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उद्धव ठाकरे के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनने का निहितार्थ -कृष्ण देव सिंह

सियासी ड्रामा खत्म होने के बाद बदल गया सत्ता का केन्द्र

मुंबई: महाराष्ट्र में भाजपा को सत्ता में आने से रोके जाने के बाद देश के गैर भाजपाई खेमें में जश्न मनाया जाना चाहिए था लोकिन विपक्ष ने बड़ी खामोश प्रतिक्रिया देकर राजनीतिक रहस्यों को गहरा दिया है। स्थिति यह है कि स्वंम उद्धव ठाकरे के पुत्र आदित्य ठाकरे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गॉधी औऱ पूर्व प्रधानमंत्री डा० मनमोहन सिंह से दिल्ली में मिलकर शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने का आमंत्रण दिया।

परन्तु उन्होंने इसे सहजता से स्वीकर कर काग्रेस पार्टी के तरफ से एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधी मंडल मुम्बई भेज दिया। इसलिए महाराष्ट्र गाथा के निहितार्थ समझना बहुत जरूरी हो गया है। सवाल ये है कि क्या भाजपा के मिशन 2024 को इन्हीं बेमेल गठबंधनों के जरिये विफल किया जा सकेगा या कोई दूसरा रास्ता भी खोजना पडेगा ?हलांकि भाजपा महाराष्ट्र में हाथ से निकल जाने से घायल सांप की तरह बिलबिलाई बैठी है। झ्सलिए आने वाले दिनों में उसकी प्रतिक्रिया कैसी होगी,कहना मुश्किल है।

बहरहाल शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भब्य समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद का शपथ ले चुके है। और अब वे शिवसेना,राष्ट्रवादी कांग्रेस और कांग्रेस गठबन्धन “महाराष्ट्र विकास अघाड़ी”की सरकार का नेतृत्व कर रहे है। प्रदेश में लंबा सियासी ड्रामा खत्म होने के वाद सत्ता का केन्द्र बदल गया है।

एक जमाने में राजनीतिक ताकत का मजबूत केन्द्र रहे ठाकरे निवास मातोश्री अब महाराष्ट्र की सत्ता का केन्द्र बन गया है। हलांकि ठाकरे निवास को अब दिग्गज मराठा नेता शरद पवार के नेपियन सी रोड़ स्थित आवास सिल्वर ओक से अपनी शाक्तियां साक्षा करनी होगी क्योंकि सरकार बनाने में उनकी अहम भूमिका रही है। तब मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्हें मालाबार हिल्स स्थित मुख्यमंत्री आवास वर्षा और मातोश्री, दोनों जगहों पर अपना समय विभाजित करना होगा।

भाजपा ने देश की राजनीति को एक नए तरीके से संचालित करने का श्रीगणेश किया था। हिंदुत्व उसकी नीव में था ही किन्तु भाजपा ने कांग्रेस मुक्त भारत का भी संकल्प लिया ।हिंदुत्व की जमीन पर तीन दशक तक उसके साथ शिवसेना महाराष्ट्र की राजनीति मे रही ।महाराष्ट्र के बाहर भाजपा के जितने भी सहयोगी दल हैं उनमें से एक भी शिवसेना जैसा कट्टर हिंदूवादी दल नहीं है।

यकीनन महाराष्ट्र में परिस्थितियों का आकलन करने में मोदी-शाह की जोड़ी से चूक हुई है। लेकिन मुझे लगता है की महाराष्ट्र में मिली नाकामयाबी के बाद भाजपा अब और अधिक फूंक-फूंक कर कदम रखेगी। मुझे लगता है कि अब वह अपने सहयोगी दलों की एनडीए के प्रति निष्ठाओं को नए सिरे से जांच-परख करेगा, शायद?

राजनीति में होने वाले प्रतिपल परिवर्तनों से रूबरू होने वाले जानते हैं कि महाराष्ट्र में भाजपा को सत्ता में आने से रोकने वाले एनसीपी प्रमुख आज भी इतने ताकतवर नहीं हैं कि वे पूरे देश में भाजपा रोको अभियान का नेतृत्व कर सकें। महाराष्ट्र में उनकी अपनी जमीन है, महाराष्ट्र के बाहर एनसीपी शायद कुछ है।

ठीक उसी तरह जैसे की जेडीयू बिहार के बाहर या समाजवादी पार्टी यूपी के बाहर कुछ नहीं है। कांग्रेस की भूमिका इस अभियान में जरूर महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि उसकी हैसियत आज भी राष्ट्रीय दल की है। इसी संभावनाओं को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने अन्य प्रदेशों में भी महाराष्ट्र की तर्ज पर गठबन्धन करने की घोषणा भी कर दी है।

