प्राइमरी स्कूल में बच्चों को मिड डे मील में दाल की जगह हल्दी और पानी का घोल दिया गया

उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले में पिछले हफ़्ते एक वीडियो वायरल होने से हड़कंप मच गया जिसमें दावा किया जा रहा था कि एक प्राइमरी स्कूल में बच्चों को मिड डे मील में दाल की जगह हल्दी और पानी का घोल दिया गया और साथ में चावल परोसा गया.

मिड डे मील में ऐसी कथित धांधली की ख़बरें अक़्सर आती रहती हैं और पिछले दिनों मिर्ज़ापुर ज़िले में बच्चों को नमक रोटी खिलाने का मामला भी काफ़ी चर्चित हुआ था.

ताज़ा मामला सीतापुर ज़िला मुख्यालय से क़रीब बीस किमी दूर पिसावां ब्लॉक के बिचपारिया गांव स्थित प्राइमरी स्कूल का है जहां बच्चों को मिड डे मील में कथित तौर पर दाल की जगह हल्दी और पानी के घोल देने का वीडियो सामने आया है.

हालांकि मामले की जानकारी होते ही ज़िले के आला अधिकारियों ने स्कूल में जाकर अपने स्तर पर जांच की और इसे ग़लत बताया है लेकिन वीडियो की सच्चाई से उन्होंने भी इनकार नहीं किया है. वीडियो में महज़ कुछ बच्चों के ही दिखने और उसकी अवधि सिर्फ़ दस सेकंड की होने से स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं हो पा रही है.

साथ ही, इस वजह से वीडियो बनाने वाले की मंशा पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं.

जानकारी के मुताबिक, वीडियो पिसावां के ही एक पत्रकार ने बनाया, फिर उसने किसी अन्य पत्रकार को दे दिया और उसके बाद यह सोशल मीडिया के ज़रिए वायरल हो गया.

बीबीसी की पड़ताल

बीबीसी ने इस मामले से संबंधित विभिन्न पहलुओं की अपने स्तर पर जानकारी जुटाई और संबंधित लोगों से बातचीत की.

पिसावां के उस पत्रकार से भी बात की गई जिन्होंने यह वीडियो बनाया था और स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों से भी इस बारे में पड़ताल की गई.

इस संबंध में जो वीडियो सामने आए हैं वो तीन भाग में हैं.

एक वीडियो जिसमें स्कूल का नाम लिखा दिख रहा है, वो महज़ एक सेकंड का है, पांच सेकंड वाले दूसरे वीडियो में दो बच्चियां खाना खा रही हैं जिनमें एक की प्लेट में सिर्फ़ सब्ज़ी की तरी यानी रस (जिसे हल्दी और पानी का घोल बताया जा रहा है) दिख रही है जबकि दूसरी बच्ची की प्लेट में सब्ज़ी और चावल दिख रहा है.

तीसरा वीडियो दस सेकंड का है जिसमें उन दो बच्चियों के अलावा दो और बच्चे भी यही खाना खाते दिख रहे हैं.

इनमें से एक बच्चे की प्लेट में भी सिर्फ़ सब्ज़ी का जूस या तरी ही दिख रही है. इसी बच्चे से वीडियो बनाने वाला पूछता है, “सब पानी-पानी है न? चावल-वावल कुछ नहीं मिला?”

जवाब में बच्चा मुस्कराते हुए दूसरी ओर देखता है और फिर वीडियो यहीं ख़त्म हो जाता है.

क्या कहते हैं स्कूल टीचर

बिचपारिया प्राइमरी स्कूल के अध्यापक संदीप कुमार ने इस बारे में बीबीसी को बताया, “वीडियो में दिख रहा बच्चा मानसिक रूप से कमज़ोर है. हम लोग यहां उसका ख़ास ख़याल रखते हैं. दूसरी बात, पत्रकार महोदय शनिवार को वीडियो बनाने आए थे, उस दिन बच्चों को मिड डे मील में सब्ज़ी और चावल दिया जाता है.”

