भारतीय संस्कृति में पंचांग एवं मुहूर्त किस तरह उपयोगी है – आइये जाने

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव:

भारतीय संस्कृति में पंचांग, मुहूर्त का बहुत महत्व है। जो हमें किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने से पहले बहुत सारी सावधानियां बरतने की सलाह भी देता है। मुहूर्त के अन्तर्गत कुछ विशेष प्रकार की सावधानियों का जिक्र किया गया है, जिसके अनुसार रिक्ता तिथियों यानी चतुर्थी, नवमी एवं चतुदर्शी के दिन रोजगार सम्बन्धी कोई भी नया काम नहीं शुरू करना चाहिए। शुभ एवं मांगलिक कार्य अमावस्या तिथि में शुरू नहीं करने चाहिए। रविवार, मंगलवार एवं शनिवार के दिन समझौता एवं सन्धि नहीं करनी चाहिए। दिन, तिथि व नक्षत्र का योग जिस दिन 13 आये उस दिन उत्सव का आयोजन नहीं करना चाहिए।

समय अथवा काल से अभिप्राय

काल अर्थात् समय प्रारब्ध का जनक है। समय ही प्रारब्ध के फलों का भी जनक है। जब भी कोई जीव प्रारंभ होता है तो समय के गर्भ में, उस जीव के निश्चित, अंत से पूर्व, घटने वाली शुभ तथा अशुभ उन घटनाओं की सूचना होती है जिनका सामना उस जीव को अपने जीवन काल में करना पड़ता है।

जीव की उत्पति के समय अथवा जन्म लेने के समय अथवा जन्म लेने के समय पर व्यक्ति का कोई नियंत्रण नहीं है। इसी प्रकार व्यक्ति को अपने जीवन काल में शुभ और अशुभ घटनाओं का सामना इसलिए करना पड़ता है क्यांकि उसका जीवन एक समय विशेष में प्रारंभ होता है जो कि उसके नियंत्रण में नहीं है।

जीवन प्रारंभ होने के समय के अनुसार ही, किसी भी कार्य के प्रारंभ होने के समय में भी उस कार्य के लिए शुभाशुभ संभावनाएं होंगी। मुहूर्त का अध्ययन प्रारंभ करने के उस समय विशेष का ही अध्ययन है। मुहूर्त का अध्ययन करने से पूर्व हमें समय के बारे में जान लेना होगा जो वराह मिहिर के अनुसार इस प्रकार है।

मुहूर्त के अध्ययन के लिए, सौर, सावन, नक्षत्र, चंद्र मान को तथा अधिक मास, क्षय मास को जानना भी अनिवार्य है। एक राशि में 30 अंश हैं। जितने समय में सूर्य 1 अंश भोगता है, वह सौर दिन, 30 सौर दिनों का एक सौर मास होता है। ऐसे ही 12 सौर दिनों का एक और मास होता है। ऐसे ही 12 सौर मासों या सूर्य के 12 राशि भोग काल को सौर वर्ष कहते हैं।

किसी भी तारे या नक्षत्र के एक बार उदय से लेकर अगले उदय तक की अवधि सावन दिन होती है। जैसे एक सूर्योदय से अगले सूर्योदय के समय तक का मान 1 सौर सावन दिन कहलाता है।

यही अहोरात्र मान 60 घड़ी या 24 घंटे सावन दिन ही है। जितने समय में चंद्रमा एक नक्षत्र भोगता है, वह नाक्षत्र दिन है। सूंपर्ण नक्षत्र चक्र (27 नक्षत्र) का भोगकाल नाक्षत्र मास, 12 नाक्षत्र मासों का 1 नाक्षत्र वर्ष होता है। नाक्षत्र मास 27 दिन 7 घंटे 43 मिनट 12 सेकेंड के लगभग होता है।

सूर्य से चन्द्रमा का 12 अंश का अंतर एक तिथि निर्माण करता है। प्रतिपदा, द्वितीया आदि 1 तिथि एक चंद्र दिन होता है। 30 तिथियों का चंद्र मास व 12 चंद्र मासों का एक चंद्र वर्ष होता है। सौर मासों व चंद्र मासों के अंतर से अधिक मास होता है।

