दो टूक (श्याम वेताल ) : छत्तीसगढ़ में ‘चंद्रखिलौना’ कैसे लाए भाजपा ?

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श्याम वेताल

गुजरात विधानसभा चुनाव के जो परिणाम आए वह सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए निराशाजनक रहे. पार्टी के नेता बमुश्किल जीत का उत्सव मना पाए. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने इस चुनाव में 150 प्लस का लक्ष्य रखा था लेकिन पार्टी को 150 माइनस 51यानी सिर्फ 99 सीटें ही मिल सकीं जबकि कांग्रेस को पहले की अपेक्षा दोगुनी सीटें हासिल हुई. इसीलिए कहा जा रहा है कि कांग्रेस हार कर भी जीत गयी और भाजपा जीत कर भी हार गयी.
भाजपा की हार मुख्य रूप से प्रतिष्ठा की हार रही. गुजरात में 22 वर्षों से सत्तारूढ़ पार्टी की प्रतिष्ठा का ग्राफ इस चुनाव में जिस तरह गिरा है उससे यह आशंका उत्पन्न हो गई है कि वर्ष 2018 में जिन भाजपा शासित राज्यों में चुनाव होने हैं, उनमें पार्टी की सीटें पहले से घटेंगी. इन राज्यों में मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश हैं जहां पिछले 15 वर्षों से भाजपा का शासन रहा है. इन दोनों राज्यों में से छत्तीसगढ़ को ज्यादा खतरा है. यह खतरा दो कारणों से है. पहला तो यह कि यहां मध्य प्रदेश की अपेक्षा विपक्षी दल कांग्रेस ज्यादा सशक्त एवं समर्थ है और दूसरा कारण यह है कि 15 सालों में सरकार का नेतृत्व एक ही चेहरा कर रहा है जबकि मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में जनता ने 3 चेहरे देखे हैं. यद्यपि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह के चेहरे को लेकर विशेष आपत्ति नहीं है लेकिन अन्य मंत्रियों और नौकरशाहों की छवि कहीं ना कहीं आड़े आएगी. इतना ही नहीं, विपक्षी दल ने मंत्रियों और नौकरशाहों के घपले-घोटाले उजागर करने की कसम खा ली है. जैसा कि सभी जानते हैं कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी विगत पांच वर्षों से पूर्ण रुप से सक्रिय है. पार्टी ने प्रदेश प्रभारी बदलकर पी एल पुनिया को कमान दे दी है और उनके लिए दो सहयोगी भी दिए हैं. मात्र 6 महीने पहले गठित यह टीम अब तक छत्तीसगढ़ का करीब 20 बार दौरा कर चुकी है. यह टीम सिर्फ रायपुर आ कर ही नहीं लौट जाती बल्कि प्रदेश के कई हिस्सों में पहुंचती है और रात भी वहां गुजारने की कोशिश करती है. जिलों की छोटे छोटे गांव तक पैठ बनाने की कांग्रेस की कोशिश रंग ला सकती है. कहते हैं नेता यदि सक्रिय और कर्मठ हो तो कार्यकर्ता भी कर्मशील हो जाता है. इस समय कांग्रेस के कार्यकर्ता भी जोश में आ चुके हैं.
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस की यह तैयारी सिर्फ मीडिया को ही दिख रही है, सत्ता पक्ष भी गंभीरता से इस पर नजर गड़ाए हुए हैं. पार्टी ने चुनाव को देखते हुए काम भी शुरू कर दिया है.
परंतु, पार्टी के सामने सबसे बड़ा प्रश्न और आशंका यह है कि अध्यक्ष अमित शाह ने यहां 65 सीटों का जो लक्ष्य दे दिया है, उसे कैसे हासिल किया जाए? गुजरात में पार्टी का जो हाल हुआ है उसे देखकर यहां का लक्ष्य तो ‘चन्द्रखिलौना’ लग रहा है. वर्ष 2008 के चुनाव में जब यहां सरकार के खिलाफ कोई एंटी इनकंबेंसी नहीं थी, उस समय भी पार्टी को 50 से ज्यादा सीटें नहीं मिली तो अब 15 साल के बाद यह कैसे संभव हो सकेगा?
कहीं, अध्यक्ष जी को कोई पूर्वाभास तो नहीं हुआ है कि छत्तीसगढ़ में स्थिति बहुत अच्छी नहीं है इसलिए बड़ा टारगेट दे दिया ताकि कितनी भी हालत बिगड़े, कम से कम सरकार बनाने भर का बहुमत मिल जाए जैसा गुजरात में हुआ. गुजरात में अमित शाह शायद पहले से जानते थे कि नरेंद्र मोदी के केंद्र में जाने के बाद गुजरातियों का भाजपा के प्रति मोह भंग हुआ है इसलिए डेढ़ सौ का टारगेट रख दिया. हालाँकि चुनाव के बाद उन्होंने अपनी सफाई देते हुए कहा कि जिस समय टारगेट रखा गया था उस वक्त यह नहीं पता था कि कांग्रेस यहां जातिवाद का सहारा लेगी और निम्न स्तर की राजनीति करेगी.
अब छत्तीसगढ़ के विषय में अमित शाह जी को अभी से यह पूर्वानुमान लगा लेना चाहिए चुनाव एक युद्ध है और कहा जाता है कि युद्ध और प्रेम में सब कुछ जायज है.
बहरहाल, छत्तीसगढ़ में भाजपा का पूरा ध्यान बस्तर और सरगुजा पर है. इसके अलावा जिन सीटों पर पिछली बार पार्टी को पराजय मिली थी, उन पर अभी से फोकस किया जा रहा है. पार्टी के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री सौदान सिंह मैदान पर उतर चुके हैं और सांसदों, विधायकों के साथ मीटिंग का क्रम शुरू कर चुके हैं. वैसे, पिछली बार अमित शाह छत्तीसगढ़ आए थे, उस समय यह निर्देश दे गए थे कि मंत्रीगण ग्रामीण क्षेत्रों के दौरे करें और रात वहां गुजारें .
अब अमित शाह के इस निर्देश का कितना पालन हुआ, कितना नहीं – यह पार्टी और राज्य सरकार ही बता सकती है.

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