अगर ऐसा होता तो पृथ्वी पर नहीं बचता सांपों का अस्तित्व

सांप अपना वश खोकर धीरे-धीरे अग्निकुंड में विलीन होते गए

महाभारत काल का समय जिस समय सांप का अस्तित्व पूरी तरह से खतरे में पड़ गया था। उस समय एक ऐसा आयोजन हुआ कि सांप अपना वश खोकर धीरे-धीरे अग्निकुंड में विलीन होते गए।

क्या है इसके पीछे की कहानी जिससे सांपों के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा। पुराणों के अजब-गजब में शामिल ये तथ्य जो बना सांपों के लिए खतरा……………………………..

महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद कई वर्षों तक पांडवों ने हस्तिनापुर पर राज किया। वृद्धावस्था होने पर पांडवों ने अर्जुन के पौत्र परिक्षित को राजपाट सौंप दिया और स्वयं स्वर्ग की यात्रा पर चले गए। परीक्षित के शासन काल में द्वापर युग समाप्त हो गया, कलियुग आरंभ हुआ और फिर एक दिन…

एक दिन राजा परीक्षित शिकार खेलने निकले। शिकार खेलते हुए वह शमिक ऋषि के आश्रम में पहुंचे।

वहां शमिक ऋषि समाधि में लीन थे। राजा परीक्षित को प्यास लगी थी और उन्होंने ऋषि से पानी मांगा, लेकिन समाधि में होने के कारण उन्हें राजा के आने का पता नहीं चला। राजा परीक्षित को लगा कि ऋषि ने उन पर ध्यान न देकर उनका अपमान किया है।

कलियुग ने इनकी बुद्धि बदल दी और न्यायप्रिय राजा के मन में अहंकार ने जन्म ले लिया। इस पर राजा ने शमिक ऋषि के गले में मरा हुआ सांप डाल दिया, जिससे ऋषि की समाधि टूटी और गले में मरा हुआ सांप देखकर उन्हें बहुत क्रोध आया।

इन्होंने राजा को शाप दिया कि तुम्हारी मृत्यु इसी सांप के काटने से होगी। तब ऋषि ने अपने तपोबल से उस मरे हुए सांप को जीवित कर दिया।

राजा परीक्षित ने इस शाप से मुक्ति के बहुत उपाय किए किन्तु ऋषि का शाप टल नहीं सका। एक दिन फूलों की टोकरी में छिपे तक्षक सांप ने राजा को डंस लिया और उनकी मृत्यु हो गई।

राजा परीक्षित की मृत्यु के बाद उनके बेटे जनमजेय राजगद्दी पर बैठे और इन्होंने सबसे पहले ऋषियों को बुलाकर सर्पमेध यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ शुरू होने पर दूर-दूर से सभी सांप अपने ऊपर नियंत्रण खोकर हवन कुंड में आकर गिरने लगे।

खुद को बचाने के लिए तक्षक नाग देवराज इंद्र के सिंहासन से लिपट गया। जैसे-जैसे तक्षक खुद पर नियंत्रण खो रहा था, सिंहासन सहित देवराज इंद्र भी हवन कुंड की ओर बढ़ने लगे। देवतागण इस दृश्य को देखकर चिंतित हो उठे।m

तब आस्तिका मुनि ने जनमजेय को समझाया कि यदि देवराज इंद्र अग्निकुंड में समाकर समाप्त हो गए तो हाहाकर मच जाएगा। निर्दोषों की हत्या का पाप अपने सिर न लो और सृष्टि रचियता के क्रोध के भागी न बनो।

इसके बाद तक्षक ने जनमजेय से क्षमा याचना की और कहा कि आपके पिता की मृत्यु इस विधि से होना विधाता ने तय किया था। इसमें नाग जाति का दोष नहीं है।

तब सबकुछ विचारकर जनमेजय ने यज्ञ समाप्त कर दिया और सर्प जीवित बच गए। इस घटना का उल्लेख भविष्यपुराण में मिलता है।

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