“उस दिन सोयाबीन और आलू की सब्ज़ी बनी थी और बच्चों को चावल के साथ वही सब्ज़ी दी गई थी. ज़्यादातर बच्चे तब तक भोजन कर चुके थे और कुछ बच्चों ने दोबारा सब्ज़ी मांगी थी. हो सकता है कि उन्होंने आलू और सोयाबीन निकाल कर खा लिया हो और उनके प्लेट में केवल रस ही बचा हो. लेकिन ये कहना कि उन्हें हल्दी और पानी का घोल दिया गया था, यह बिल्कुल बेबुनियाद है और ऐसा यहां आज तक नहीं किया गया है.”

संदीप कुमार का दावा है कि वो पिछले एक साल से यहां तैनात हैं और नियमित रूप से मेन्यू के हिसाब से बच्चों को रोज़ मिड डे मील दिया जाता है.

स्कूल में खाना बनाने के लिए दो महिलाएं नियुक्त की गई हैं. खाने बनाने वाली सुधा अपनी दूसरी सहयोगी के साथ बर्तन साफ़ कर रही थीं.

थोड़ी देर पहले ही दोनों ने मिट्टी के चूल्हे पर खाना बनाया था और बच्चों को खिलाया था.

सुधा हफ़्ते में छह दिन का मेन्यू एक सांस में सुना देती हैं और साफ़तौर पर कहती हैं कि शनिवार को उन्होंने सब्ज़ी और चावल बनाया था.

विभागीय जांच

बुधवार को स्कूल में बच्चों के लिए मिड डे मील में तहरी बनी थी. तहरी के बाद बच्चों को मेन्यू के हिसाब से दूध भी दिया गया था. स्कूल में गांव के ही 104 बच्चे पढ़ने आते हैं.

मिड डे मील में कथित अनियमितता संबंधी वीडियो वायरल होने के बाद शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने मौक़े पर पहुंच कर अपने स्तर पर जांच पड़ताल की थी.

सीतापुर के बेसिक शिक्षा अधिकारी अजय कुमार बताते हैं, “मामला संज्ञान में आते ही खंड शिक्षा अधिकारी और अन्य अधिकारियों के साथ मैं ख़ुद जांच करने गया था. उस समय स्कूल में बीस-पच्चीस बच्चे मौजूद थे. उस दिन मेन्यू के हिसाब से सब्ज़ी और चावल बना था जिसकी पुष्टि बच्चों के अलावा उनके अभिभावकों और अन्य लोगों ने भी की है.”

बीबीसी ने गांव के कुछ उन लोगों से भी बात की जिनके बच्चे स्कूल में पढ़ने जाते हैं.

नीलकंठ गांव में ही किसान हैं और उनके दो बच्चे यहां पढ़ते हैं. एक बच्चा चौथी कक्षा में जबकि दूसरा बच्चा कक्षा एक में पढ़ता है.

नीलकंठ बताते हैं, “बच्चों ने खाने को लेकर कभी कोई शिकायत नहीं की. कोई गड़बड़ हुई होती तो बताते ज़रूर. टीचर लोग बच्चों को पढ़ाते भी अच्छी तरह से हैं.”

वीडियो बनाने वाले पत्रकार

सुरेंद्र कुमार नाम के एक अन्य अभिभावक के भी तीन बच्चे यहां पढ़ते हैं और उन्हें भी विद्यालय से ऐसी कोई शिकायत नहीं है.

लेकिन जब इस बारे में वीडियो बनाने वाले पत्रकार आशीष प्रताप सिंह उर्फ़ गोलू सिंह से बीबीसी ने बातचीत की तो उनका कहना था कि स्कूल में अनियमितताओं की शिकायतें कई बार मिली हैं लेकिन गांव के प्रधान के कथित डर के मारे कोई अभिभावक कुछ भी कहने से बचता है.

आशीष प्रताप सिंह बताते हैं कि वो किसी दूसरे काम से उधर से गुज़र रहे थे और जब उन्होंने देखा कि बच्चों की प्लेट में पानी ही पानी है तो वो वीडियो बनाने लगे.

