ज्योतिष

जन्मपत्री के ग्रहों से जाने आपकी कितनी संतान हो सकती हैं

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री 8178677715

पंचम भाव पुण्य कर्मों का भाव हैं। इस भाव से बुद्धि, संतान, पूर्व कर्म, लगाव, स्नेह, आत्मन, संचित कर्म, धार्मिक भजन, आध्यात्मिक स्वभाव, कलात्मक गुण, मनोरंजन, प्रेम, रोमांस, रंगमंच आदि की व्याख्या करता है।

पंचम भाव से ही व्यक्ति के नैतिक मूल्य, पुण्य एवं पाप आदि का विचार किया जाता है। पंचम भाव दशम भाव से आठवां भाव होने के कारण यह पद प्रतिष्ठा में बाधाओं और दिक्कतों का भाव है।

पंचम भाव उच्च शिक्षा, लेखन, पठन-पाठन, कौशल, शेयर बाजार आदि का विचार किया जाता है। यह भाव बुद्धिमता, विपरीत लिंग से चुंबकीय आकर्षण को दर्शाता है। संवेदनाओं की अस्थिरता भी इसी भाव से जानी जाती है।

व्यक्ति की वास्तविक प्रसन्नता का भाव है। त्रिकोण भाव है और नवम से नवम होने के कारण पूर्व पुण्य भाव है। जातक की ग्रहण शक्ति पंचम से जानी जा सकती है। संतान से संबंधित सभी विषयों का विचार पंचम भाव से किया जाता है। ग्यान अर्जित करने का शक्ति, सामर्थ्य और रुचि इसी भाव से देखी जाती है।

नवम से नवम भाव होने के कारण भाग्योदय के लिए की जाने वाले तीर्थयात्राएं इसी भाव से देखी जाती है। यात्राओं का मुख्य उद्देश्य नवम भाव से जाना जा सकता है। नवम भाव धार्मिक क्रियाओं का भाव है और नवम से नवम होने के कारण इस भाव से जातक के इष्ट देव का विचार किया जाता है।

इस भाव से सबसे प्रिय व्यक्ति अर्थात प्रियतम, या प्रियतमा की जानकारी ली जा सकती है। प्रेम, प्रेम-विवाह आदि इसी भाव से जाने जाते हैं। यह तो थी पंचम भाव से जानी जाने वाली विषयों की बातें। आईये अब बात करते है, संतान भाव की। पंचम भाव संतान भाव भी है, और संतान की स्थिति का विचार पंचम भाव से किया जाता है।

कुंडली देखकर यदि कोई आपकी संतान की संख्या बता दें तो निश्चित रुप से आप चकित हो जायेंगे। ज्योतिष विद्या की यह सबसे बड़ी कसौटी और उसके वैग्यानिक होने का प्रमाण है कि जन्मपत्री विश्लेषण आपकी संतान के विषय में पूर्ण जानकारी दे सकता है।

कहने में जितना सरल है, यह कर दिखाना उतना ही कठिन है। हां यह मुश्किल कार्य है, फिर भी इसे असंभव नहीं कहा जा सकता है। वैदिक ज्योतिष ग्रंथ, शास्त्र और विद्या इस विषय में हमारे लिए काफी हद तक उपयोगी साबित हो सकती है। शास्त्रों में ऐसे कुछ सूत्र दिए गए है जिनका प्रयोग कर संतान संख्या का आंकलन कुंडली से किया जा सकता हैं-

• जन्मपत्री में लग्न भाव से पंचम भाव में गुरु स्थित हो और गुरु से पंचम भाव में शनि एवं शनि से पंचम भाव में राहु हो तो जातक को एक पुत्र संतान होती है।

• पंचमेश जिस नवांश में हो, उस नवांश का स्वामी स्वराशि के नवांश में हो तब भी व्यक्ति को एक ही पुत्र संतान होती है।

• पंचम भाव पर जितने ग्रहों का दॄष्टि प्रभाव हों, उतनी संतान प्राप्ति के योग बनते है।

• पंचमेश का उच्चस्थ होकर केंद्र या त्रिकोण में होना, अधिक संतान होने का सूचक है।

• पंचमेश और गुरु एक साथ पंचम भाव में हो तो व्यक्ति को अनेक संतान होने के योग बनते है।

• पंचम भाव में जितने ग्रह स्थित होते हैं, उसी संख्या में संतान होने की संभावनाएं बनती है।

• पंचम भाव को स्त्री लिंग जितनी संख्या में देखें, उस संख्या में स्त्री संतान और पुरुष ग्रह जिस संख्या में देखें उस संख्या में पुरुष संतान होने के योग बनते है।

• एक अन्य ज्योतिषीय योग के अनुसार पंचमेश जिस संख्या की राशि में हो, उस संख्या में संतान होने के योग बनते है।

