छत्तीसगढ़

पुनर्वास नीति के तहत विवाहित पुत्री नौकरी पाने की हकदार

- अंकित राजपूत

बिलासपुर। हाईकोर्ट की डीबी ने छत्तीसगढ़ पुनर्वास नीति की धारा दो ग को संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 के विपरीत माना है। कोर्ट ने कहा कि पुनर्वास नीति के तहत विवाहित पुत्री भी प्रभावित परिवार का सदस्य होगी और भूमि अधिग्रहण के एवज में नौकरी पाने की हकदार है। इसके साथ एनएमडीसी की अपील को खारिज कर दिया है।

एनएमडीसी ने याचिकाकर्ता लीमवती के पिता पीलादास की जगदलपुर स्थित जमीन का अधिग्रहण किया है। पीलादास ने पुत्र के मंदबुद्घि होने पर जमीन के एवज में अपनी विवाहित पुत्री लीमवती को नौकरी देने के लिए आवेदन दिया। एनएमडीसी ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि छत्तीसगढ़ पुनर्वास नीति की धारा दो ग में विवाहित पुत्री को प्रभावित परिवार का सदस्य नहीं माना गया है।इसके खिलाफ लीमवती ने अधिवक्ता अजय श्रीवास्तव के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की।

इसमें कहा गया कि हाईकोर्ट ने पूर्व में धारा दो ग को संविधान के अनुच्छेद 14 व 16 के विपरीत मानते हुए अवैधानिक घोषित किया है। इसके साथ विवाहित पुत्री को भी प्रभावित परिवार का सदस्य माना है।

एकलपीठ ने विवाहित पुत्री को भी नौकरी पाने का हकदार बताते हुए नौकरी देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ एनएमडीसी ने डीबी में रिट अपील प्रस्तुत की। डीबी ने सुनवाई उपरांत एकलपीठ के आदेश को यथावत रखते हुए एनएमडीसी की अपील को खारिज कर दिया है।