वैश्विक स्वास्थ्य संकट के बीच विश्व भारत से मांग रहा इंडिया का साथ

वैश्विक स्वास्थ्य संकट के बीच भारत की अहमियत ऐसे ही नहीं बढ़ गई है। दरअसल, इसके पीछे कई बड़े कारण रहे हैं। जी हां, जब कोरोना के चलते पूरी दुनिया ”त्राहिमाम-त्राहिमाम” पुकार रही थी, तब इस संकट की घड़ी में भी भारत की उदार छवि दुनिया को देखने को मिली। ऐसे वक्त में भारत ने दुनिया के कई मुल्कों की मदद की। देश की भीतर बनने वाली दवा हो या अन्य स्वास्थ्य क्षेत्र में काम आने वाले जरूरी उपकरण, ये सभी अन्य जरूरतमंद देशों को समय रहते उपलब्ध कराए गए। इसके लिए भारत ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। सेना के विमान, वाहन और युद्धपोत से लेकर ट्रेन, वाहन इत्यादि से यह आपूर्ति कार्य सम्पन्न किया गया।

दुनिया में सबसे तेज गति से टीकाकरण

गौरतलब हो कोरोना की लड़ाई में इस वक्त भारत दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चला रहा है, जिसमें हर रोज नए कीर्तिमान स्थापित किए जा रहे हैं। बीती 17 सिंतबर को देश में एक दिन में रेकॉर्ड 2.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को वैक्सीन लगाई गई। भारत अभी तक जहां 84 करोड़ (84,15,18,026) से अधिक वैक्सीन लगा चुका हैं, वहीं 55 करोड़ (55,99,32,709) से ज्यादा टेस्टिंग कर चुका है। विश्व के किसी भी देश में इतनी तेजी के साथ अभी तक वैक्सीनेशन नहीं हुआ है। इसका श्रेय केंद्र सरकार से लेकर स्वास्थ्यकर्मी, प्रशासन व वैज्ञानिकों और देश की जनता को जाता है। इन सभी के सहयोग से भारत आज उस मुकाम पर पहुंचा हैं जहां विश्व में उसे एक अलग पहचान मिली है।

वैक्सीन का निर्यात फिर शुरू करेगा भारत

वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के दौरे पर हैं जहां उन्होंने अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस से मुलाकात की। इस दौरान दोनों के बीच कई मुद्दों पर बात हुई। हैरिस भारत के वैक्सीन अभियान से खासी प्रभावित नजर आईं। उन्होंने वैक्सीन निर्यात के भारत के फैसले का स्वागत किया। दरअसल, भारत ने फैसला किया है कि वह फिर से कोरोना वैक्सीन का निर्यात शुरू करेगा। अप्रैल के महीने में कोरोना के बढ़ने के बाद भारत ने वैक्सीन का निर्यात रोक दिया था।

भारत की वैक्सीन कूटनीति

भारत के विदेश राज्य मंत्री वी. मुरलीधरन ने अगस्त 5, 2021 को “भारत की वैक्सीन कूटनीति” पर संसद में एक अहम बयान दिया। उन्होंने कहा कोविड टीकाकरण को बढ़ावा देना मानवता और हमारी सामान्य भलाई के लिए एक सेवा है। यह देशों के बीच प्रतिस्पर्धा का मुद्दा नहीं है। कोरोना महामारी के दौरान, देशों ने अलग-अलग समय पर चिकित्सा आपूर्ति दी है और साथ ही प्राप्त की है। भारत इस अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, जो वास्तव में “वसुधैव कुटुम्बकम” के सदियों पुराने लोकाचार को दर्शाता है।

याद हो, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2020 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में वर्चुअल संबोधन के दौरान घोषणा की कि भारत के वैक्सीन उत्पादन और वितरण क्षमता का उपयोग इस संकट से लड़ने में सारी मानवता की मदद के लिए किया जाएगा। हमने टीकों की डिलीवरी के लिए कोल्ड चेन और भंडारण क्षमता बढ़ाने की भी पेशकश की। यह दृष्टिकोण न केवल “वसुधैव कुटुम्बकम” की हमारी सदियों पुरानी परंपरा के अनुरूप है, जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया है। मानव जाति के लाभ के लिए भारत की बढ़ती क्षमताओं का उपयोग करना इस सरकार का समकालीन दृष्टिकोण भी है। तेजी से बढ़ती बहुध्रुवीय दुनिया में एक प्रमुख राष्ट्र के रूप में, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को हमसे बहुत उम्मीदें हैं, और बदले में, हम अधिक से अधिक जिम्मेदारियों को निभाने के लिए अपनी इच्छा प्रदर्शित करने के लिए तैयार हैं।