आज के आधुनिक समय में उपरोक्त योगों में से कुछ ज्योतिषीय योग फलभूत होने संभव नहीं है। आज संतान संख्या एक या दो तक ही सीमित रह गई है।

कुछ अन्य ज्योतिषीय योग संतान संख्या के बारे में निम्न विचार रखते हैं-

• गुरु ग्रह को संतान कारक कहा गया है। अष्टक वर्ग में गुरु ग्रह से पंचम भाव में जितने शुभ बिन्दुं होंगे उतनी ही संख्या होने के योग बनते है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि शत्रु या नीचस्थ ग्रहों के बिंदुओं को इसमें से घटा दिया जाएगा। इस प्रकार शेष

• संख्या ही संतान संख्या होगी।

• जन्मपत्री में यदि शनि, मंगल और बुध उच्चस्थ हो तो व्यक्ति की संतान की संख्या करीब ५ हो सकती है।

• पंचम भाव को जितने ग्रह देखते हो, उसी संख्या में संतान होने के योग बनते है।

ग्रह संतान संबंध में क्या कहते हैं, आईये देखें-

• सूर्य- तेजयुक्त पुत्र संतान

• चंद्र – कन्या संतान

• मंगल – तीन पुत्र संतान या फिर तीसरे भाव में स्थित हो तो तीन भाई

• बुध – दो कन्या संतान।

• गुरु – पांच पुत्र संतान

• शुक्र – कन्या संतान

• शनि – कन्या संतान

• राहु – पुत्र संतान (गर्भपात कराने वाला ग्रह)

• केतु – संतान नष्ट करने का कार्य करता है।

सूर्य, गुरु और मंगल का पंचम, पंचमेश से संबंध पुत्र संतान के योग बनाता है। इसी प्रकार पुरुष राशियां-पुरुष संतान और स्त्री राशियां स्त्री संतान देने की क्षमता रखती है। पुरुष राशियां इस प्रकार हैं-१,३,५,७,९ और ११। स्त्री राशियां-सभी सम राशियां स्त्री राशियां है। २, ५,६,८ वीं राशियां कम संतान देने वाली राशियां है।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार यदि पंचमेश सूर्य पंचम भाव में हो या पंचम भाव को देखता हो तो एक पुत्र संतान देता है।

• कर्क लग्न में पंचमेश मंगल सप्तम भाव में स्थित हो तो व्यक्ति के दो पुत्र होते हैं।

• लग्न के तीसरे भाव में सुस्थित गुरु पांच पुत्र देता है।

• पराक्रम भाव में बुध की स्थिति व्यक्ति के एक पुत्र और दो कन्याएं होती है अथवा दो पुत्र और एक कन्या होती है।

• पंचम भाव में सूर्य स्थित हो और उसे गुरु देखता हो तो व्यक्ति के तीन पुत्र होते हैं।

• पंचम भाव में शनि-मंगल की युति कन्या लग्न में होने पर तीन पुत्र होते है।

• तुला लग्न में कुम्भ राशि में शनि की स्थिति व्यक्ति को पांच पुत्र संतान होने के योग बनाती है।

• संतान भाव में सूर्य-गुरु की स्थिति व्यक्ति को पांच पुत्र देती है।

• पंचमेश और धनेश की युति पंचम भाव में व्यक्ति को दो से अधिक पुत्र देती है।

आज परिवार नियोजन के समय में दो से अधिक संतान का होना, तर्कसंगत नहीं है। इसलिए उपरोक्त योगों को देश-काल-पात्र परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही योगों का फल समझना चाहिए।

मीन लग्न में पंचम भाव में गुरु की स्थिति देरी से संतान देता है। यहां गुरु विद्या या संतान दोनों में से केवल एक देता है। इस स्थिति में जातक या तो अच्छी शिक्षा ग्रहण करता है, अन्यथा उसकी संतान होती है।

पंचम भाव में स्थिति शनि को गुरु देखता हो तो प्रथम पुत्र और द्वितीय कन्या संतान होती है, परन्तु व्यक्ति के एक से अधिक जीवन साथी होते हैं। गुरु और मंगल एक साथ हो तो संतान प्राप्ति संभव परन्तु यदि मंगल गुरु को देखे तो संतान में विलम्ब होता है। राहु पंचम भाव में सम राशियों में हो तो कन्या संतान देता है।

आईये अब कुछ कुंडलियों का अध्ययन करते हैं-
22 जनवरी 1943, 09:33 प्रात:, स्थान – आगरा

कुम्भ लग्न की कुंडली है। लग्न में केतु, चतुर्थ में शनि, पंचम में गुरु, छ्ठे भाव में चंद्र, सप्तम भाव में राहु, एकादश भाव में मंगल, और द्वादश भाव में शुक्र, बुध और सूर्य स्थित है।

