उपाय कितने दिन करने चाहिए? मनोकामना पूर्ति कब होगी?

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव

उपाय की अवधि

अधिकतर उपायों की अवधि 40 दिन की होती है प्रत्येक प्रकार की पूजा 40 से 43 दिन में शुभ परिणाम देना शुरु कर देती है। इसलिए धार्मिक कृत्यों को लगातार 43 दिनों तक किए जाने की परम्परा है और यदि समस्या अधिक गंभीर हो तो इन कर्म कांडों का एक सुविधा जनक अंतराल के बाद पुनरावर्तन किया जाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि रत्न, रुद्राक्ष व अन्य अमूल्य ताबीज 43 दिन के बाद अपना शुभ परिणाम देते हैं। इन 43 दिनों के दौरान इस विशेष ताबीज, यंत्र, रुद्राक्ष या रत्न से जुड़ी पूजा व मंत्र का नियमित रूप से अनुष्ठान होते रहना चाहिए।

ग्रहों से संबंधित उपाय

ग्रहों की शांति के लिए व शुभ फल की प्राप्ति के लिए ग्रहों से संबंधित दान किया जाता है। यज्ञ, रत्न व रुद्राक्ष धारण करके भी ग्रहों के अशुभ प्रभाव को कम कर शुभ प्रभाव प्राप्त कर सकते हैं। विशेष रूप से ग्रहों से संबंधित देवी-देवताओं की पूजा, मंत्र जाप एक निश्चित संख्या में करके अनुकूल परिणाम प्राप्त होते हैं। यदि किसी जन्म पत्रिका में भाग्येश कमजोर हो तो उससे संबंधित रत्न, रुद्राक्ष, मंत्र जाप या देवी-देवता के पूजन आदि से भाग्य को प्रबल किया जा सकता है। ग्रहों की अत्यधिक शुभता प्राप्त करने के लिए भी यह उपाय किए जा सकते हैं।

विशेष समय हेतु उपाय

जब किसी व्यक्ति को दशा-अंतर्दशा गोचर या जन्मपत्रिका में अशुभ ग्रह शनि, मंगल, राहु से परेशानी हो रही हो या शनि की ढैय्या साढ़ेसाती का समय हो तो उस समय ग्रह की अनुकूलता के लिए उपाय के रूप में यज्ञ, मंत्र, जप, स्तोत्र, रत्न, रुद्राक्ष और व्रत करके अशुभ समय के कुप्रभाव को कम किया जा सकता है।

मनोकामना पूर्ति उपाय

विभिन्न इच्छाओं की पूर्ति के लिए शास्त्रों में विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान, यज्ञ, मंत्र जप, स्तुति पाठ व व्रत आदि का विधान बताया गया है। प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में चारों पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की सिद्धि तथा स्वास्थ्य लाभ, धन, ज्ञान, यश व मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए शास्त्रोक्त यज्ञ, मंत्र जप या व्रत आदि यथाशक्ति कर सकता है। इस पुस्तक में सभी महत्वपूर्ण मंत्रों, यत्रों, व्रतों विभिन्न देवताओं के फलश्रुति सहित पाठ तथा अन्य शास्त्र सम्मत् उपाय सामग्री का प्रभाव सहित वर्णन किया गया है। अर्घ्य मनोकामना पूरी करने के लिए देवताओं को अघ्र्य अर्पित किया जाता है। यह प्रक्रिया सभी पूजा पद्धतियों का अभिन्न अंग है। जल ईश्वर को अत्यंत प्रिय है। इसलिए इसकी महिमा का वर्णन श्री मद्भगवद्गी ता में भी मिलता है।

दान

दान पूजा का एक महत्वपूर्ण अंग है पूजा के अन्य दो मुख्य अंग हैं जप व तप। श्रीमद्भगवद्गीता में पूजा के तीन अंग बताए गये हैं। ये तीन अंग हैं जप, तप और दान। दान के बिना जप व तप आदि क्रियाएं फलीभूत नहीं हो पातीं। इसलिए मनीषियों ने दान को भी नित्य क्रियाओं में शामिल किया। प्रातःकालीन सूर्य को अघ्र्य दान करना संध्या का अभिन्न अंग माना जाता है। कुंडली में जो ग्रह अनिष्टकारक होते हैं. उनसे संबंधित वस्तुओं का दान करने से कष्टों व अनिष्टों से अवश्य ही छुटकारा मिल जाता है।

Back to top button