उदारता से मिली इंडिया को अलग पहचान

एक समय ऐसा भी आया जब इंडिया में बनने वाली मलेरिया की दवाई हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन की मांग सुपर पावर अमेरिका से लेकर तकनीक की दुनिया के बादशाह इजरायल तक को थी। ऐसे वक्त में इंडिया ने उन्हें यह दवा उपलब्ध कराई। केवल इतना ही नहीं इंडिया ने उस समय 13 देशों को यह दवा मुहैया कराकर सबका दिल जीत लिया था। भारत की उदार छवि और विपत्ति में मदद को सदैव तैयार रहने का ही कारण है कि कल तक जो कश्मीर पर पाकिस्तान का साथ दे रहे थे वे भी भारत से दवा की मदद मांगने लगे। ऐसे हालातों में भी भारत ने उन्हें ना नहीं कहा बल्कि अपनी उदार छवि दिखाते हुए मलेशिया और तुर्की की मदद की। कोरोना संकट से निपटने के बाद अब शायद ही ये देश कश्मीर पर पाकिस्तान की तरफदारी कर पाएंगे। यह उदार दृष्टिकोण, जो भारत की संस्कृति की विशेषता है, “वंदे भारत मिशन” के रूप में पूरी दुनिया के सामने आई। वुहान से शुरू कर भारत अपने देश की देखभाल करते हुए दूसरे देशों के नागरिकों तक को वापस लेकर आया। इन्हीं कारणों से भारत से पूरी दुनिया की उम्मीदें बढ़ गई और विश्व भारत से अब खुलकर इंडिया का साथ मांग रहा है।

भारत की दवाओं की विश्व में मांग

भले ही कोविड महामारी अपने चरम पर थी, हमारी दवा और चिकित्सा क्षमताओं की वैश्विक मांग पहले से ही थी। यह काफी हद तक हमारी कोविड से संबंधित क्षमताओं के रूप में असाधारण कारण था। यही कारण रहा कि दुनिया में दूसरी सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश में अन्य देशों की तुलना में बेहद कम मृत्यु दर रही। यह सभी प्रधानमंत्री के नेतृत्व और सरकार के केंद्रित प्रयासों के परिणामस्वरूप हुआ। भारत की क्षमताओं का बाहरी लाभकारी प्रभाव भी था। भारत दुनिया भर में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन, पेरासिटामोल और अन्य दवाओं के लिए आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम है। वास्तव में, भारत ने 150 देशों को दवाओं की आपूर्ति की, उनमें से 82 देशों को भारत ने अनुदान के रूप में मदद मुहैया कराई। मास्क, पीपीई किट और डायग्नोस्टिक किट का उत्पादन बढ़ता गया, इसके बाद से उन्हें अन्य देशों में भी उपलब्ध कराया गया। भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की करीब 50 मिलियन गोलियां भेजी।

जब पूरी दुनिया में हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन की मांग की जा रही थी तब भारत ने प्लान तैयार किया था कि वह 55 देशों को इस दवा की सप्लाई करेगा जिनमें ब्रिटेन, अमेरिका जैसे दिग्गज देश शामिल रहे। हाइड्रोक्सी क्लोरोक्वीन एक एंटी मलेरिया दवा है जिसका इस्तेमाल अर्थराइटिस और ल्यूपस के उपचार में भी किया जाता है। भारत इस दवा का सबसे बड़ा उत्पादक देश है।

पीएम मोदी ने कई देशों से सम्पर्क कर दिखाई एकजुटता

कोरोना वायरस की त्रासदी आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया के कई देशों से सम्पर्क कर इस लड़ाई में एकजुटता दिखाई। उन्होंने इस वैश्विक महामारी से जारी लड़ाई में कोरोना वायरस फंड का एलान किया। “वैक्सीन मैत्री” के तहत अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, मालदीव, मॉरीशस, श्रीलंका, सिसिल्स को भी इंडिया ने दवाई व चिकित्सा संबंधी सामग्री भेजी। इसके बाद विस्तारित पड़ोस, विशेष रूप से खाड़ी में छोटे और अधिक कमजोर देशों को आपूर्ति करना जिनमें अफ्रीका से कैरिकॉम के क्षेत्रों तक मदद पहुंचाई गई। ऐसे अनुबंध भी थे जो हमारे उत्पादकों ने अन्य देशों के साथ या तो द्विपक्षीय रूप से या कोवैक्स पहल के माध्यम से किए हैं। आज तक, भारत ने भौगोलिक क्षेत्रों में 72 देशों को ‘मेड इन इंडिया’ टीकों की आपूर्ति की है। इंडिया ने पहले कोविड 19 महामारी के दौरान बड़ी संख्या में देशों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन, रेमेडिसीविर और पेरासिटामोल टैबलेट के साथ-साथ डायग्नोस्टिक किट, वेंटिलेटर, मास्क, दस्ताने और अन्य चिकित्सा आपूर्ति की आपूर्ति की थी।

