विधवा महिलाओं का पुनर्वास मामला: SC ने कहा, बहुत हो गया, राज्‍य सरकारों को इनके लिए कुछ करना ही होगा

सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि आप कुछ काम नहीं करते और कोर्ट अगर कुछ आदेश देता है तो आप कहते है कि कोर्ट देश चला रहा है

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को विधवा महिलाओं के पुनर्वास के मामले में राज्य सरकारों के रवैये पर नाराजगी जाहिर की. कोर्ट ने कहा कि अब बहुत हो गया, अब आपको इनके लिए कुछ करना ही होगा. हर कोई अपनी जिम्मेदारी से बचते हुए काम न करने का इल्ज़ाम दूसरे पर डालता है, लेकिन कोई काम नही करना चाहता.<>

सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि आप कुछ काम नहीं करते और कोर्ट अगर कुछ आदेश देता है तो आप कहते है कि कोर्ट देश चला रहा है.<>

कोर्ट ने कहा कि विधवा महिलाओं के पुनर्वास के मामले में कोई भी गंभीर नहीं है, ऐसे में राज्य सरकार ये लिख कर दे दे कि वो काम नही करना चाहती. सर्वोच्‍च अदालत ने केंद्र सरकार से सभी राज्य सरकारों से विधवा महिलाओं के पुनर्वास के मामले में जानकारी इकठ्ठा करने को कहा है और एक्शन प्लान तैयार करने को कहा है. इस मामले में अगली सुनवाई सात फरवरी को होगी.<>

इस मामले में पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि सामाजिक बंधनों की परवाह ना करते हुए वो ऐसी विधवाओं के पुनर्वास से पहले पुनर्विवाह के बारे में योजना बनाए जिनकी उम्र कम है. कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि पुनर्विवाह भी विधवा कल्याणकारी योजना का हिस्सा होना चाहिए<>

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के रोडमैप पर सवाल उठाते हुए कहा था कि इसमें सफाई, पौष्टिक भोजन, सफाई समेत कई मुद्दों पर खामियां हैं. कोर्ट ने यहां तक कहा था कि विधवा महिलाओं से बेहतर खाना जेल के कैदियों को मिलता है.<>

जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने कहा था कि विधवाओं के पुनर्वास की बात तो की जाती है लेकिन उनके पुनर्विवाह के बारे में कोई नहीं बात करता. सरकारी नीतियों में विधवाओं के पुनर्विवाह की बात नहीं है जबकि इसे नीतियों का हिस्सा होना चाहिए.<>

वास्तव में सुप्रीम कोर्ट ने पाया था कि वृंदावन सहित अन्य शहरों में विधवा गृहों में कम उम्र की विधवाएं भी हैं. पीठ ने कहा कि यह दुख की बात है कि कम उम्र की विधवाएं भी इन विधवा गृह में रह रही हैं. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने महिला सशक्तिकरण की राष्ट्रीय नीति में भी बदलाव करने की बात कही है. अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय नीति 2001 में बनी थी और इसे 16 वर्ष बीत चुके हैं. लिहाजा इसमें बदलाव की जरूरत है.<>

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