पंचम भाव – पंचम भाव में कारक ग्रह गुरु वक्री अवस्था में स्थित है। मंगल पराक्रम भाव और दशम भाव के स्वामी होकर दशम से अपनी अष्टम दॄष्टि से पंचम भाव को सक्रिय कर रहे हैं। और केतु लग्न भाव में स्थित हो, अपनी पंचम दृष्टि से संतान भाव को प्रभावित कर रहे हैं। इस प्रकार यहां पंचम भाव पर तीन ग्रहों का प्रभाव आ रहा है। संतान कारक का वक्री अवस्था में संतान भाव में होना, संतान में देरी और परेशानियों का कारण बनता है।

पंचमेश – पंचमेश बुध हैं और व्यय भाव में चले गए है। सूर्य और शुक्र के साथ युति में होने के कारण ग्रह युद्ध में है। और पीड़ित अवस्था में है।

कारक ग्रह – कारक ग्रह यहां गुरु ग्रह हैं, एवं पंचम भाव में ही स्थित है। जिसके विषय में ऊपर बताया जा चुका है।

पंचम भाव पर व्रकी गुरु, मंगल और केतु के प्रभाव ने इन्हें प्रथम पुत्र संतान दी और पंचमेश बुध के होने और शुक्र के साथ अंशों में निकटतम होने के फलस्वरुप इनकी दूसरी संतान कन्या संतान रहीं। संतान प्रथम तो विलंब से हुई, परन्तु वह स्वस्थ नहीं रही। पंचम, पंचमेश और कारक ग्रह के पीड़ित होने के कारण इनकी संतान का स्वास्थ्य बहुत ही खराब रहा और अंत में पुत्र संतान की असमय मृत्यु हो गई।

26 सितम्बर, 1932, 14:00, झेलम, पाकिस्तान

धनु लग्न और कर्क राशि की कुंडली में शनि दूसरे भाव में स्थित है, राहु पराक्रम भाव में, चंद्र, शुक्र और मंगल अष्टम भाव, नवम भाव में केतु और गुरु, दशम भाव में बुध और सूर्य स्थित है। इस कुंडली में पंचम भाव को गुरु और केतु दृष्टि दे रहे हैं।

पंचमेश मंगल दो स्त्री ग्रहों के साथ अष्टम भाव में चंद्र और शुक्र के साथ है। पंचमेश मंगल पर स्वराशि के शनि की सप्तम दॄष्टि है। पंचमेश का स्त्री ग्रहों के प्रभाव में होना और शनि से दॄष्ट होने ने इन्हें तीन पुत्री संतान दी।

संतान कारक ग्रह गुरु भी शुक्र के नक्षत्र में हैं और शुक्र स्वयं स्त्री कारक ग्रह है। केतु भी शुक्र (स्त्री कारक) के नक्षत्र में है, जिन भी ग्रहों का प्रभाव पंचम, पंचमेश और कारक ग्रह पर आ रहा हैं, सभी स्त्री कारक ग्रह है या नक्षत्र स्वामी स्त्री ग्रह है।

04 जुलाई 1898, 00:30, सियालकोट, पाकिस्तान

यह कुंडली मेष लग्न और धनु राशि की है। राशिश चंद्र भाग्य भाव में राहु के साथ है। पंचम भाव को शनि की दशम दॄष्टि, राहु की नवम दॄष्टि प्राप्त हो रही है। पंचमेश सूर्य पराक्रम भाव में केतु और बुध के साथ है। जिन्हें चंद्र और राहु का प्रभाव प्राप्त हो रहा है।

पंचमेश सूर्य पुरुष कारक ग्रह हैं। केतु की युति और राहु की दॄष्टि में हैं, इन ग्रहों के प्रभाव ने इन्हें दो पुत्र संतान दी और चंद्र व बुध के प्रभाव ने इन्हें एक पुत्री संतान दी। संतान कारक ग्रह गुरु इनकी कुंडली में रोग भाव में हैं और पंचम, पंचमेश किसी भी ग्रह को प्रभावित नहीं कर रहे हैं। तथा अन्य कोई भी ग्रह गुरु को प्रभावित नहीं कर रहा है।

19 नवम्बर 1917, 23:11, इलाहबाद, उत्तर प्रदेश

कर्क लग्न और मकर राशि की इस कुंडली के पंचम भाव में बुध और सूर्य स्थित है। पंचम भाव पर पंचमेश मंगल की चतुर्थ दॄष्टि और संतान कारक गुरु की सप्तम दॄष्टि आ रही है। पंचम भाव को दो पुरुष ग्रह और एक स्त्री ग्रह का प्रभाव है।

पंचमेश मंगल पर राहु का प्रभाव और कारक गुरु का संतान भाव पर प्रभाव है। इस प्रकार संतान भाव, भावेश और कारक से पुरुष कारक ग्रहों का प्रभाव अधिक होने से इन्हें दो पुत्र संतान की प्राप्ति हुई।

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