संपादकीय

‘देश की कुंडली और आध्यात्मिक ज्योतिष’

डॉ. अजय भाम्बी

वैदिक काल से भारतवर्ष एक धर्मपरायण देश है। वैदिक ऋषियों और मनीषियों ने धर्म को बहुत गहरे में जाकर समझा और उसके मर्म को आम नागरिक तक पहुंचाया। वक्त और युगों के साथ समय बदलता गया और आज हम ऐसे दौर में पहुंच गये हैं

जहां धर्म पर संवाद तो बाद में होता है और पहिले न केवल बहस छिड़ जाती है बल्कि एक ऐसा वातावरण तैयार हो जाता है जहां कोई भी पक्ष किसी भी सीमा को लांघने से परहेज नहीं करता।

सबसे पहले भारतवर्ष की कुंडली पर नजर डालते हैं और यह जानने का प्रयास करेंगे कि हम वर्तमान स्थिति में क्यों हैं। स्वतंत्र भारत का जन्म 15 अगस्त 1947 को मध्यरात्रि दिल्ली में हुआ था और कुंडली इस प्रकार है:

भारत के जन्म के समय पूर्वी क्षितिज पर वृष लग्न उदित हो रहा था। राहू – लग्न, मंगल – मिथुन, सूर्य, चंद्र, बुध, शुक्र, शनि – कर्क, बृहस्पति – तुला और केतु – वृश्चिक राशि में विराजमान थे।

भारत को आजादी मिलने के कुछ दिन पूर्व राष्ट्रीय नेताओं ने उस समय के कुछ मूर्धन्य ज्योतिषियों से परामर्श किया था कि आजादी के लिए कौन सा समय उपयुक्त रहेगा। अधिकतर ज्योतिषियों की राय थी कि 14 – 15 अगस्त उपयुक्त दिन नहीं है लेकिन सर्वसम्मति से मध्यरात्रि अभिजित मुहुर्त में वृष लग्न का चयन किया गया।

उल्लेखनीय है कि भगवान कृष्ण भी अभिजित मुहुर्त और वृष लग्न में पैदा हुए थे। भगवान कृष्ण की कुंडली तो विलक्षण थी लेकिन देश की कुंडली को ऐसा सौभाग्य प्राप्त नहीं है फिर भी वृष लग्न अपने आप में बहुत सक्षम लग्न है जो अंतोत्गत्वा शुभ फल ही प्रदान करता है और भारत का महान बनना भी तय है।

राहू – केतु लग्न और सप्तम भाव में और सारे ग्रह इन्हीं दोनों ग्रहों के घेरे में हैं इसलिए यहां कालसर्प योग का प्रादुर्भाव भी होता है। द्वितीय भाव में मंगल है। तृतीय भाव में पांच ग्रह – सूर्य, शनि, बुध, शुक्र, चंद्र स्थित होकर प्रवज्र राजयोग भी बनाते हैं और यही प्रवज्र राजयोग इस कुंडली की जान भी है।

छटे भाव में बृहस्पति की स्थिति बड़ी कमजोर है और कौन भूल सकता है कि भारत देश के दो टुकड़े हुए थे और उसमें से एक पाकिस्तान बना था और ये बंटवारा धर्म के नाम पर हुआ था और उसी दिन से ये खाई इतनी गहरी हो गयी कि तमाम कोशिशों के बाद भी अभी तक इसकी भरपाई नहीं हुई है।

प्रवज्र राजयोगः

देश की कुंडली के तृतीय भाव में पांच ग्रह – सूर्य, शनि, शुक्र, बुध, चन्द्र मिलकर एक महान प्रवज्र राजयोग बनाते हैं। पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से हम ज्योतिष के विभिन्न पहलुओं पर रिसर्च कर रहे हैं उसमें प्रमुख राजयोग भी हैं।

