नवरात्रि का आखिरी दिन किस तरह करें नवरात्रि पूजा सफ़हल

अंकित राजपूत

बिलासपुर :

नवरात्र व्रत का समापन कन्या पूजन से ही पूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि अगर आप नवरात्र का व्रत रखते है और अंत में कन्या भोजन न कराएं तो आपकी पूजा सफल नहीं होती। इसे करने से पहले आपको कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए।

आइए जानें कन्या पूजन की कुछ विशेष बातें

कैसे करें कन्या पूजन

कन्या भोजन से पहले कन्याओं को आमंत्रित कर उनका स्वागत करेंए उनके पैर धोएं, उनका शृंगार करें और उसके बाद उन्हें भोजन करवाएं। भोजन में मिष्ठान और फल शामिल करना न भूलें। इसके बाद उन्हें यथा योग्य उपहार देकर उनके घर तक पहुंचाएं। किसी भी वर्ण, जाति और धर्म की कन्या को आप कन्या पूजन के लिए आमंत्रित कर सकती हैं।

कितनी कन्याओं को करें आमंत्रित

यदि आप सामर्थ्यवान हैंए तो नौ से ज्यादा या नौ के गुणात्मक क्रम में भी जैसे 18, 27 या 36 कन्याओं को भी आमंत्रित कर सकती हैं। यदि कन्या के भाई की उम्र 10 साल से कम है तो उसे भी आप कन्या के साथ आमंत्रित कर सकती हैं।

यदि गरीब परिवार की कन्याओं को आमंत्रित कर उनका सम्मान करेंगेए तो इस शक्ति पूजा का महत्व और भी बढ़ जाएगा। यदि सामर्थ्यवान हैं, तो किसी भी निर्धनकन्या की शिक्षा और स्वास्थ्य की यथायोग्य जिम्मेदारी वहन करने का संकल्प लें।

कन्या भोजन से मिलने वाला फल

नवरात्र में अष्टमी और नवमी के दिन कन्या भोजन का प्रावधान है। इसके पीछे भी शास्त्रों में वर्णित तथ्य यही है कि दो वर्ष से 10 वर्ष की आयु की नौ कन्याओं को भोजन कराने से समस्त दोषों का नाश होता है। प्रत्येक पूजा पद्घति में एक शब्द ष्प्रतिगृह्यतामष् आता है, जिसका संबंध मनुष्य की अपेक्षा से है।

मनुष्य ईश्वर से निवेदन करता है कि प्रभु मैं आपको एक निश्चित वस्तु अर्पित कर रहा हूंए उसके बदले आप मुझे मेरा मनचाहा प्रदान करें। इसी तरह नवरात्र में एक विशेष दिन शास्त्रों में कन्या के विभिन्न रूपों को भोग अर्पित करने का भी निर्देश है। इससे आपकी सभी इच्छाएं पूरी होंगी।

जानें कन्या के विभिन्न रूप

दो वर्ष की कन्या को कौमारी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसके पूजन से दुख और दरिद्रता समाप्त हो जाती है।

तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति मानी जाती है। त्रिमूर्ति के पूजन से धन.धान्य का आगमन और संपूर्ण परिवार का कल्याण होता है।

चार वर्ष की कन्या कल्याणी नाम से संबोधित की जाती है। कल्याणी की पूजा से सुख.समृद्घि मिलती है।

पांच वर्ष की कन्या रोहिणी कही जाती है। रोहिणी के पूजन से व्यक्ति रोग.मुक्त होता है।

छह वर्ष की कन्या को कालिका कहा जाता है। कालिका की अर्चना से विद्या और राजयोग की प्राप्ति होती है।

सात वर्ष की कन्या को चण्डिका कहा जाता है। चण्डिका की पूजा.अर्चना और भोजन कराने से ऐश्वर्य मिलता है।

आठ वर्ष की कन्या को शाम्भवी कहा जाता है। शाम्भवी की पूजा.अर्चना से लोकप्रियता प्राप्त होती है।

नौ वर्ष की कन्या दुर्गा की अर्चना से शत्रु पर विजय मिलती है तथा असाध्य कार्य सिद्घ होते हैं।

दस वर्ष की कन्या सुभद्रा कही जाती है। सुभद्रा के पूजन से मनोरथ पूर्ण होते हैं और सुख मिलता है।

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