अगले 18 महीने में और शुरू होंगे प्लांट तो होगी 96 करोड़ टन राख

अंकित मिंज

बिलासपुर।

पॉवर जेनरेशन में लगे थर्मल पावर प्लांट फिलहाल 34 करोड़ टन राख का उत्सर्जन कर पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं। ये तो आंकडा तो अभी का है, अगले एक से डेढ़ वर्षों में लंबित सभी परियोजनाओं का काम पूरा हो जाने के बाद राख की मात्रा बढ़कर 96 करोड़ टन हो जाएगी।

ये आंकड़े कितने भयावह हैं, इसका अंदाजा अभी नहीं लगाया जा सकता। इसकी बानगी पिछले वर्ष तापमान के 49 डिग्री पार हो जाने के तौर पर सामने आई थी।
पर्यावरण संरक्षण कार्य में लगी संस्थाएं एवं निजी एजेंसियों की मानें तो अगले पांच साल छत्तीसगढ़ के लिए भयावह साबित होंगे।

सरकारी स्तर पर किए जाने वाले प्रयास महज खानापूर्ति के स्तर पर हैं। पावर जेनरेशन कंपनियां सिर्फ मुनाफे की ओर देख रही हैं। जमीन के बंजर होने एवं लोगों के स्वास्थ्य की लगातर अनदेखी की जा रही है।

9 हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन

प्रदेश में पॉवर जेनरेशन कार्य में लगी सरकारी एवं निजी कंपनियों द्वारा अभी 9 हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा रहा है। इसे अगले एक से डेढ़ वर्षों में बढ़ाकर 28 हजार मेगावाट किया जाना है।

फिलहाल 9 हजार मेगावाट विजली उत्पादन के लिए 120 करीब मिलियन टन कोयले को जलाया जा रहा है। इससे निकलने वाले राख की मात्रा 34 करोड़ टन है, जो आने वाले कुछ महीनों बाद बढ़कर 96 करोड़ टन हो जाएगी।

उपयोग हो रहे घटिया कोयला ने बिगाड़ी पर्यावरण की तस्वीर

सीआईएमएफआर की रिपोर्ट के अनुसार पावर प्लांट में घटिया कोयले के इस्तेमाल किए जाने से फ्लाई एश की मात्रा तय सीमा से बहुत अधिक है। पावर जेनरेशन कंपनियों को 34 प्रतिशत से अधिक एश की मात्रा वाले कोयले का इस्तेमाल नहीं करना है।

जबकि सच्चाई ये है कि उपयोग किए जाने वाले कोयला 45 से 50 या विद्युत कंपनियों द्वारा 60 प्रतिशत तक राख उगल रहे हैं। इन पर कोई लगाम नहीं है, ना ही इसकी रोकथाम के लिए कोई उपाय किया जा रहा है।

पर्यावरणविद एवं एनजीओ द्वारा किए जा रहे कई काम

पर्यावरणविद एवं एनजीओ द्वारा इसे रोकने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन इस पर लगान लगाने में कोई सक्षम नहीं है। शासन को दी गई रिपोर्ट में बताया गया है कि घटिया कोयले के उपयोग से वातावरण में कई घातक गैंसें एवं रसायन घुल रहे हैं, इसके घातक परिणाम दिखने लगे हैं।

वातावरण में घुल रहा जहर: घटिया एवं डी.ग्रेड कोयला जलाने के मल्टी इफेक्ट होते हैं, ये वातावरण के साथ जल एवं भूमि को भी प्रदूषित करते हैं। बेतहाशा कोयला जलने के कारण वातावरण में सल्फर की मात्रा 0.7 से लेकर 0.9 के खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है।

साथ ही लेड, प्रीमियम, निकेल, कोबाल्ट एवं अन्य गैसें भी ल्लोगों का जीना मुहाल करने के लिए काफी हैं। इसकी रोकथाम के लिए कोई प्रयास नहीं किए जा रहे है। पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार पावर प्लांट से निकलने वाले धुंए का असर 400 से 500 किलोमीटर तक होता है।

100 किलोमीटर के रेडियस में तो ये अत्यंत ही खतरनाक होते है। जमीन के बंजर होने का खतरा तो होता ही है, भू-जल स्त्रोत को भी ये नुक्सान पहुंचाते हैं।

एनटीपीसी जला रहा 37 मिलियन टन कोयला

एनटीपीसी सीपत एवं कोरबा प्लांट के आंकड़े अगर देखें तो सीपत प्लांट प्रति वर्ष 2980 मेगावाट उत्पादन के लिए 19.37 मिलियन टन कोयला जला रहा है। वहीं कोरबा एनटीपीसी द्वारा 16.90 मिलियन टन कोयला 2600 मेगावाट के उत्पादन के लिए जलाया जा रहा है।

अगर भिलाई स्टील अथारिटी आफ इंडिया (भेल) के आंकडें को शामिल करें तो 380 मेगावाट उत्पादन के लिए 5.72 मिलियन टन कोयला जलाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड को शामिल करें तो आंकडें भयावह तस्वीर खींच रहे हैं।

फैल रही औद्योगिक बीमारी सिलिकोसिस

प्रदेश के रायगढ़, रायपुर के दूरस्थ क्षेत्रों समेत अन्य जगहों पर प्रदूषण के कारण सिलिकोसिस पिछले वर्षों में सामने आई है। इस बीमारी को औद्योगिक प्रदूषण से होने वाली बीमारी के नाम से चिन्हित किया गया है।

इसे लेकर हाईकोर्ट में याचिका भी लगाई गई है। कोर्ट ने शासन को इस बीमारी का पता लगाने और इस पर रोकथाम के लिए देश की नामी आईआईएम संस्थाओं से संपर्क करने और इसका निदान संबंधी रिपोर्ट जमा करने को कहा है।

स्थिति भयावह है, लेकिन कोई चारा भी नहीं:

एनटीपीसी सीपत एवं अन्य पावर जेनरेशन कंपनियों द्वारा कोयले का परीक्षण मौके पर कराया गया है। परीक्षण में एश की मात्रा तय सीमा 34 प्रतिशत से बहुत अधिक है, ऐश की मात्रा 45 से 50 प्रतिशत तक पाई गई है।

एश की मात्रा का मतलब प्रति किलो कोयला जलाने पर 450 या 500 ग्राम राख का निकलना। अंदाजा लगाएं कि करोड़ों टन कोयला जलाया जाएगा तो कितनी मात्रा में राख निकलेगी। स्थिति भयावह है, मगर कोई चारा नहीं है।

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