हमारे अनुभव में हमने ऐसा पाया है कि जब किसी व्यक्ति की कुंडली में यह प्रवज्र राजयोग होता है तो फिर ऐसा व्यक्ति अपनी बुद्धि, योग्यता और क्षमताओं के द्वारा अपने क्षेत्र का पथप्रदर्शक हो जाता है। ऐसे दो व्यक्ति हमारे जहन में आ रहे हैं

– एक – ओशो और दूसरे अमिताभ बच्चन। इन दोनों महान व्यक्तियों की कुंडली के अष्टम भाव में यह राजयोग फल-फूल रहा है। अमिताभ बच्चन सहसत्राब्दि के हीरो हैं और ओशो स्वयं में युगपुरूष हैं। भारत की कुंडली के तृतीय भाव में यह योग बना हुआ है इसका सीधा सा अर्थ यह भी है कि भारत विश्व गुरू अवश्य बनेगा।

देश की वर्तमान राजनीति में धर्म का मुद्दा चाहे मंदिर बनवाने के नाम पर हो या मंदिर में दर्शन करने के नाम पर हो स्थितियां कुछ इस प्रकार से बनती हैं कि मानों धर्म तो कहीं पीछे छूट गया है और धार्मिक प्रपंच इतने गहरे हो जाते हैं जहां सोचना पड़ता है कि ये कैसा धार्मिक कार्य हुआ।

आज से लगभग 4000 साल पहले भारत में बहुत कम मंदिर हुआ करते थे लेकिन पूरे भारतवर्ष में ऐसा कोई स्थान नहीं था जहां शिवलिंग ना हों। इसका एक सीधा सा अर्थ यह भी हुआ कि वैदिक काल और उसके आसपास हम भारतीय निर्गुण और निराकार ईश्वर में ज्यादा आस्था रखते थे।

शिवलिंग की रचना कुछ इस प्रकार की है कि उसमें पूरा ब्रह्माण्ड ही समाया हुआ है। करीब 2500 साल पहले सगुण और साकार ईश्वर कल्पना के चलते विभिन्न देवी-देवताओं की मूर्तियों का प्रचलन प्रारम्भ हुआ। जब देश में बौद्धिज्म और उसके साथ ही जैनिज्म का विकास हुआ तब देवताओं की प्रतिभाओं का प्रचलन जोर पकड़ने लगा।

लेकिन इस दौर में बुद्ध और महावीर की प्रतिमाएं अधिक मिलती हैं। शनैः-शनैः स्थितियां बदली और पुनः हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां अस्तित्व में आने लगीं।

लगभग 1500 – 2000 वर्ष पूर्व दो प्रकार के मंदिर भारत में मिला करते थे। ज्योर्तिलिंगों का अपना एक महत्व है जो सदैव रहा है और इसी परंपरा में देवी की गुफाएं और मंदिर जो प्राचीन काल से अस्तित्व में हैं

उनका महत्व कभी नहीं घटा। पर्वत और नदियां सदैव से ही पूजनीय रही हैं और वहां पर समय-समय पर यज्ञ, पूजा, हवन, कुंभ आदि की व्यवस्था भी समय सारणी के हिसाब से चलती रहती थी। इसमें कुछ विशिष्ट मंदिर भी थे जहां कि गर्भ गृह में जाने के लिए भक्त को एक खास तरह कीप्रिपरेशन भी करना पड़ती थी।

जैसे कुछ मंदिर ऐसे थे जिनका जिक्र आजकल केरल में चल रहा है जहां 10 से 50 साल के भीतर की महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। कुछ ऐसे भी मंदिर थे जहां भक्त जब संतान की कामना से जाता था तो उसको संतान प्राप्त होती थी। विशिष्ट कार्यों के लिए विशिष्ट मंदिरों का निर्माण इस देश में हुआ था।

