अंतर्राष्ट्रीय

तालिबान के अवैध कारोबार पर भारत-अमेरिका की नजर, जानें क्या है प्लानिंग

भारत चाहता है कि तालिबान का राजनीतिक नेतृत्व अवैध व्यापार, ड्रग नेटवर्क और आतंकवाद पर नकेल को लेकर ठोस आश्वासन और कार्ययोजना पेश करे।

भारत-अफगान शांति वार्ता के दौरान तालिबानी आतंकवाद और उनके अरबों रुपये के उगाही तंत्र पर अंकुश के लिए दबाव बना रहा है। भारत और अमेरिका के बीच इस मुद्दे पर बात हुई है। भारत चाहता है कि तालिबान का राजनीतिक नेतृत्व अवैध व्यापार, ड्रग नेटवर्क और आतंकवाद पर नकेल को लेकर ठोस आश्वासन और कार्ययोजना पेश करे।

तालिबान हर साल अरबों रुपये की काली कमाई से समानांतर अर्थव्यवस्था चलाता है। इसके जरिये ही आतंकी गतिविधियां भी संचालित होती हैं। उनका ड्रग नेटवर्क कई देशों में पांव पसार चुका है। दरअसल भारत की चिंता आतंकवाद से अफगानिस्तान में अपनी परियोजना को बचाने के साथ पड़ोसी देश मे अपनी सकारात्मक प्रभावी भूमिका बनाए रखने को लेकर है। जिस तरह से पाकिस्तान आतंकवाद को राज्य प्रायोजित नीति के तौर पर भारत के खिलाफ इस्तेमाल करता है वैसा ही तालिबान के नेतृत्व में स्थितियां न बनें इसके लिए ठोस बातचीत चल रही है। सूत्रों ने कहा तालिबान से चल रही बातचीत में क्षेत्रीय सुरक्षा अहम मुद्दा है।

अमेरिका-भारत की चिंताओं पर साथ :

भारत की चिंताओं को अमेरिका भी समझ रहा है। तालिबान के संदर्भ में सभी सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अमेरिका ने पाकिस्तान से भी भरोसा हासिल करने का प्रयास किया है। पाकिस्तान तालिबान से रिश्तों और अपने प्रभाव का इस इलाके में दुरूपयोग न करे ये कोशिश भी हो रही है। भारत चाहता है कि अफगान नेतृत्व की अगुवाई में ही सारे फैसले हों।

इस तरह चलता है अवैध कारोबार :

अफगानिस्तान में अफीम की खेती वाले क्षेत्र के एक हिस्से पर सरकार का नियंत्रण है। लेकिन अफीम की खेती वाले ज्यादातर हिस्से पर तालिबान का नियंत्रण है। ऐसा माना जाता है कि ये तालिबान की आय का बड़ा स्त्रोत है। ये पैसा उनकी अवैध अर्थव्यवस्था की बुनियाद है। साथ ही आतंकवाद की खुराक भी यहां से मिलती है। तालिबान इस व्यापार के अलग-अलग स्तरों पर टैक्स लेता है। अफीम की खेती करने वाले किसानों से 10 प्रतिशत उत्पादन टैक्स लिया जाता है। अफीम को हेरोइन में बदलने वाली प्रयोगशालाओं से भी टैक्स लिया जाता है। यही नहीं, इस अवैध व्यापार को करने वाले व्यापारियों से भी टैक्स वसूला जाता है। इस तरह इस व्यापार में हर साल तालिबान का हिस्सा लगभग 7 अरब रुपये से लेकर 28 अरब रुपये के बीच होता है।

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