दुनिया को कराया सस्ता इलाज मुहैया

इंडिया के इस कदम से दुनिया में लोगों को सस्ता इलाज मुहैया हो सका। गौरतलब हो जेनेरिक ड्रग इंडस्ट्री भारत की सबसे बड़ी मजबूती बनती जा रही है। आकार की बात करें तो भारत की फार्मा इंडस्ट्री दुनिया में तीसरे स्थान पर आती है। भारत आज के समय में दुनिया के तमाम देशों को जेनेरिक दवाइयां उपलब्ध कराने का काम करता है।

वहीं इस सूची में सख्त निगरानी रखने वाले अमेरिकी, पश्चिमी यूरोप और ऑस्ट्रेलिया शामिल है। यह बात अलग है कि भारत इन दवाओं के लिए कच्चे माल के लिए काफी हद तक अन्य देशों पर निर्भर करता है। यदि भारत दवाई इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के लिए खुद को आत्मनिर्भर बना ले तो विश्वभर में फार्मा बाजार में भारत का मुकाबला कोई नहीं कर पाएगा।

केवल इतना ही नहीं जब कभी ऑनलाइन प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की बात आती है तो भारत के प्रयास, निश्चित रूप से पड़ोस से आगे निकल जाते हैं। विदेश मंत्रालय ने एम्स और पीजीआई चंडीगढ़ जैसे प्रमुख संस्थानों के साथ साझेदारी में 14 ई-आईटीईसी पाठ्यक्रम संचालित किए। बांग्लादेशी पेशेवरों के लिए बांग्ला में एक विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किया गया था और एक दक्षिण-पूर्व एशिया में सैन्य डॉक्टरों के लिए सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा को मिलाकर इन 14 पाठ्यक्रमों में 47 देशों के कुल 1,131 पेशेवर प्रतिभागी थे।

ध्यान देने योग्य बिंदु

• टीकों की डिलीवरी से पहले राष्ट्रीय और प्रांतीय दोनों स्तर पर टीकाकरण प्रबंधकों, कोल्ड चेन अधिकारियों, संचार अधिकारियों और प्राप्तकर्ता देशों के डेटा प्रबंधकों के लिए 19-20 जनवरी 2021 को प्रशासनिक और परिचालन पहलुओं को शामिल करते हुए एक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है।

• इंडिया ने पहले कोविड 19 महामारी के दौरान बड़ी संख्या में देशों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन, रेमेडिसविर और पेरासिटामोल टैबलेट के साथ-साथ डायग्नोस्टिक किट, वेंटिलेटर, मास्क, दस्ताने और अन्य चिकित्सा आपूर्ति की आपूर्ति की थी।

• भारत ने कई पड़ोसी देशों को क्लिनिकल टेस्टिंग में तेजी लाने के लिए भागीदारी (पीएसीटी) कार्यक्रम के तहत अपनी नैदानिक क्षमताओं को बढ़ाने और मजबूत करने के लिए प्रशिक्षण भी प्रदान किया है। अलग से, भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (आईटीईसी) कार्यक्रम के तहत स्वास्थ्य कर्मियों और साझेदार देशों के प्रशासकों के लिए कई प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित किए गए हैं, जो महामारी से निपटने में हमारे अनुभव को साझा करते हैं।

