शुभ मुहूर्त कैसे जाने ? क्या करें शुभ मुहूर्त गणना के लिए

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव:

लग्न

मुहूर्त के सभी विचारणीय घटकों में लग्न सबसे महŸवपूर्ण घटक है। व्यक्ति विशेष के मुहूर्त के साथ भी इसका सीधा संबंध है। अनुकूल स्थितियां उपलब्ध न होने पर भी सही लग्न में किया कार्य अशुभ योगों द्वारा उत्पन्न दोषों को दूर करने में सक्षम होता है।

इस प्रकार किसी भी कार्य के प्रारंभ में उदित लग्न के संदर्भ में ग्रहों की विभिन्न भावों में स्थिति को ध्यानपूर्वक जानना अति आवश्यक है। कार्य का स्वभाव लग्न में उदय होने वाली राशि के स्वभाव से मिलना चाहिए।

स्थिर प्रकृति के कार्यों जैसे निर्माण, राजतिलक, गृह प्रवेश, विवाह आदि कार्यों के लिए लग्न में स्थिर राशियों (2, 5, 8, 11) का लग्न शुभ है। यात्रा, सवारी, वाहन चालन, व्यवसाय का प्रारंभ के लिए चर राशियों (1, 4, 7, 10) के लग्न का चयन करें।

इसी प्रकार अन्य कार्यों के लिए भी उनके स्वभावानुसार लग्न का प्रयोग करें। इसी प्रकार आक्रामकता में विषम पुरुष राशियां, कला, वस्त्र, सौंदर्य के लिए सम राशि का लग्न चयन करें। इसी प्रकार राशियों के शीर्षोदय एवं पृष्ठोदय तथा उनके तत्व अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल आदि का विचार करें।

पंगु-अंध-काण/बधिर लग्न

दिन में तुला, वृश्चिक तथा रात्रि में धनु व मकर काण/बधिर लग्न माने गये हैं। दिन में मेष, वृष, सिंह और रात्रि में मिथुन, कर्क व कन्या अंध लग्न हैं। दिन में कुंभ, रात्रि में मीन पंगु लग्न माने गये हैं। इन लग्नों में शुभ कार्य वर्जित कहे गये हैं लेकिन दैवज्ञ परंपरा ने इसे दोषपूर्ण नहीं माना है।

कार्यों में लग्न शुद्धि के सामान्य नियम

लग्न का विचार छोड़कर यदि कुछ काम किया जाय, तो वह सब निष्फल होता है।

चन्द्रबल

अपनी जन्म राशि से 1, 3, 6, 7, 10, 11वीं राशि का चन्द्र शुभ होता है। इसके अलावा शुक्ल पक्ष में 2, 5, 9 वीं राशि का चन्द्र भी शुभ होता है।

ताराबल

जन्म नक्षत्र से इष्टकालीन नक्षत्र तक की संख्या को 9 से भाग दें, शेष 1, 2, 4, 6, 8, 0 रहे तो तारा-बल प्राप्त होता है, 3, 5, 7 शेष रहे तो तारा-बल नहीं मिलता। शुक्लपक्ष में चन्द्रबल एवं कृष्ण पक्ष में तारा बल लेना चाहिए।

सामान्य दिन शुद्धि शुभ तिथि

दोनों पक्षों की द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, द्वादशी (2, 3, 5, 7, 10, 12) और कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा (1) तथा शुक्लपक्ष की त्रयोदशी (13) शुभ तिथियाँ हैं। क्षय एवं वृद्धि तिथियाँ वर्ज्य हैं।

शुभ वार

सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार शुभ हैं।

शुभ नक्षत्र

अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उत्तरा-फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, उत्तराषाढा़ श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, उत्तराभाद्र एवं रेवती नक्षत्र शुभ हैं।

शुभ करण

बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर एवं वणिज शुभ करण हैं।

लग्न-शुद्धि

परंपरागत चन्द्रमा का बल प्रधान है, किन्तु शास्त्रों के अनुसार लग्नबल ही प्रधान है। लग्न से ग्यारहवें स्थान में सब ग्रह शुभ होते हैं। 3, 8 स्थानों में सूर्य या शनि शुभ होते हैं। द्वितीय अथवा तृतीय स्थान में चन्द्रमा शुभ होता है।

3, 6 स्थानों में मंगल शुभ होता है। 2, 3, 4, 5, 6, 9, 10 स्थानों में बुध व बृहस्पति शुभ होते हैं। 2, 3, 4, 5, 9, 10 स्थानों में शुक्र शुभ होता है। 3, 5, 6, 8, 9, 10, 12 स्थानों में राहु शुभ होता है। प्रत्येक वार के 24 घंटों की होरा निम्नलिखित है।

किस होरा में कौन सा कार्य करें होरा अनुसार कार्य निर्धारण दिन/वार कार्य

रवि की होरा राज्याभिषेक, कार्य, नवीन पद ग्रहण, राज-दर्शन, राज्यसेवा, औषधि का निर्माण, स्वर्ण-ताम्रादि कार्य, यज्ञ, मन्त्रोपदेश, गाय-बैल एवं वाहन का क्रय आदि कार्य करें।