एक सौर वर्ष में 12 सौर मास या 365.25875 मध्यम सावन दिन होते हैं। लेकिन 12 चंद्र मास का मान 354.36705 मध्यम सावन दिन होता है। इसीलिए 12 चंद्र मासों वाला वर्ष सौर वर्ष की अपेक्षा 10.89170 मध्यम सावन दिन छोटा होता है। इसीलिए 33 महीनों के भीतर यह अंतर 1 चंद्र मास के बराबर हो जाने पर उस सौर वर्ष में 13 चंद्र मास होते हैं।

इस मास को ही अधिक मास, मलमास या पुरुषोŸाम मास कहते हैं। सरल शब्दों में कहें तो जिस शुक्लादि चंद्र मास में सूर्य की संक्रांति न हो तो वह अधिक मास तथा 1 चंद्र मास में दो बार सूर्य संक्रांति हो जाए तो क्षय मास होता है। क्षय मास कार्तिक, मार्गशीर्ष या पौष में ही होता है। जिस वर्ष 1 क्षय मास हो उस वर्ष में दो अधिक मास होते हैं।

वर्ष को सवंत्सर के नाम से जाना जाता है

वर्ष को सवंत्सर के नाम से जाना जाता है। सवंत्सर की गणना बृहस्पति के मध्यमान से होती है अर्थात् गुरु जितने समय में एक राशि को पार करता है उस अवधि को संवत्सर कहते हैं। बृहस्पति मान के अनुसार 60 संवत्सर होते हैं जिनको अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इन संवत्सरों के नाम तथा उनके स्वामियों के नाम इस प्रकार हैं।

संवत्सरों के नाम और स्वामी

संवत्सर स्वामी संवत्सर स्वामी संवत्सर स्वामी संवत्सर स्वामी
प्रभव ब्रह्मा चित्रभानु बुध हमेलम्बी राहु परिधावी मंगल
विभव विष्णु सुभानु गुरु विलंबी सूर्य प्रमादी बुध
शुक्ल शिव तारण शुक्र विकारी चंद्र आनंद गुरु
प्रमोद सूर्य पार्थिव शनि शार्बरी मंगल राक्षस शुक्र
प्रजापति चंद्र व्यय राहु प्लव बुध नल शनि
अंगिरा मंगल सर्वजत ब्रह्मा शुभकृत गुरु पिंगल राहु
श्रीमुख बुध सर्वधारी विष्णु शोभन शुक्र कालयुक्त केतु
भाव गुरु विरोधी शिव क्रोधी शनि सिद्धार्थी सूर्य
युवा शुक्र विकृति सूर्य विश्वावसु राहु रौद्र चंद्र
धाता शनि खर चंद्र पराभव केतु दुर्मति मंगल
ईश्वर राहु नंदन मंगल प्लवंग ब्रह्मा दुन्दुभि बुध
बहुधान्या केतु विजय बुध कीलक विष्णु रुधिरोद्गारी गुरु
प्रमाथी सूर्य जय गुरु सौम्य शिव रक्ताक्ष शुक्र
विक्रम चंद्र मन्मथ शुक्र साधारण सूर्य क्रोधन शनि
वृष मंगल दुर्मुख शनि विरोधकृत चंद्र क्षय राहु

एक राशि भोगने में गुरु को 361.0267 सावन दिन लगते हैं।

मुहूर्त से क्या समझे

मुहूर्त का उल्लेख हमें वैदिक काल से ही मिलता है। वेद यज्ञ के सम्पादन के लिए है और यज्ञ का विधान विशिष्ट समय सापेक्ष है। जो व्यक्ति ज्योतिष को भली-भांति जानता है अर्थात् यज्ञ के समय का निर्धारण करता है वही यज्ञ का भी यथार्थ ज्ञाता है। यज्ञों का समय निर्धारण करने के लिए ही वेदांग ज्योतिष की रचना हुई है।

इस प्रकार वैदिक काल से ही मुहूर्त का प्रादुर्भाव देखने को मिलता है यद्यपि मुहूर्त का प्रचलन काल गणना के साथ ही शुरु हुआ होगा ऐसा मानना चाहिए। मास में तीस दिवस की भांति अहोरात्र में तीस मुहूर्त माने जाते थे, जिसका संकेत अथर्ववेद में ‘त्रिंशद धामा’ शब्द से किया है।

