जातक की कुंडली मे लग्न या चंद्र में जो बलवान हो उससे दशम राशि, दशम भाव में स्थित ग्रह तथा दृष्टियोग के अनुसार मनुष्य की आजीविका का विचार किया जाता है

आचार्य पं. श्रीकान्त पटैरिया ज्योतिष विशेषज्ञ:-

दशमेश के बली होने से जीविका की वृद्धि और निर्बल होने पर हानि होती है।

लग्न से द्वितीय और एकादश भाव में बली एवं शुभ ग्रह हो तो जातक व्यापार से अधिक धन कमाता है।

धनेश और लाभेश का परस्पर संबंध धनयोग का निर्माण करता है।

दशम भाव का कारक यदि उसी भाव में स्थित हो अथवा दशम भाव को देख रहा हो तो जातक को आजीविका का कोई न कोई साधन अवश्य मिल जाता है।

सूर्य, बुध, गुरु और शनि दशम भाव के कारक ग्रह हैं। दशम भाव में केवल शुभ ग्रह हों तो अमल कीर्ति नामक योग होता है, किंतु उसके अशुभ भावेश न होने तथा अपनी नीच राशि में न होने की स्थिति में ही इस योग का फल मिलेगा।

बलवान चंद्र से दशम भाव में गुरु हो तो गजकेसरी नामक योग होता है, किंतु गुरु कर्क या धनु राशि का होना चाहिए। ऐसा जातक यशस्वी, होता है।

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