10% आरक्षण के खिलाफ याचिकाओं पर SC में 8 अप्रैल को सुनवाई

नई दिल्ली। सामान्य वर्ग के गरीबों को 10 फीसद आरक्षण देने के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट 8 अप्रैल को सुनवाई करेगा। गुरुवार को केन्द्र सरकार के वकीलों के दूसरे केस की सुनवाई में व्यस्त होने के कारण मामले की सुनवाई टल गई। वैसे तो गुरुवार को कोर्ट ने कानून पर रोक लगाने का कोई आदेश तो जारी नही किया, लेकिन याचिकाकर्ताओं द्वारा रेलवे भर्ती में 10 फीसद आरक्षण लागू किए जाने की दलील पर मौखिक तौर पर इतना जरूर कहा कि भर्ती सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधीन होगी।

सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं लंबित हैं जिनमें सामान्य वर्ग के गरीबों को आर्थिक आधार पर सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में दस फीसद आरक्षण देने के कानून को चुनौती दी गई है। पिछली सुनवाई पर भी कोर्ट ने कानून पर अंतरिम रोक लगाने की मांग ठुकरा दी थी। गुरुवार को सभी याचिकाएं न्यायमूर्ति एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सुनवाई के लिए लगी थीं।

शुरुआत में ही केन्द्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस मामले को विचार के लिए पांच न्यायाधीशों को भेजे जाने के मुद्दे पर अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल पक्ष रखेंगे लेकिन अटार्नी जनरल और वह स्वयं मुख्य न्यायाधीश के कोर्ट में चल रही संविधान पीठ की सुनवाई में व्यस्त हैं। अत: मामले की सुनवाई फिलहाल स्थगित कर दी जाए।

संक्षिप्त सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि मामला संविधानपीठ को भेजे जाने के मुद्दे पर अटार्नी जनरल पक्ष रखना चाहतें हैं, इसलिए वे इस मामले पर आठ अप्रैल को सुनवाई करेंगे। इसके अलावा कोर्ट ने दस फीसद आरक्षण के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं की पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में लंबित मामले की सुनवाई पर फिलहाल रोक लगा दी। इसके साथ ही कोर्ट ने मामला हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट स्थानांतरित करने की केन्द्र सरकार की मांग याचिका पर नोटिस भी जारी किया।

एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा कि यह मामला पांच न्यायाधीशों की संविधानपीठ को सुनवाई के लिए भेजा जाना चाहिए। आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता। उन्होंने इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों के फैसले का उदाहरण दिया।

केन्द्र सरकार पहले ही इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफनामा दाखिल कर कानून को सही ठहरा चुकी है। सरकार का कहना है कि न तो यह कानून संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है और न ही यह सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी मामले में दिए गए फैसले के खिलाफ है। सरकार का कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10 फीसद आरक्षण राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद कानून बन चुका है। यह कानून गरीबों के हक मे है। इससे कमजोर वर्ग को सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में प्रवेश में बराबरी का मौका मिलेगा।

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