सरकार कितनी बार पलटेगी सुप्रीम कोर्ट का फैसला

- अनिल विभाकर

शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने की जो गलती उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने की थी वैसी ही संवैधनिक धोखाधड़ी इस समय की नरेंद्र मोदी सरकार ने की है. मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अनुसूचित जाति-जनजाति के विद्रोह से घबरा कर सर्वोच्च अदालत के उस फैसले को संसद में कानून पास कराकर पलट दिया जिसमें एससी-एसटी उत्पीड़न का एफआईआर दर्ज होते ही बिना कोई सबूत और छानबीन के गैर दलितों की अविलंब गिरफ्तारी पर अदालत ने रोक लगाई गई थी. सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह गिरफ्तारी को मानवाधिकार और मौलिक अधिकार के खिलाफ बताया था. राजीव गांधी ने एक धर्मविशेष का अपना वोट बैंक बचाए रखने के लिए ही शाहबानो को गुजारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संसद में संविधान संशोधन किया था. इस समय नरेंद्र मोदी सरकार ने भी अनुसूचित जाति और जनजाति का वोट बचाए रखने के लिए ही संसद के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटा.

ऐसा करके दोनों ने एक तरह से संवैधानिक धोखाधड़ी की. संख्याबल की यह राजनीति लोकतंत्र की पवित्र भावना के खिलाफ है. संसद के पास कानून बनाने और संविधान संशोधन का अधिकार जरूर है मगर भारतीय संविधान किसी भी नागरिक के मौलिक अधिकार को खत्म करने और मानवाधिकार हनन का कानून बनाने का अधिकार संसद को कतई नहीं देता. मामला फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. सरकार जब भी अपने अधिकार का ऐसा दुरुपयोग करेगी , मामला सुप्रीम कोर्ट जाएगा ही. आखिर अपने राजनीतिक हित के लिए कोई सरकार सुप्रीम कोर्ट का फैसला कितनी बार पलटेगी?
सुप्रीम कोर्ट में पृथ्वीराज चौहान और प्रिया चौहान ने इसी 21 अगस्त को जनहित याचिका दायर कर मोदी सरकार द्वारा एससी-एसटी अत्याचार कानून में एफआईआर और तुरंत गिरफ्तारी बहाल करने वाले संशोधित कानून को चुनौती दी है. दोनों ने इसे रद्द करने और इसके अमल पर अविलंब रोक लगाने की मांग की है.याचिका में कहा गया है कि बेकसूरों को बचाने वाले सुप्रीकोर्ट के विस्तृत और तर्कसंगत फैसले के खिलाफ सरकार ने विपक्षी दलों के दबाव में और एक वर्ग को खुश करने के लिए पुनर्विचार याचिका दायर की थी.याचिका लंबित रहने के दौरान ही चुनावों को देखते हुए एसटी-एससी वर्ग को खुश करने के लिए सरकार ने कानून में संशोधन कर दिया.यह कानून जीवन के अधिकार का भी हनन करता है.याचिका में कहा गया है कि देश की आजादी के बाद सरकार सभी के लिए कानून में समानता लाने में नाकाम रही.सरकार ने अपनी गलती मानने की बजाय कुछ वर्गों का तुष्टिकरण शुरू कर दिया जिसका नतीजा जाति,धर्म और क्षेत्र की राजनीति है. इसका नतीजा निर्दोष झेल रहे हैं.

इस कानून के कारण सरकारी अधिकारी एससी-एसटी के किसी कर्मचारी के खिलाफ विपरीत टिप्पणी करने से डरता है.यह कानून व्यक्ति की व्यक्तिगत ओर पेशागत प्रतिष्ठा खराब करता है.इससे झूठी शिकायत और मनमानी गिरफ्तारी की छूट मिलती है.
सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल 20 मार्च को अपने फैसले में एससी-एसटी कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए दिशानिर्देश जारी किए थे जिसमें कहा गया था कि एससी-एसटी अत्याचार निरोधक कानून में शिकायत मिलने के तुरंत बाद मामला दर्ज नहीं होगा. डीएसपी पहले शिकायत की जांच कर पता लगाएगा कि मामला झूठा और दुर्भावना से प्रेरित तो नहीं है. इसके अलावा एफआईआर के बाद तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी.
दरअसल पिछले कुछ दशकों से देश भर में संख्याबल और जातिबल की धूर्त्ततापूर्ण राजनीति हो रही है जिसका मकसद गैर मुस्लिम समाज को बांटना और कमजोर करना है. संख्याबल और जातिबल की यह राजनीति बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है जिससे देश पर संकट के विनाशकारी बादल छा गए हैं. यह इसी तरह जारी रही तो देश की स्थिति उस खूबसूरत पतंग जैसी हो जाएगी जो शरारती बच्चों की छीन-झपट में किसी काम की नहीं रह जाती है. इस छीन -झपट में पतंग का क्या हाल होता है यह बताने की जरूरत नहीं.