पीएम मोदी के समाधान तैयार करने के प्रयास

शुरू से ही, भारत ने हमेशा माना है कि महामारी पूरी मानवता के लिए खतरा है और इसलिए सही प्रतिक्रिया सामूहिक होगी। इस कड़ी में 15 मार्च 2020 की शुरुआत में ही, प्रधानमंत्री ने क्षेत्रीय समाधान तैयार करने के लिए सार्क के शासनाध्यक्षों की बैठक आयोजित करने की पहल की। एक महत्वपूर्ण परिणाम सार्क कोविड-19 फंड का निर्माण था जिसने क्षेत्र के भीतर इस मुद्दे पर शुरुआती आदान-प्रदान का समर्थन किया। इसके बाद देश में टीकों और सार्वजनिक स्वास्थ्य और कोविड-19 प्रबंधन के अन्य पहलुओं को संभालने के लिए क्षमताओं को मजबूत करने के लिए कार्यशालाएं और प्रशिक्षण पाठ्यक्रम आयोजित किए गए। हाल ही में, इसके बाद 18 फरवरी 2021 को क्षेत्र के वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारियों की एक बैठक हुई। उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ अपने विचार-विमर्श के परिणाम साझा किए, जिन्होंने डॉक्टरों और नर्सों के लिए एक विशेष वीजा योजना का आग्रह किया, एक क्षेत्रीय एयर एम्बुलेंस समझौते का समन्वय किया। टीकों की प्रभावशीलता पर डेटा का अध्ययन करने के लिए एक मंच और भविष्य की महामारियों को रोकने के लिए प्रौद्योगिकी-सहायता प्राप्त महामारी विज्ञान के लिए एक नेटवर्क की बात हई।

‘विश्व की फार्मेसी’ की भूमिका

शंघाई सहयोग संगठन के महासचिव व्लादिमीर नोरोव ने कहा है कि भारत अपने विशाल अनुभव और चिकित्सा में गहन ज्ञान के साथ कोविड-19 महामारी के दौरान ‘दुनिया की फार्मेसी’ के रूप में अहम भूमिका निभा रहा है। यह कई क्षेत्रीय और वैश्विक पहलों के लिए नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहा है। भारत ने अब तक कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में 133 देशों को दवाओं की आपूर्ति की है, जो भारत की उदारता को दर्शाता है, इस तथ्य के बावजूद देश की सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर बीमारी को रोकने और इलाज के लिए तत्काल उपाय किए हैं। नोरोव ने बताया कि यह एक प्रमुख शक्ति के व्यवहार का एक योग्य और जिम्मेदार उदाहरण है, और साथ ही एससीओ सदस्य राज्यों की पूरकता और पारस्परिक समर्थन को दर्शाता है। शायद इसी का नतीजा है कि भारत ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के लिए एक अस्थायी सीट के चुनाव में जीत हासिल की।

नोरोव ने यह भी कहा कि “इंडिया ‘दुनिया की फार्मेसी’ की भूमिका निभा रहा है और एक महामारी व वैश्विक संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है।” बीजिंग मुख्यालय वाले आठ सदस्यीय आर्थिक और सुरक्षा ब्लॉक एससीओ में भारत और पाकिस्तान को 2017 में शामिल किया गया था। इसके संस्थापक सदस्यों में चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान शामिल हैं। भारत आज ऐसे कई क्षेत्रीय और वैश्विक पहलों में अपना स्थान तय कर रहा है। इस संबंध में नोरोव ने कहा, “भारत जेनेरिक दवाओं का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया है, जो कुल वैश्विक उत्पादन का 20 प्रतिशत है। केवल इतना ही नहीं इंडिया टीकों की वैश्विक मांग का करीब 62 प्रतिशत पूरा करता है।”

निर्यात

वित्त वर्ष 2021 में भारत का ड्रग्स और फार्मास्यूटिकल्स निर्यात 24.44 बिलियन अमेरिकी डॉलर रहा। भारत दुनिया में चिकित्सा वस्तुओं का 12वां सबसे बड़ा निर्यातक है। देश का दवा क्षेत्र कुल व्यापारिक निर्यात में 6.6% का योगदान देता है। मई 2021 तक, भारत ने 71 देशों को कुल 586.4 लाख कोविड टीकों की आपूर्ति की, जिसमें अनुदान (81.3 लाख), वाणिज्यिक निर्यात (339.7 लाख) और कोवैक्स प्लेटफॉर्म (165.5 लाख) के तहत निर्यात शामिल हैं। बताना चाहेंगे कि दुनिया के 200 से अधिक देशों में भारतीय दवाओं का निर्यात किया जाता है, जिसमें अमेरिका प्रमुख बाजार है। वहीं मात्रा के मामले में वैश्विक निर्यात में भारत की जेनेरिक दवाओं की हिस्सेदारी 20% है, जिससे देश वैश्विक स्तर पर जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा प्रदाता बन गया है। इन सब खूबियों के चलते आज विश्व भारत से इंडिया का साथ मांग रहा है।

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