राजनीति

गुजरात चुनाव: एंटरटेनमेंट से भरपूर सुपरहिट है यह इलेक्शन

पिछले एक हफ्ते में अखबार और बड़ी वेबसाइट्स पर आई कुछ खबरों पर गौर कीजिए. शब्दों की थोड़ी हेरफेर है लेकिन एक हेडलाइन आपको कॉमन मिलेगी- रोमांचक हुआ गुजरात का चुनाव. कमोबेश ऐसे ही नाम आपको न्यूज चैनलों पर चलने वाले शोज के भी मिलेंगे.

तारीख का ऐलान होना बाकी है. लेकिन चुनाव रोमांचक अभी से हो गया है. इस देश की जनता राजनीति में भी एंटरटेनमेंट वैल्यू ढूंढ लेती है बल्कि कहना ये चाहिए कि अगर असली एंटरटेनमेंट कहीं है, तो वो राजनीति में ही है. शायद जनता को लगता है कि अगर पॉलिटिकल सिस्टम कुछ दे नहीं सकता तो कम से कम मनोरंजन ही करे.

गुजरात के चुनाव का एंटरटेनमेंट वैल्यू ज्यादा क्यों?

तो जनता अपने ‘जॉय राइड’ के लिए तैयार हो चुकी है. यूपी का चुनाव एक मल्टी-स्टारर ब्लॉकबस्टर था तो गुजरात का चुनाव एक ऐसा एंटरटेनमेंट पैकेज है, जहां भारतीय राजनीति के दो सबसे बड़े सितारों की सीधी भिड़ंत है.

एक तरफ रजनीकांत को मात देते नरेंद्र मोदी तो दूसरी तरफ चॉकलेटी राहुल गांधी. एक तरफ सुपरह्यूमन तो दूसरी तरफ एक ऐसा हीरो जो लगातार पिटने के बावजूद मैदान छोड़ने को तैयार नहीं है और ‘फाइटर हमेशा जीतता है’ वाले जज्बे के साथ नई शक्तियां बटोरकर फिर से मैदान में आ डटा है.

टीवी चैनलों के लिए गुजरात और महाराष्ट्र हमेशा से सबसे बड़े टीआरपी जोन रहे हैं. ताज्जुब नहीं अगर न्यूज चैनल अभी से गुजरात चुनाव को एक मेगा इवेंट बनाने में जुट गए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर विधानसभा चुनाव को अपनी निजी प्रतिष्ठा की लड़ाई बनाकर लड़ा है. लेकिन गुजरात का चुनाव उनके लिए सचमुच प्रतिष्ठा की लड़ाई है.

पिछले 15 साल में यह गुजरात का पहला ऐसा चुनाव है, जिसमें नरेंद्र मोदी सीएम के कैंडिडेट नहीं है. उनके गुजरात छोड़ने के बाद से राज्य में काफी राजनीतिक उथल-पुथल हो चुकी है.

मोदी के पीएम बनने के बाद गुजरात पहला ऐसा बीजेपी शासित राज्य है, जहां आलाकमान को अपना सीएम बदलना पड़ा है. दलितों के आंदोलन के बाद आनंदीबेन पटेल को हटाकर विजय रूपानी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गई. लेकिन पिछले 22 साल से सत्ता पर काबिज बीजेपी लगातार दबाव में है.

नोटबंदी के बाद जीएसटी को लेकर उठ रहे सवालों के बाद केंद्र सरकार पहली बार बैकफुट पर है और कांग्रेस लंबे समय बाद आत्मविश्वास से भरी नजर आ रही है. मोदी जानते हैं कि वे किसी भी हालत में गुजरात को हाथ से जाने नहीं दे सकते क्योंकि इस नतीजे का सीधा असर 2019 की उम्मीदों पर पड़ेगा.

जाहिर है, ऐसे में माहौल में हो रहे चुनाव में राजनीतिक तापमान एक अलग स्तर पर है. पीएम मोदी तारीख के ऐलान से पहले ही अलग-अलग घोषणाओं का पिटारा लेकर गुजरात के पांच चक्कर लगा चुके हैं. राहुल गांधी भी बाकायदा गुजरात में कैंप कर रहे हैं. जनता सोच रही है कि जब अभी ये हाल है तो तारीख के ऐलान के बाद क्या होगा?

बीजेपी की निगाहें सुपरहिट जोड़ी पर

नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी के बारे में यह बात हमेशा से मशहूर रही है कि वे हर चुनाव में एक नई पटकथा लेकर मैदान में आते हैं. दांव इतना चौंकाने वाला होता है कि विरोधी पार्टियां जब तक संभले, काम हो चुका होता है.

उत्तर प्रदेश के कैंपेन में भी कुछ ऐसा ही हुआ. अखिलेश यादव के विकास के एजेंडे का जवाब बीजेपी ने श्मशान बनाम कब्रिस्तान से दिया. देखते-देखते पूरा खेल बदल गया.

सवाल ये है कि गुजरात में मोदी और शाह की पटकथा क्या होगी? पहली बार बीजेपी दुविधा में नजर आ रही है. जिस गुजरात मॉडल को लेकर मोदी ने गांधीनगर से दिल्ली का तक सफर तय किया, उसके बारे में खुद पार्टी इस बार आश्वस्त नहीं है. यही वजह है कि हवा का रुख भांपने के लिए हिंदुत्व के पोस्टर बॉय और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के रोड शो गुजरात में करवाए गए.

विकास और हिंदुत्व हमेशा नरेंद्र मोदी के दो चुनावी घोड़े रहे हैं. कभी कोई आगे तो कभी कोई पीछे. वक्त और वोटरों के मूड के हिसाब से इन्हें आगे-पीछे किया जाता रहा है. इस बार विकास बहुत असरदार नजर नहीं आ रहा है.

लेकिन विकास प्रधानमंत्री मोदी की पूरी शख्सियत से जुड़ा हुआ है इसलिए उसे छोड़ा नहीं जा सकता. एक जनसभा में ‘मैं गुजरात हूं, मैं विकास हूं’ का नारा बुलंद करके मोदी ने बता दिया कि नई पटकथा विकास के इर्द-गिर्द ही लिखी जाएगी भले ही नारे और जुमले बदलने पड़े.

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