इसी परंपरा में अधिकतर मंदिर प्रत्येक गांव के बाहर हुआ करते थे और ये मंदिर जो बड़े महत्वपूर्ण और एनर्जी के सेंटर थे। गांव के लोग और जो लोग उस गांव में आते थे वो अपनी सुविधा के अनुसार मंदिर के दर्शन करते थे और वहां पर कई तरह की समस्याओं का समाधान भी होता था जो धार्मिक भी थी और सामाजिक भी। सुबह – शाम साधारणतः लोग इन मंदिरों के दर्शन भी करते थे और पूजा पाठ भी।

 

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लगभग 1000 – 1200 वर्ष पूर्व मंदिर घरों में बनने लगे थे और उनमें देवी-देवताओं की मूर्तियों को सुशोभित किया जाता था। मूर्ति निर्माण की कला भारत में बहुत पहले से विकसित हो चुकी थी। अगर आप किसी भी देवी-देवता की मूर्ति को गौर से देखें तो ये सारी मूर्तियां ना केवल संतुलित होती है बल्कि सीमेट्रीकल भी होती हैं।

मान लीजिए भगवान कृष्ण की खड़े हुए की मूर्ति आपके मंदिर में प्रतिष्ठित है। अगर आप सिर से पैर तक ठीक से अवलोकन करें तो कुछ चीजें आपके नोटिस में आएंगी जैसे मूर्ति के बाल सुन्दर और स्निग्ध मालूम पड़ेंगे।

अगर मूर्ति के सिर को तीन भागों में बांटे जिसमें पहला भाग माथा या भाल और दूसरा भाग जहां नेत्र, कान और आंख स्थित है और तीसरा मुंह का भाग, तो पूरा फेस सीमेट्रीकल होता था। सिर से लेकर गर्दन तक और सीने से लेकर कमर तक और कमर से लेकर पैरों तक के हिस्से सनुपात में बनाये जाते थे।

मूर्ति के हाथ और पैर अति सुन्दर होते हैं। ये सारी मूर्तियां शरीर के परफेक्शन को भी दर्शाती हैं। समुद्र शास्त्र की मान्यता है कि जब किसी व्यक्ति का शरीर पूरी तरह से संतुलित होता है तो ऐसे व्यक्ति को सुख-सुविधाओं की कमीं नहीं होती।

भगवान की मूर्तियों के साथ हमारी आस्था तो सनातन है और जब हम उन मूर्तियों के सामने सुबह-शाम बैठते, ध्यान करते थे, पूजा-पाठ करते थे तो उसमें ऐसा प्रयास रहता था कि मेरा शरीर भी प्रभु जैसा हो जाये और उनकी कृपा भी मुझ पर बनी रहें।

थोड़ा विषयांतर करते हुए देश की कुंडली और वर्तमान दशा की बात करना ठीक रहेगा। देश की कुंडली में सितम्बर 2015 से चन्द्रमा की 10 वर्षीय महादशा चल रही है जो सितम्बर 2025 में समाप्त होगी। चन्द्रमा तृतीय भाव में चार अन्य ग्रहों के साथ विराजमान है।

चन्द्रमा अहंकार और विचार दोनों का प्रतिनिधित्व करता है और अगर अहंकार ज्यादा हो जाये तो विचार गौण हो जाता है। अहंकार की समस्या यह है कि अहंकार रहित आदमी ढूंढना मुश्किल है और अहंकारी व्यक्ति अपने सिवाय दूसरे को महत्व नहीं देता।

देश की राजनीति कुछ इस प्रकार की हो गयी है कि एक राजनैतिक पार्टी दूसरी राजनैतिक पार्टी पर तंज नहीं कसती बल्कि छिछालेदर के मूड में रहती है और यह स्थिति हर पार्टी की है। प्रत्येक पार्टी सामने वाले से स्वयं को महान बताती है और सामने वाले को हर तरह से रददी सिद्ध करती है।

हम लोग यानि जन साधारण या तो अहंकार से पीड़ित या दूसरे के अहंकारों को झेलकर पीड़ित हैं। वैदिक काल से अब तक महान खोजों में से एक खोज संवाद की भी है और अब संवाद देखने को नहीं मिलता और अगर हम बदले नहीं तो 2025 तक क्या होगा श्रीराम ही बता सकते हैं।

