राष्ट्रीय

भारत सहित 72 मुल्‍कों में गुनाह है समलैंगिकता

- इन देशों में मिलती है सजा-ए-मौत

नई दिल्ली :

भारत में समलैंगिकता को लेकर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है। अचानक से इस मुद्दे के सामने आने की वजह भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई का शुरू होना है। आईपीसी की इस धारा के तहत भारत में समलैंगिकता को अपराध माना गया है। इसके दोषियों के लिए 14 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक का प्रावधान किया गया है।

बता दें कि भारत एकमात्र देश नहीं है जहां समलैंगिकता को अपराध माना गया है। दुनिया के 72 देशों में समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखा गया है। कुछ देशों में तो इसके लिए मौत की सजा का भी प्रावधान किया गया है।

खासकर अरब देशों में समलैंगिक संबंधों के दोषियों के लिए बेहद कठोर दंड का प्रावधान किया गया है। इंटरनेशनल लेस्बियन, गे, बाईसेक्सुअल, ट्रांस एंड इंटरसेक्स एसोसिएशन की साल 2017 की वार्षिक रिपोर्ट में इससे जुड़े आंकड़े दिए दिए गए हैं।

इसके मुताबिक, समलैंगिकता के खिलाफ आठ देशों में सजा-ए-मौत की व्यवस्था की गई है। पांच अन्य देशों में भी इसके लिए तकनीकी तौर पर मृत्युदंड का प्रावधान है, लेकिन एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार, इन देशों में कभी इसे अमल में नहीं लाया गया।

-ईरान-सऊदी अरब में मौत की सजा का प्रावधान

बड़े अरब देशों में समलैंगिकता को लेकर बेहद सख्त प्रावधान किए गए हैं। इराक और सूडान के अलावा ईरान और सऊदी अरब जैसे देशों में समलैंगिकता के दोषियों के लिए मौत की सजा की व्यवस्था की गई है।

पाकिस्तान, अफगानिस्तान और मौरीतानिया में भी तकनीकी तौर पर (शरिया कानून की व्याख्या के अनुसार) इस अपराध के लिए मृत्युदंड का प्रावधान किया गया है। भारत में भी इसके लिए बेहद सख्त सजा की व्यवस्था की गई है। हालांकि, विश्व के विकसित देशों में समलैंगिक संबंधों को कानूनी तौर पर स्वीकार कर लिया गया है।

अमेरिका, इंग्लैंड और कनाडा जैसे देशों में समलैंगिक वैवाहिक संबंधों को कानूनी मान्यता दे दी गई है। लैटिन अमेरिकी देशों ब्राजील और अर्जेंटिना जैसे देशों में भी समलैंगिक संबंध को कानूनी बना दिया गया है। वहीं, ऑस्ट्रेलिया में पार्टनरशिप को मान्यता दे दी गई है।

-दिल्ली हाई कोर्ट का वो ऐतिहासिक फैसला

धारा 377 के तहत देश में समलैंगिकता को अपराध माना गया है। अंग्रेजों के जमाने में बने कानून को देश की सबसे बड़ी अदालत में चुनौती दी गई है, जिसपर सुनवाई शुरू हो गई है। बता दें कि दिल्ली हाई कोर्ट ने 2 जुलाई, 2009 के अपने ऐतिहासिक फैसले में धारा 377 के उस प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया था, जिसमें समलैंगिक संबंधों को अपराध माना गया था।

कोर्ट ने इस प्रावधान को मौलिक अधिकार का भी उल्लंघन करार दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। इसके बाद इस मामले को बड़ी पीठ के हवाले कर दिया गया था। अब इस मामले पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है।

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