मनाकुला विनायगर मंदिर : समुद्र में डुबोने पर भी लौट आई थी गणपत‍ि की मूर्ति

मंदिर में गणेश जी का 10 फीट ऊंचा भव्य रथ भी है

मनाकुला विनायगर मंदिर : समुद्र में डुबोने पर भी लौट आई थी गणपत‍ि की मूर्ति

पुडुचेरी स्थित गणपति के मनाकुला विनायगर मंदिर को बेहद खास माना जाता है। इसमें स्‍थापित मूर्ति को तमाम तरीके आजमाने पर भी नष्‍ट नहीं क‍िया जा सकता…

गणपत‍ि के मशहूर मंद‍िरों में पुडुचेरी के मनाकुला विनायगर मंदिर का भी नाम आता है। शास्त्रों में गणेश के जिन 16 रूपों की चर्चा है वे सभी मनाकुला विनायगर मंदिर की दीवारों पर नजर आते हैं। वहीं इस मंदिर का मुख सागर की तरफ होने से इसे भुवनेश्वर गणपति भी कहा गया है।

तमिल में मनल का मतलब बालू और कुलन का मतलब सरोवर होता है। प्राचीन कथाओं के अनुसार पहले यहां गणेश मूर्ति के आसपास ढेर सारी बालू थी, इसलिए ये मनाकुला विनायगर कहलाने लगे। इस मंदिर की दीवारों पर प्रसिद्ध चित्रकारों ने गणेश जी के जीवन से जुड़े दृश्य चित्रित किए हैं, जिनमें गणेश जी के जन्म से विवाह तक की अनेकों कथायें छिपी हुई हैं।

अपने न‍िर्माण के समय के हिसाब से मनाकुला विनायगर मंदिर भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है। कहा जाता है क‍ि 1666 में यहां फ्रांसीसियों के आने से भी पहले इस मंदिर का निर्माण हुआ था।

बताया जाता है क‍ि इस मंदिर में टनों सोना मौजूद है। करीब 8,000 वर्ग फुट क्षेत्र में बने इस मंदिर के अंदर भी सोने का ही काम है। साथ ही मुख्य गणेश प्रतिमा के अलावा 58 तरह की गणेश मूर्तियां स्थापित की गई हैं।

मंदिर में गणेश जी का 10 फीट ऊंचा भव्य रथ भी है। इसमें भी लगभग साढ़े सात किलोग्राम सोने का इस्तेमाल हुआ है। हर साल विजयादशी के दिन गणेश जी इसी रथ पर सवार होकर विहार करते हैं।

कहते हैं पुडुचेरी में फ्रांसीसी शासन के दौरान कई बार इस मंदिर पर हमले के प्रयास हुए और कई बार मंदिर में स्‍थापित गणपति प्रतिमा को समुद्र में डुबोया गया, पर हर बार यह अपने स्थान पर वापस आ जाती थी। कई बार मंदिर की पूजा में व्यवधान डालने की कोशिश भी की गई, लेकिन गणपति का यह मंदिर अपनी पूर्ण प्रतिष्ठा के साथ आज भी शान से खड़ा हुआ है।

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