राष्ट्रीय

क्या हम संवेदनहीन समाज बन चुके हैं?

ठीक एक साल पहले 2016 की दीवाली के एक दिन बाद पूरे दिल्ली-एनसीआर के अलावा देश के दूसरे कई हिस्सों में आसमान में घना कोहरा छा गया था. लोगों को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी. सांस लेते हुए ऐसा लग रहा था जैसे धुंआ पी रहे हों. न जाने कितने लोग छाती में दर्द की शिकायत लेकर अस्पताल में भर्ती हुए थे. तकरीबन छठवें दिन धूप की किरणें जमीन पर पहुंची थीं और फिर धीरे-धीरे वो कोहरा छंटा था.

वो भयावह याद इस साल भी लोगों के दिमाग में दीवाली का खयाल आते ही तारी हो रही थी. लोग फिर उन भयावह यादों को लेकर डरे हुए थे. फिर दीवाली के बस कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया कि आगामी 31 अक्टूबर तक दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री पर बैन रहेगा.

इसके बाद वो लोग बेहद राहत महसूस कर रहे थे जो प्रदूषण से होने वाली परेशानियों को लेकर चिंतित थे. लेकिन इसके बाद शुरू हुआ व्हाट्सऐप और सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट के विरोध में दुष्प्रचार. न जाने कितने लोगों ने इसे हिंदू अस्मिता से जोड़ दिया.
सोशल मीडिया पर जमकर ऐसे पोस्ट दिखने लगे जिनमें ये डिमांड की जा रही थी कि अगर दीवाली में पटाखे बैन हो रहे हैं तो बकरीद में कुर्बानी भी बैन कर देनी चाहिए. लोगों का लॉजिक था इसमें न जाने कितने मासूम जानवरों की जान चली जाती है और उनके खून से जो जल प्रदूषण होता है वो भी बेहद खतरनाक है.

दिल्ली बीजेपी प्रवक्ता तेजिंदर सिंह बग्गा सुप्रीम कोर्ट के सामने ही बच्चों में पटाखे बांटते देखे गए. केंद्र की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता की इस गैर जिम्मेदाराना हरकत पर क्या कार्रवाई हुई, ये शायद किसी को नहीं पता. शायद हुई ही नहीं. लेकिन होनी चाहिए थी. इसलिए होनी चाहिए थी कि खुद प्रधानमंत्री मोदी देश में सफाई को लेकर अभियान चलाए हुए हैं, ऐसे में पार्टी के छोटे नेता पर्यावरण के बचाव के लिए इतने संवेदनहीन हों ये कैसे हो सकता है?

खैर, पार्टियों ने तो वोटबैंक के लिए गलत-सही के मायने खत्म कर दिए हैं. लेकिन इस दीवाली सबसे ज्यादा तकलीफ आम लोगों के व्यवहार से हुई. नि:संदेह इस बार दिल्ली-एनसीआर में पिछली बार से कम पटाखे चलाए गए.

इसमें सुप्रीम कोर्ट के बैन का भी काफी योगदान है. लेकिन इसके बावजूद लोग अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ पटाखे चलाते देखे गए. आखिर ये कैसी संवेदनहीनता है कि जिस बच्चे की जरा सी खुशी के लिए आप पटाखे चला रहे हैं… उसके सांस लेने के लिए कैसी दुनिया बचेगी.
दिवाली में भले ही इस बार संख्या में कम पटाखे चलाए गए लेकिन लोगों में छिपी असंवेदनशीलता सबसे ज्यादा दिखी. ये तर्क खूब सुने गए कि पटाखे बेचने पर पाबंदी है, चलाने पर थोड़े ही है!

एक और जो खराब बात लगातार घटित हो रही है और जो इस बार भी हुई वो है सोशल मीडिया का खराब रोल. अगर यूं ही चलता रहा तो ज्यादा दिन नहीं बचे हैं जब सोशल मीडिया अपनी प्रासंगिकता खो देगा. हर बात को धर्म से जोड़ देने की नकारात्मक कोशिशें साकार होती दिख रही हैं. लोग उद्वेलित होकर हर बार गलत राह चुन ले रहे हैं. मतलब पटाखे न बजाने से पर्यावरण में प्रदूषण होगा ये सामान्य बात है लेकिन धर्म का जिक्र आते ही और ज्यादा पटाखे खरीदकर लाना और चलाना. अजीब बात है.

Summary
Review Date
Reviewed Item
संवेदनहीन समाज
Author Rating
51star1star1star1star1star
Tags

Related Articles

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *