बिलासा केंवटीन का इतिहास पीएमओ को भेजा गया

केंवटीन की प्रतिमा शनिचरी बाजार बाल्मिकी चौक में सन् 2000 में लगाया गया

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बिलासपुर। प्रधानमंत्री कार्यालय से पूछा गया है कि ऐसा कोई व्यक्ति जिसके नाम से बिलासपुर की पहचान बनी हो या उसके नाम से उसे जाना.पहचाना जाता हो।

इस सवाल का जवाब भाजपा कार्यालय से पीएमओ कार्यालय को बिलासा केंवटीन की इतिहास को भेजा गया है।

बता दें कि बिलासा केंवटीन की प्रतिमा शनिचरी बाजार बाल्मिकी चौक में सन् 2000 में लगाया गया है।

महानगर की ओर डग भर रहे बिलासपुर शहर को बिलासा केंवटिन ने बसाया था। इतिहास व कथा साहित्य में बिलासपुर की बसाहट 1560 में होना दर्शित है।

बिलासपुर को पहचान देने वाली बिलासा केंवटिन की स्मृतियों को संजोने वर्ष 2000 में शनिचरी में बिलासा की काल्पनिक स्टेच्यू बनाई गई।

मूर्ति आकर्षक है। इसकी प्रतिकृति छत्तीसगढ़ भवन बिलासपुर में भी लगाई गई है। बिलासपुर नगर बसाने वाली बिलासा केंवटिन कथा और साहित्यिकों के केंद्र में रही।

उसकी गौरव गाथा अलग अलग ढंग से प्रकाशित होती रही। कुछ गलत व्याख्याएं भी हुईं, इसलिए उसे मान्यता नहीं मिली। डा.पालेश्वर शर्मा ने लिखा कि बिलासा के संबंध में कोई प्रमाणिक तथ्य उपलब्ध नहीं है, इसलिए इतिहास जानने लोक साहित्य और पुरातत्व का सहारा लिया जाता है।

छत्तीसगढ़ी साहित्यए लोक कथाए लोक गीतों में बिलासा का वर्णन है। एक लोक गाथा के मुताबिक दिल्ली में गोपालराय एवं बिलासा केंवटिन के शौर्य प्रदर्शन से खुश होकर सम्राट जहांगीर ने उन्हें पुरस्कृत किया।

साहित्यकार एवं पुराविद् बाबू प्यारेलाल गुप्त ने रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर द्वारा प्रकाशित ग्रंथ प्राचीन छत्तीसगढ़ में बिलासा का जिक्र किया है।

गजेटियर में लिखा है कि 1861 तक बिलासपुर एक छोटा सा गांव था, मात्र कुछ झोपडिय़ां बिलासा केंवटिन की थी।

इतिहास में बिलासा की छवि अत्यंत रूपवती सौंदर्यशाली एवं वीरांगना नारी के रूप में किया गया है, जिसका जन्म अरपा के तट पर जूना बिलासपुर स्थित केंवटपारा में हुआ। जो रतनपुर के कल्चुरी राजा कल्याणसाय के दरबारियों में एक सम्मानित सदस्य थी।

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