आचार्य सायण ने भी इस मंत्र की व्याख्या करते हुए इसका यही अर्थ किया है। ज्योतिष के संहिता अंग में मुहूर्त का विवेचन है। मुहूर्त समय की गणना का एक मान है। जब दिन-रात बराबर होते हैं अर्थात् 30 घटी (12 घंटे) का दिन तथा 30 घटी की रात होती है तो यह दो घटी (48 मिनट) का होता है।

दिन-रात बड़े-छोटे होने पर मुहूर्त भी बड़े छोटे होते हैं, दिन में तथा रात्रि में पंद्रह-पंद्रह मुहूर्त होते हैं। दिन को स्थानीय दिनमान से तथा रात्रि को स्थानीय रात्रिमान से जानना चाहिए। श्रीपति के अनुसार –

दिन के पंद्रह मुहूर्त

रौद्र, सार्प, मैत्र, पित्र्य, वासव, आप्य, वैश्वदेव, ब्राह्मा, प्राजापत्य, इंद्र, इन्द्राग्नि, निऋर्ति, वारुण, अर्यमा तथा भग।

रात्रि के पंद्रह मुहूर्त

अजैकपात, अहिर्बुध्न्य, पूष, अश्वी, यम, देवता, आग्नेय, प्रजापत्य, सौम्य, आदित्य, वार्हस्पत्य, वैष्णव, सावित्र, त्वाष्ट्र तथा वायव्य। रात्रि और दिन दोनों के मुहूर्तोंर्ं में आठवां मुहूर्त विशेष शुभ होता है, इसी आधार पर पं. हरदेव जी व पं. सूर्य नारायण व्यास ने भारत की स्वतंत्रता का समय दिन विशेष शुभ न होने पर भी रात्रि का आठवां मुहूर्त जो स्थिर लग्न में था को चुना था। मुहूर्तों का लोक व्यवहार से अत्यंत निकट संबंध है, विवाह आदि संस्कार तो मुहूर्तों के बिना होते ही नहीं। गृहारंभ, गृह प्रवेश, बुआई, कटाई सोलह संस्कार, यात्रा आदि अनेक कार्य बिना मुहूर्त नहीं होते। वैदिक धर्मी ही नहीं लिंगायत, जैन, पारसी और मुसलमानों के भी कुछ कार्य मुहूर्तानुसार होते हैं। हमें थोड़ा सा ज्योतिष का ज्ञान होने के बाद क्रमशः उसमें वृद्धि होने का और आजतक उसका अस्तित्व रहने का एक मुख्य कारण मुहूर्तों की आवश्यकता भी है।

मिहिराचार्य ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि कालज्ञानानुसार (मुहूर्त) कार्य करने पर निश्चय ही पूर्ण सफलता और सिद्धि प्राप्त होती है। यथार्थ रूप से मुहूर्त का अभिप्राय समय के उस क्षण विशेष से है, जो क्षण ग्रहों की स्थिति प्रभावानुसार किसी भी कार्य, प्रक्रिया अथवा जीवन के प्रारंभ होने के लिए कुछ संभावनाएं रखता है।

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री
8178677715, 9811598848

ज्योतिष आचार्या रेखाकल्पदेव पिछले 15 वर्षों से सटीक ज्योतिषीय फलादेश और घटना काल निर्धारण करने में महारत रखती है। कई प्रसिद्ध वेबसाईटस के लिए रेखा ज्योतिष परामर्श कार्य कर चुकी हैं।

आचार्या रेखा एक बेहतरीन लेखिका भी हैं। इनके लिखे लेख कई बड़ी वेबसाईट, ई पत्रिकाओं और विश्व की सबसे चर्चित ज्योतिषीय पत्रिकाओं में शोधारित लेख एवं भविष्यकथन के कॉलम नियमित रुप से प्रकाशित होते रहते हैं।

जीवन की स्थिति, आय, करियर, नौकरी, प्रेम जीवन, वैवाहिक जीवन, व्यापार, विदेशी यात्रा, ऋणऔर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, धन, बच्चे, शिक्षा,विवाह, कानूनी विवाद, धार्मिक मान्यताओं और सर्जरी सहित जीवन के विभिन्न पहलुओं को फलादेश के माध्यम से हल करने में विशेषज्ञता रखती हैं।

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