-यापन आज के युग में आसान नहीं है। सरकारी नौकरी मिलने के बाद अब परिस्थितियां बहुत बदल गई है। पहले परिवार के साथ जंगलों में जाना पड़ता था। जंगल में चार, तेंदू समेत अन्य फल-फूल इकट्ठा करने के साथ बकरी चराना भी पड़ता था। अब बदलते परिवेश में खुद को स्थापित करना भी एक चुनौती सी रही, लेकिन सरकारी नौकरी में आकर स्वयं को बदलना आसान हो गया। पहले और अब की दिनचर्या में बहुत अंतर है। यह कहना है पहाडी कोरवा दम्पति दुखित राम एवं उसकी पत्नी नीराबाई का। मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह द्वारा विशेष पिछड़ी जनजाति के बेरोजगार युवाओं को नौकरी दिये जाने के निर्णय के पश्चात दुखित राम एवं नीरा बाई को स्कूलों में भृत्य की नौकरी मिली थी। अब जबकि नौकरी मिले हुये कई साल बीत गये है। ऐसे में दुखितराम और नीरा की दिनचर्या में परिवर्तन तो दिखता ही है,साथ ही इनके बच्चों की जीवनशैली अन्य पहाड़ी कोरवाओं की जैसे न होकर सामान्य हो गई है। पहाड़ी कोरवा दम्पत्ति भी अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देना चाहते है।</p>

<p>कोरबा विकासखंड अन्तर्गत ग्राम टोंकाभाठा में रहने वाले पहाडी कोरवा दुखितराम एवं उसकी पत्नी नीरा बाई अब बहुत खुश है। नौकरी में आने के बाद हर महीने वेतन मिलने से आर्थिक रूप से सक्षम बनने का मौका भी मिल गया है। पहाडी कोरवा दुखितराम ने बताया कि नौकरी में आने से पहले वह छातासरई में निवास करता था। घने जंगल व पहाड़ों में रहने की वजह से उसका पूरा दिन जंगल में ही गुजरता था। नौकरी लगने के बाद उसने मोटर सायकिल एवं टीवी, घर का सामान खरीदा। दुखितराम ने बताया कि उसका परिवार बहुत गरीब है। घर में खर्च के लिये कुछ रूपये देने के बाद बच्चों को पढ़ाने के लिये भी कुछ पैसे बचत करने की कोशिश करता है। दुखितराम इस समय ग्राम पंचायत तिलाईडांड के आश्रित ग्राम कोडियाघाट मिडिल स्कूल में भृत्य के रूप् में कार्यरत है।</p>

<p>उसकी पत्नी नीरा बाई हाईस्कूल अजगरबहार में भृत्य पद पर काम करती है। उसने बताया कि आठ साल पहले मुख्यमंत्री डा. रमनसिंह ने एक समारोह में सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र दिया था। भृत्य पद पर कार्यरत दुखित राम एवं उसकी पत्नी नीराबाई को वह दिन आज भी याद है। राज्य के विशेष पिछड़ी जनजातियों की श्रेणी में आने वाली कोरवा जाति के युवकों को रोजगार देकर समाज की मुख्य धारा में जोड़ने राज्य शासन की पहल का दुखित राम एवं नीराबाई को समय पर लाभ मिला। नीराबाई बताती है कि कोरवाओं का जीवन बेहद ही संघर्षमय है। रोजी-रोटी के लिए क्या-क्या नहीं करने पड़ते। परिवार के साथ जंगल जाना, बकरी चराना और दूसरे कामों में हाथ बंटाना दिनचर्या थी। कोरवा महिला नीराबाई ने बताया कि वह अपने मायके कोरई में रहकर पांचवी तक की पढ़ाई पूरी की।</p>

<p>आठवीं तक की पढ़ाई सतरेंगा के विद्यालय में पूरी हुई। आठवी की परीक्षा पास करने के बाद उसकी शादी हो गई और वह ग्राम कोरई से छातासरई अपने पति के घर आ गई। शादी के लगभग 5 से 6 साल बाद तक स्थिति जस की तस रही। बकरी चराना, जंगली फल, फूल संग्रहण करना दिनचर्या में शामिल था। कई रोज ऐसे भी होते थे कि भूखे रहने की नौबत आती थी। कुछ समय बाद जब सरकारी नौकरी के लिए जानकारी मांगी गई तो उम्मीदें बढ़ गई और कुछ महीने के भीतर उम्मीद हकीकत में बदल गया। कोरवा महिला नीराबाई ने बताया कि हाईस्कूल अजगर बहार में उसकी नियुक्ति हुई है। ग्राम टोकाभांठा में कोरवा मुहल्ले में रहना होता है। उसने बताया कि नौकरी लगते ही जो कुछ कर्ज था उसका चुकता कर दिया है। नीरा का कहना है कि अब तो वह जहां नौकरी करती है अपने बच्चों भेजकर अच्छे से पढ़ायेगी। मैं अपने समाज को कहती हूं कि नई पीढ़ी को जरूर स्कूल भेजे और काबिल बनाएं ताकि सरकार उन्हें नौकरी दे सके।</>

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