भारत देश अति प्राचीन और अविनाशी खण्ड है… ब्रह्माकुमारी अदिति दीदी

रायपुर: प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय द्वारा चौबे कालोनी में आयोजित समर कैम्प के अन्तर्गत सृष्टि के आदि, मध्य और अन्त का दिग्दर्शन विषय पर बोलते हुए ब्रह्माकुमारी अदिति दीदी ने कहा कि विश्व के मानचित्र पर हमारा भारत देश अति प्राचीन और अविनाशी खण्ड है क्योंकि इसका इतिहास पांच हजार वर्ष पुराना है। किसी भी अन्य देश का इतिहास इतना पुराना और गौरवशाली नही है।

ब्रह्माकुमारी अदिति दीदी ने कहा कि मनुष्य आत्माओं के गुण और कर्तव्यों के आधार पर विश्व के इतिहास को चार युगों में बांटा गया है। इसमें सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग चार कालखण्ड होते हैं। प्रत्येक की अवधि बारह सौ पचास वर्ष होती है।

सतयुग और त्रेतायुग इस संसार का सतोप्रधान अर्थात स्वर्णिम काल है। जहॉं पर दिव्यगुणों से सम्पन्न होने के कारण मनुष्य आत्माएं देवी और देवता कहलाते थे। उस समय को ही स्वर्ग, बैकुण्ठ अथवा रामराज्य कहकर आज तक याद किया जाता है।

धीरे-धीरे पुनर्जन्म के चक्र में आकर मनुष्य आत्माएं अपनी निजी पहचान को भूलकर स्वयं को शरीर समझने लग जाते हैं तथा देह अभिमान के फलस्वरूप काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि विकारों के वशीभूत होकर दु:खी और अशान्त हो जाते हैं।

जिसके परिणामस्वरूप द्वापरयुग से भक्ति मार्ग का प्रादुर्भाव होता है। सबसे पहले एक निराकार शिव की ही पूजा होती थी किन्तु बाद में भक्ति भी तमोप्रधान हो गई। लोग अनेकानेक देवी-देवताओं की पूजा करने लगे। कलियुग के अन्त में जड़ तत्वों जैसे पेड़ पौधों की भी पूजा होने लगी। भक्ति मेें श्रद्घा का स्थान स्वार्थ ने ले लिया।

ब्रह्माकुमारी अदिति दीदी ने बतलाया कि इस दुनिया की आबादी धीरे-धीरे बढ़ रही है, इसका मतलब है कि जरूर कहीं पर आत्माओं का निवास भी होना चाहिए, जहॉं से समय-समय पर आत्माएं इस भू मण्डल पर आती जा रही हैं।

उन्होने बतलाया कि सूर्य, चांद और तारागण से भी ऊपर एक और दुनिया है जहॉं पर लाल रंग का सुनहरा प्रकाश व्याप्त है, जिसे छठा ब्रह्मï तत्व भी कहते हैं, इसलिए इस लोक को ब्रह्मïलोक, परमधाम, शान्तिधाम आदि आदि नामों से जाना जाता है। शरीर छोडऩे के बाद मनुष्यात्माएं यहॉं पर ही निवास करती हैं।

परमात्मा भी वहॉं ही रहते हैं तथा अतिधर्मग्लानि के समय इस धरा पर अवतरित होते हैं, इसलिए परमात्मा को जब कोई याद करते हैं तो न चाहते हुए भी सिर ऊपर की ओर उठ जाता है। उन्होने बतलाया कि जैसे आम के बीज से आम का ही पौधा उत्पन्न होता है,

ठीक उसी प्रकार शरीर छोडऩे के पश्चात मनुष्य भी मनुष्य के रूप में ही जन्म लेता है, अपने कर्मों का फल भोगने के लिए उसे पशु योनि में जाने की जरूरत नही होती। अगर मनुष्य को कर्मों का फल भोगने के लिए पशु बनना पड़ता तो आज दुनिया में मनुष्यों की जनसंख्या सिमटकर रह जाती। अधिकांश मनुष्य पशु योनि में चले जाते।

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