आशीष बताते हैं, “बच्चों की थाली में मैंने यही देखा. बच्चों से भी पूछा तो बोले यही मिला है खाने में. मैंने वीडियो इसलिए इतना छोटा बनाया क्योंकि अध्यापकों ने ज़बरन मुझे रोक दिया और मना करने लगे कि आप वीडियो नहीं बना सकते हैं.”

आशीष प्रताप सिंह के मुताबिक स्कूल में बच्चों के पास जूते भी नहीं थे और जब ये वीडियो वायरल हुआ तो आनन-फ़ानन में बच्चों को जूते बांटे गए.

आशीष आरोप लगाते हैं, “मुझे धमकी दी गई कि यदि इसे ज़्यादा तूल देने की कोशिश की तो वैसे ही एफ़आईआर करा दी जाएगी जैसे कि मिर्ज़ापुर में एक पत्रकार के ख़िलाफ़ कराई गई थी. मेरे पास कई लोगों ने इस संबंध में फ़ोन किया.”

मिड डे मील

आशीष सिंह ने जो वीडियो बनाए उसमें उन्होंने खाना खाते हुए चार बच्चों के अलावा और कुछ भी शूट नहीं किया, स्कूल के अध्यापकों से भी बात नहीं की और न ही किसी सक्षम अधिकारी से. आशीष कहते हैं कि उन्होंने बात करने की कोशिश की लेकिन किसी ने कोई जवाब नहीं दिया.

विभाग के अधिकारियों से बीबीसी ने भी संपर्क करने की कोशिश की लेकिन किसी ने कोई जवाब नहीं दिया.

मामला संज्ञान में आने और विभागीय जांच के बाद बेसिक शिक्षा अधिकारी ने ही इस पर पत्रकारों से बात की थी. अधिकारियों का कहना है कि मीडिया को एक बार जानकारी दे दी गई है, बार-बार नहीं दी जाएगी.

बहरहाल, मिड डे मील में जहां तक हल्दी और पानी के घोल देने की बात की जा रही है, ख़ुद आशीष भी उसकी पुष्टि नहीं करते.

उनके मुताबिक, “मैंने उसे अपने हाथ में लेकर तो देखा नहीं और न ही कोई उसका परीक्षण कराया है. लेकिन देखने में वो सब्ज़ी का रस तो बिल्कुल नहीं लग रहा था, क्योंकि इतना पीला रंग सब्ज़ी के रस का नहीं होता है.”

अलग-अलग मेन्यू

मध्याह्न भोजन योजना के अंतर्गत विद्यालयों में मध्यावकाश में छात्र-छात्राओं को स्वादिष्ट रुचिकर भोजन देने की व्यवस्था की गई है जिसके तहत उन्हें सप्ताह में चार दिन चावल के बने भोज्य पदार्थ और दो दिन गेहूं से बने भोज्य पदार्थ दिए जाते हैं.

हर दिन का अलग-अलग मेन्यू बना है और उसी के अनुसार भोजन बनता है. भोजन पकाने के लिए रसोइयों की नियुक्ति की जाती है.

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा कहती हैं, “प्राइमरी स्कूलों के बच्चों को सौ ग्राम खाद्यान्न की व्यवस्था है. कहने के लिए तो खाना पकाने के लिए तेल, मसाले भी मुहैया कराए जाते हैं लेकिन सच्चाई ये है कि बच्चों की संख्या के हिसाब से इतनी मात्रा में खाद्य सामग्री शायद ही किसी विद्यालय में उपलब्ध कराई जाती है.”

उनके अनुसार, “मिड डे मील में कई बार जो अनिमितताएं सामने आती हैं, उनमें स्कूल के अध्यापकों को भी पूरी तरह से दोषी नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि सीमित संसाधनों में ही उन्हें ये पूरी व्यवस्था करनी होती है और निगरानी के लिए तमाम चैनल हैं. ऐसे में यदि सब्ज़ी में केवल पीला पानी ही दिख रहा हो तो ये निष्कर्ष निकाल लेना ठीक नहीं है कि वो हल्दी और पानी का घोल है.”

Back to top button