10 अगस्त 2018 से 10 दिसम्बर 2019 तक चन्द्रमा की महादशा में बृहस्पति की अंतर्दशा चल रही है। चन्द्रमा कुंडली में तृतीय भाव में है और बृहस्पति छटे भाव में। भारतवर्ष की कुडली में बृहस्पति अत्यधिक कमजोर है।

जहां चन्द्रमा अहंकार को पौषित करता है वहीं कमजोर बृहस्पति धार्मिक उन्माद देता है। 10 अगस्त के बाद देश में मंदिर – मस्जिद को लेकर और इस मुद्दे पर विभिन्न धर्मों के विचार को लेकर जिस तरह का माहौल बना हुआ है इसमें अभी उन्माद आना बाकी है।

प्राचीन काल में धर्म और राजनीति एक हुआ करते थे लेकिन वर्तमान युग में राजनीति और धर्म दो अलग इकाई बन गये हैं। हमारी समझ से सारे विवाद का बीजारोपण इसी पाॅइंट से होता है। मंदिर तो बनना ही चाहिए और वहीं बनना चाहिए जहां के निमित्त है।

ये तो कोई ईसू नहीं है लेकिन ये सबसे बड़ा ईसू बनता जा रहा है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि धर्म तो प्रत्येक मनुष्य का स्वभाव है और वर्तमान माहौल ने धर्म और मनुष्य को अलग कर दिया। एक साधारण से उदाहरण से समझे कि एक गिलास पानी और व्यक्ति दो अलग चीजें नहीं हैं।

ऐसा आभास तो हो सकता है और जैसे ही व्यक्ति उस पानी को पिएगा तो पानी उसमें आत्मसात हो जायेगा। ठीक इसी प्रकार से धर्म और राजनीति अलग नहीं है। लेकिन अब देखने का नजरिया अलग हो गया है।

हम तो भारत के लोगों को साधारण हिंदू जानते थे लेकिन अब कहीं सोफ्ट हिंदू है, कहीं हार्ड हिंदू है। ऐसा लगता है कि जैसे हमसब कंफ्यूजन के दौर से गुजर रहे हैं और इसके लिए हम किसी को दोष भी नहीं दे सकते क्योंकि दोष तो हम सबका है।

वर्तमान में अगस्त 2018 से दिसम्बर 2019 तक चन्द्र – बृहस्पति की दशा चलने वाली है और जो आने वाले दिनों में जोर भी पकडेगी। जैसा कि कहा गया है कि ये पीरियड धार्मिक उन्माद को चरम पर ले जा सकता है।

 

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इसी बीच पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने करतारपुर काॅरिडोर जो महान संत बाबा नानक से संबंध रखता है को भी खोल दिया है। यह तो एक उत्तम कदम है लेकिन अगर इसमें भी सियासत है तो यह स्थिति भी आगे चलकर पीड़ादायक हो सकती है।

देश का संविधान तो हमें सेकुलर मानता है और ये व्यवस्था कुल मिलाकर 1950 से लेकर अब तक बढ़िया चल भी रही है। अब तीन स्थितियां बन चुकी हैं। एक सरकार, दूसरा धर्म और तीसरा संविधान।

आकाश या ग्रह कभी अन्याय नहीं करते लेकिन अक्सर देखा गया है कि जब भी कभी व्यक्ति, समूह, देश अहंकार से ग्रसित होकर विवेक को तिलांजलि दे देते हैं और विचार शून्य हो जाते हैं तब ग्रह भी अपनी चाल बदलकर मनुष्य की चाल को सही रास्ते पर आने के लिए मजबूर कर देते हैं </>

और फिर विजय आकाश की होती है और आदमी थका-हारा दयनीय अवस्था से लम्बे समय तक निकल नहीं पाता है। अगर हम नहीं जागे तो फिर सोतह हुई कौम न हो जायें।

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