बडी बडी ख्याति तथा राज पद इत्यादि प्राप्त होता है, इस गजकेसरी योग के द्वारा:-

आचार्य पं. श्रीकान्त पटैरिया ज्योतिष विशेषज्ञ:- किसी भी प्रकार की समस्या समाधान के लिए सम्पर्क कर सकते हो, सम्पर्क सूत्र:- 9131366453

1. ) जब कुंडली में गुरू और चंद्रमा एक साथ किसी भी भाव में बैठे हो तो वह गजकेसरी योग कहलाता है।

2.) कितने ज्योतिषियों का मत है कि गुरू और चंद्रमा एक साथ केंद्र या त्रिकोण में बैठे हो तभी गजकेसरी योग होगा।

3.) कितने का मत ऐसा भी है कि गुरू और चंद्रमा की दृष्टि भी गजकेसरी योग का निर्माण करती है।
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गजकेसरी योग प्रबल रूप से तब बनता है जब गुरू और चंद्रमा कर्क राशि में हो। यहां चंद्रमा अपनी राशि का होता है तथा गुरू उच्च का होता है। अगर इस योग में शनि, राहु, सूर्य की दृष्टि या युति ना हो तो यह योग सत् प्रतिशत (100%) फल देगा।

(यह योग 144 व्यक्तियों में से किसी एक व्यक्ति के ही कुंडली में पाया जाता है। )

क्योंकि गुरू किसी भी राशि के घर में लगभग 12 से 13 महीने का रहता है और चंद्रमा वहां से महीने में एक बार यानी पूरे 12 से 13 महीने में लगभग 12 बार ही गुजरेगा।
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जब गुरू धनु या मीन का हो और वहां चंद्रमा गुजरे तो गजकेसरी योग का निर्माण होगा। लेकिन यह आपको 80% ही फल देगा। यहां गुरू स्वग्रह तो है लेकिन चंद्रमा का यह मित्र घर है। लेकिन यह पहले जैसा योग के तरफ फल नहीं दे सकता।
( यह 72 व्यक्तियों में से किसी एक व्यक्ति की कुंडली में पाया जाता है। )
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अगर अन्य राशियों पर गुरू और चंद्रमा एक साथ है। यहां यह महत्वपूर्ण बात हो जाती है कि वह केंद्र या त्रिकोण में हो। क्योंकि केंद्र भाव सुख का और त्रिकोण प्रारब्ध का भाव होता है। तब आप समझिए कि आपको 60% फल प्रदान करेगा।
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मकर राशि में गुरू नीच का होता है। वह चंद्रमा का भी मित्र घर नहीं है। यहां गजकेसरी योग अगर आपकी कुंडली में है तो 20% भी अगर काम करता है तो बहुत है।
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वृश्चिक राशि गुरू का मित्र घर है हालांकि चंद्रमा या नीच का होता है लेकिन मंगल चंद्रमा का भी मित्र है। यहां बने गजकेसरी योग को आप उतना खराब नहीं मान सकते हैं अतः यह 40% फल तो देगा ही।
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गुरू और चंद्रमा दोनों मित्र हैं। शुभ ग्रह है। दोनों ही द्रव कारक ग्रह हैं।
( चंद्रमा की महादशा तथा गुरू की अंतर्दशा या गुरू की महादशा चंद्रमा की अंतर्दशा में यह योग काफी प्रबल हो जाता है। )

व्यक्ति के जीवन स्तर या व्यक्तित्व को बहुत ऊंचा उठा देता है। नाम , इज्जत, शोहरत, दौलत से आदमी बहुत धनी हो जाता है। जो भी उसकी मनोकामना या इच्छा होती है। इस योग के कारण पूर्ण हो जाता है। इस योग के कारण जातक को मंत्री पद , मंत्रालय या सचिवालय में सचिव का पद , राष्ट्रीय सम्मान , राष्ट्रीय पुरस्कार , राज्यपाल आदि के पद में भी योगदान दिलाता है। अंतर्राष्ट्रीय सम्मान भी दिलाता है।
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किसी अन्य ग्रह की महादशा में चंद्रमा या गुरू की अंतर्दशा में भी यह योग कारगर होता है। प्रतिष्ठा सम्मान दिलाता है। जीवन स्तर को ऊंचा करता है।
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जहां तक दृष्टि का सवाल है। अगर गुरू और चंद्रमा एक दूसरे से सप्तम हो यानी एक दूसरे से दृष्ट होना। तो ही गजकेसरी योग का आप कुछ अंश तक मान सकते हैं। इसे आप पूर्ण योग नहीं मान सकते क्योंकि यहां गुरू और चंद्रमा दोनों 2 राशियों में होते हैं।

अगर गुरू कर्क में है तो चंद्रमा मकर में होगा। दोनों के स्वभाव में अंतर आ जाता है इसलिए फल में भी अंतर आ जाएगा।

उसी प्रकार अगर गुरू पंचम या नवम दृष्टि से सिर्फ चंद्रमा को देखता है चंद्रमा गुरू को नहीं देखता। इसे भी आप गजकेसरी योग का पूर्ण फल मानकर मत चलिए। आंशिक मान सकते हैं।
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किसी भी प्रकार की समस्या समाधान के लिए आचार्य पं. श्रीकान्त पटैरिया (ज्योतिष विशेषज्ञ) जी से सीधे संपर्क करें = 9131366453
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