चन्द्र (सोम) की होरा कृषि सम्बन्धी कार्य, नवीन वस्त्र अथवा मोती रत्न, आभूषण धारण, नवीन योजना, परिकल्पना, कला सीखना, बाग-बगीचा लगाना, वृक्षारोपण एवं चांदी की वस्तुओं का निर्माण कार्य करें।

मंगल की होरा वाद-विवाद, मुकद्दमा, जासूसी कार्य, छल करना, असद् कार्य, ऋण देना, युद्ध-नीति, साहस कृत्य, खनन कार्य, स्वर्ण-ताम्रादि कार्य, शल्य-क्रिया (आपरेशन) एवं व्यायाम कार्य करें।

बुध की होरा साहित्यारम्भ, पठन-पाठन, शिक्षा-दीक्षा, लेखन, प्रकाशन, अध्ययन, शिल्पकला, मैत्री, क्रीड़ा, धान्य-संग्रह, चातुर्य, बही-खाता, हिसाब-किताब, लोक-सम्पर्क एवं पत्र व्यवहार कार्य करें।

गुरु की होरा धार्मिक कार्य, विवाह, ग्रह-शान्ति, यज्ञ-हवन, दान-पुण्य, मांगलिक कार्य, देवार्चन, देव-प्रतिष्ठा, न्यायिक कार्य, नवीन वस्त्राभूषण धारण, विद्याभ्यास, वाहन क्रय-विक्रय एवं तीर्थाटन कार्य करें।

शुक्र की होरा नृत्य-संगीत, स्त्री-प्रसंग, प्रेम-व्यवहार, प्रियजन-समागम, उत्सव, वस्त्र अलंकार धारण, लक्ष्मी-पूजन, व्यापारिक कार्य, कृषि-कार्य, ऐश्वर्यवर्द्धक कार्य एवं फिल्म-निर्माण कार्य करें। शनि की होरा गृह-प्रवेश, नौकर-चाकर रखना, सेवा विषयक कार्य, मशीनरी, कल-पुर्जों के कार्य, असत्य भाषण, छल कपट, अर्क-निष्कासन, विसर्जन, धन-संग्रह एवं पद-ग्रहण कार्य करें।

शुभ मुहूर्त एवं योग में प्रारम्भ किया गया कार्य निर्विघ्न रूप से शीघ्र ही पूर्ण होता है। उसमें किसी प्रकार का कोई विघ्न नहीं रहता है तथा जीवन में तीव्र शीघ्र अतिशीघ्र मनोवांछित प्रगति की प्राप्ति होती है।

ऐसे ही कुछ योग सर्वार्थ सिद्धि, अमृत सिद्धि, गुरु पुष्य और रवि पुष्य इत्यादि योग हैं। ये योग वारों में विशेष नक्षत्रों से सम्पर्क बनने से निर्मित होते हैं। इन योगों के नामों से ही स्पष्ट है कि इन योगों के फल सदैव शुभ होते हैं।

तिथि एवं वार से बनने वाले योग

योग शब्द युज, धातु से बना है, जिसका अर्थ है मिलाना या जोड़ना। यहां कुछ शुभ और अशुभ योग दिए जा रहे हैं जो तिथि, वार तथा नक्षत्र आदि से मिलकर बनते हैं।

सिद्धि योग

यदि शुक्रवार को नंदा तिथि 1, 6, 11, बुधवार को भद्रा तिथि, 2, 7, 12, मंगलवार को जया तिथि 3, 8, 13, शनिवार को रिक्ता तिथि, 4, 9 14 और गुरुवार को पूर्णा तिथि 5, 10, 15, 30 हो तो तिथि एवं वार की यह युति सिद्धि योग निर्मित करती हैं तथा यह प्रत्येक कार्य के लिए शुभ व सफलप्रदायक होता है। इस प्रकार वार एवं तिथि के मिलन से सिद्धि योग निम्न प्रकार बनता है।

सिद्धि योग वार तिथि वार तिथि

रविवार 3, 8, 13 गुरुवार 5, 10, 15 सोमवार 1, 6, 11 शुक्रवार 1, 6, 11 मंगलवार 3, 8, 13 शनिवार 4, 9, 14 बुधवार 2, 7, 12 – –

ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव कुंडली विशेषज्ञ और प्रश्न शास्त्री 8178677715, 9811598848

ज्योतिष आचार्या रेखाकल्पदेव पिछले 15 वर्षों से सटीक ज्योतिषीय फलादेश और घटना काल निर्धारण करने में महारत रखती है। कई प्रसिद्ध वेबसाईटस के लिए रेखा ज्योतिष परामर्श कार्य कर चुकी हैं।

आचार्या रेखा एक बेहतरीन लेखिका भी हैं। इनके लिखे लेख कई बड़ी वेबसाईट, ई पत्रिकाओं और विश्व की सबसे चर्चित ज्योतिषीय पत्रिकाओं में शोधारित लेख एवं भविष्यकथन के कॉलम नियमित रुप से प्रकाशित होते रहते हैं।

जीवन की स्थिति, आय, करियर, नौकरी, प्रेम जीवन, वैवाहिक जीवन, व्यापार, विदेशी यात्रा, ऋणऔर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, धन, बच्चे, शिक्षा,विवाह, कानूनी विवाद, धार्मिक मान्यताओं और सर्जरी सहित जीवन के विभिन्न पहलुओं को फलादेश के माध्यम से हल करने में विशेषज्ञता रखती हैं।

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