पतंग का कोई न कोई टुकड़ा छीन-झपट में शामिल हर बच्चे के हाथ में होता है और वह किसी काम का नहीं रह जाता. पतंग लूटने वाले बच्चे तो अनुभवहीन और अबोध होते हैं मगर देश में ऐसी राजनीति करने वाले अबोध नहीं बेहद चतुर हैं. पिछले सत्तर साल में स्थिति बिगड़ते-बिगड़ते अब इस हाल में पहुंच गई कि जाति के संख्याबल की ताकत के नशे में चूर देश का दलित और पिछड़ा वर्ग सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल फूंकने से भी बाज नहीं आ रहा. दलित -जनजाति उत्पीड़न निषेध कानून के संबंध में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के विरुद्ध भारत बंद विद्रोह नहीं तो और क्या था? अदालत के फैसले के खिलाफ इस तरह बंद का आयोजन कर न्यायपालिका पर जातिबल का दबाव डालने की घृणित राजनीति होगी तो अदालतों से निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जाएगी. तब तो न्यायपालिका जाति और संख्याबल को ध्यान में रखकर फैसला करने लगेगी और उचित -अनुचित का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने दलित -जनजाति उत्पीड़न निषेध कानून को समाप्त नहीं किया , केवल उसके मानवाधिकार और संविधान विरोधी प्रावधानों को निरस्त किया जो संख्याबल और जातिबल की राजनीति से चुनावी लाभ के लिए लागू किए गए थे. दलितों की राजनीति करने वाली मायावती जब 2007 में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने भी इस कानून का व्यापक पैमाने पर हो रहे दुरुपयोग को रोकने के लिए इसी तरह के दो आदेश जारी किए थे.

सुप्रीम कोर्ट ने दलित उत्पीड़न कानून की आड़ में ज्यादती से परेशान महाराष्ट्र के एक व्यक्ति की अपील की सुनवाई करते हुए जब मायावती सरकार के आदेश जैसा ही निर्देश दिया तो आश्चर्य है खुद बसपा सुप्रीमो समेत सत्ता से बाहर सभी विपक्षी दल देश भर में सड़कों पर उतर कर आगजनी और तोड़फोड़ करने लगे.
सुप्रीम कोर्ट यदि जाति के संख्याबल को ध्यान में रखकर फैसले देने लगे तब तो वैसे लोगों को कभी न्याय ही नहीं मिलेगा जिनकी जाति की जनसंख्या कम है. कहने की जरूरत नहीं कि इस समय देश में कथित सवर्ण जाति के लोगों की संख्या सबसे कम है. इस वर्ग के लोगों की संख्या उससे भी कम है जिन्हें सरकार और संविधान ने धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा दे रखा है. जाति और संख्याबल की इस घृणित राजनीति का ही नतीजा है कि देश में जिस जाति के लोग संख्याबल में कम हैं वे निरंतर सत्ता से भी बाहर होते जा रहे हैं और उत्कृष्ट प्रतिभा और योग्यता के बावजूद सरकारी सेवाओं में भी उन्हें जगह नहीं मिल रही.

योग्यता और प्रतिभा का तिरस्कार आखिर देश और समाज को किस स्थिति में पहुंचा देगा इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है. बाबा साहब अंबेदकर इस नीति के प्रबल विरोधी थे. वे संविधान में आरक्षण की व्यवस्था के खिलाफ थे.मगर उन्हें अपना प्रेरणापुरुष मानने वाले दल उनकी नीति और भावना के विरुद्ध दलितों और पिछड़े वर्ग के हित के नाम पर देश और समाज में जहर घोल रहे हैं. ऐसा वे दलितों और पिछड़े वर्ग के हित के लिए नहीं बल्कि सिर्फ अपनी सत्ता और दबंगई बनाए रखने के लिए कर रहे हैं.

ऐसा नहीं होता तो आजादी के इन सत्तर सालों में दलितों की हालत काफी सुधर चुकी होती. आरक्षण से सिर्फ इतना ही हुआ है कि दलितों और पिछड़ों की दो-चार दबंग जातियां विपन्न और जरूरतमंद दलितों और पिछड़ों की सुविधाएं हड़प कर दबंग बन गर्इं. दरअसल इस समय वे ही असली सवर्ण हैं और अगड़ी जातियों को उल्टे वे बदनाम कर रही हैं. वे अपनी जाति के अन्य जरूरतमंद पिछड़ों और दलितों को आरक्षण का लाभ नहीं उठाने देना चाहतीं. यही है संख्याबल और जाति की राजनीति जो इस समय विखंडनवादी हो गई है. अगर ऐसी ही राजनीति होती रही तो देश और संविधान का क्या होगा. इसे लोकतंत्र नहीं, इसे कहते हैं जिसकी लाठी उसकी भैस.

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