भाजपा का मिशन 2024 दक्षिणी राज्यों के भरोसे पूरा होने वाला नहीं है। क्योंकि इन राज्यों की राजनीति भी महाराष्ट्र की ही तरह व्यक्तिपरक है। दक्षिण के मुकाबले उत्तर भारत में भाजपा ज्यादा ताकत के साथ खड़ी रह सकती है। संयोग से उत्तर भारत के तीन राज्य फिलहाल भाजपा की पकड़ से बाहर हैं।

बिहार, दिल्ली भी भाजपा के लिए अभी चुनौती ही है। पंजाब में उसके पास फिलहाल करने के लिए कुछ नहीं है। भाजपा के पास अब देश जीतने के लिए बड़े मुद्दे भी नहीं बचे हैं। धारा 370 और राम मंदिर का मुद्दा पार्श्व में चला गया है। केवल समान नागरिक संहिता और एनआरसी के बूते मिशन 2024 को हासिल नहीं किया जा सकता। ऐसे में भाजपा कोई नया शिगूफा छोड़ दे, कुछ कहा नहीं सकता?

महाराष्ट्र में गैर भाजपावाद का जो बीजारोपण हुआ है उसकी सफलता और असफलता ही इस नए और ठिठके अभियान का भविष्य तय करेगी। एनसीपी और कांग्रेस में नेतृत्व का संकट है।दोनों के नेता उम्रदराज हैं और मिशन 2024 तक अपने आपको सक्रिय रख पाएंगे इसमें संदेह है। बाकी के चार साल में किस पार्टी से कौन सा नेता उभर कर मोदी-शाह की जोड़ी का मुकाबला करेगा फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। इसलिए केवल अटकलबाजी के भरोसे कोई आकलन करना बेमानी होगा।अब देखना होगा की भाजपा के मुकाबले कौन सी पार्टी ,किस तैयारी के साथ खड़ी होती है?

हाल की घटनाओं ने साबित कर दिया है की राजनीति मूल्यहीन हो गयी है,कौन सा दल कब,किस रूप में आपके सामने खड़ा होगा कह पाना कठिन है ।कोई नहीं जानता था कि भाजपा एनसीपी के साथ खड़ी हो जाएगी,कोई नहीं जनता था कि शिवसेना एनसीपी ही नहीं बल्कि कांग्रेस के साथ खड़ी हो जाएगी, किसे पता था कि कांग्रेस शिवसेना का नेतृत्व स्वीकार कर लेगी ?

कोई नहीं जानता था कि एनसीपी भी शिवसेना के साथ गलबहियां कर लेगी ।यानि जो कभी अकल्पनीय था वो आज सब हकीकत बन चूका है। कोई किसी के लिए अस्पृश्य नहीं रहा। कांग्रेस आज देश के में इतनी ताकतवर तो नहीं है कि भाजपा को उखाड़ फेंके लेकिन उसकी आज भी उल्लेखनीय उपस्थिति हिन्दुस्तान के कोने-कोने में है।

बहरहाल महाराष्ट्र के सियासी संग्राम में सबसे बडे फायदे में शिवसेना रही है। शिवसेना को पाच साल के लिए मुख्यमंत्री पद देने पर एनसीपी और कांग्रेस ने सहमति दी है। हलांकि भाजपा और शिवसेना दोनों ने 30 साल का पुराना साथ खो दिया है।

इसी के साथ शिवसेना ने केन्द्र सरकार से अपने कोटे का मंत्रीपद भी खो दिया ह्रै। हलांकि शिवसेना कट्टर हिन्दुत्व वाली छवि से परिपक्य राजनीतिक पार्टी के रन्प में स्थापित हुआ है। कांग्रेस और राब्ट्रवादी पार्टी को सत्ता में हिस्सेदारी मिली है। लेकिन दोनों को विचारों से समक्षौता करना पड़ा है।काग्रेस का शिवसेना के साथ जाने को हिन्दु विरोधी छवि से बाहर निकलने की कयावद के तौर भी देखा जा रहा है।

भाजपा देश में यदि 70 से 41 फीसदी पर आई है तो अपने प्रयोगों की वजह से अन्यथा भाजपा तो अजेय बनती जा रही थी। देश के अन्य दल भाजपा के संगठन और नेतृत्व के मामले में अप्रासगिक लगने लगे थे ,लेकिन कल क्या होगा कोई नहीं जानता ?

मुमकिन है की आने वाले दिनों में राजनीति शास्त्र कोई नया अध्याय लिख डाले। शिवसेना की तरह को३ि और बड़े राजनीतिक दलों की जरूरत बनकर सामने आ जाये! फिलहाल समय महाराष्ट्र के शरद पवार, शिवसेना के उद्धव ठाकरे और कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी को बधाई देने का है।

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